Punjab में पराली जलाने की घटनाओं में तेजी, प्रशासन अलर्ट

Update: 2026-05-07 07:05 GMT
Punjab.पंजाब: पंजाब में गेहूं की कटाई पूरी होने के बाद पराली जलाने की घटनाओं में तेजी देखी जा रही है। किसानों ने खेतों में बचे हुए पुआल और पराली को जलाकर मिट्टी की सफाई करने का विकल्प अपनाया है, लेकिन इससे वायु प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं। राज्य के कृषि और पर्यावरण विभाग के अधिकारियों के अनुसार, पिछले हफ्ते में पराली जलाने की 500 से अधिक घटनाएं दर्ज की गई हैं। खासकर फिरोजपुर, मोगा, बठिंडा और
लुधियाना जिलों
में यह समस्या अधिक गंभीर दिखाई दे रही है। अधिकारी बता रहे हैं कि पराली जलाने से न केवल स्थानीय वायु गुणवत्ता प्रभावित होती है बल्कि इससे पूरे राज्य में धुआं फैलकर गंभीर प्रदूषण का कारण बनता है।
अधिकारियों ने किसानों को चेतावनी दी है कि पराली जलाना गैरकानूनी है और इस पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है। कृषि विभाग ने कहा कि वे किसानों को पराली का पर्यावरणीय रूप से सुरक्षित निपटान करने के लिए उपाय उपलब्ध करा रहे हैं। इसमें हरी खाद तैयार करना, बायोचार और मशीनों द्वारा पराली को खेत में ही मिलाना शामिल है।
किसानों का कहना है कि पराली जलाने के पीछे उनका मुख्य कारण समय और लागत की बचत है। उन्होंने बताया कि खेतों की सफाई और नई फसल की तैयारी के लिए उनके पास अन्य विकल्प सीमित हैं। कुछ किसानों ने कहा कि सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए उपाय महंगे हैं और छोटे किसानों के लिए व्यावहारिक नहीं हैं।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि पराली जलाना गंभीर समस्या है। यह वायु में पीएम2.5 और पीएम10 कणों को छोड़ता है, जो श्वसन संबंधी रोगों और स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ा सकते हैं। विशेषज्ञों ने प्रशासन से अपील की है कि वे किसानों को जागरूक करें और उन्हें कम लागत वाले वैकल्पिक उपाय उपलब्ध कराएं।
राज्य सरकार ने पराली जलाने की घटनाओं पर नजर रखने के लिए विशेष टीमें तैनात की हैं। इन टीमों का उद्देश्य किसानों को सलाह देना, पराली जलाने से रोकना और कानून का पालन सुनिश्चित करना है। साथ ही, अधिकारियों ने कहा कि तकनीकी सहायता और वित्तीय सब्सिडी के माध्यम से किसानों को पराली का निपटान करने में मदद की जाएगी।
सामाजिक संगठनों और मीडिया ने भी किसानों और जनता को जागरूक करने के अभियान शुरू किए हैं। उन्होंने कहा कि पराली जलाना केवल प्रदूषण का कारण नहीं है, बल्कि यह किसानों की भूमि की उर्वरता को भी कम करता है। हरी खाद और जैविक निपटान से मिट्टी की गुणवत्ता भी बढ़ती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसानों को सही विकल्प और आर्थिक सहायता मिले, तो वे पराली जलाने से बच सकते हैं। इस तरह राज्य में वायु प्रदूषण को कम किया जा सकता है और कृषि उत्पादन को भी लाभ मिलेगा।
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