लुधियाना। देशभर में दशहरे के अवसर पर बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में रावण के पुतलों का दहन किया जाता है, लेकिन पंजाब के लुधियाना जिले के पायल कस्बे में एक अनोखी परंपरा आज भी कायम है। यहां दशहरे पर रावण का पुतला जलाया नहीं जाता, बल्कि उसकी विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह परंपरा करीब 190 वर्षों से चली आ रही है। यहां स्थापित लगभग 25 फीट ऊंचा रावण का पक्का बुत श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। खास बात यह है कि यहां संतान प्राप्ति की मनोकामना लेकर भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस अनूठी परंपरा के कारण पायल का यह धार्मिक स्थल दशहरे के अवसर पर विशेष चर्चा में रहता है।
दशहरे पर रावण दहन नहीं, होती है पूजा
आमतौर पर विजयादशमी के दिन देशभर में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन किया जाता है। यह परंपरा भगवान श्रीराम की रावण पर विजय और बुराई के अंत का प्रतीक मानी जाती है।
लेकिन लुधियाना के पायल कस्बे में दशहरे का स्वरूप अलग दिखाई देता है। यहां स्थानीय श्रद्धालु रावण की प्रतिमा के सामने पूजा-अर्चना करते हैं।
दशहरे के अवसर पर श्रद्धालु रावण की प्रतिमा के दर्शन करने पहुंचते हैं और अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूजा करते हैं।
स्थानीय लोगों का मानना है कि यह परंपरा उनके पूर्वजों की आस्था से जुड़ी हुई है। इसी कारण इसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया जा रहा है।
25 फीट ऊंचा रावण का पक्का बुत
पायल कस्बे में स्थित रावण की विशाल प्रतिमा इस धार्मिक स्थल की प्रमुख पहचान है।
स्थानीय विवरणों के अनुसार, यह प्रतिमा लगभग 25 फीट ऊंची है और सीमेंट से निर्मित है। इसके कारण यह सामान्य दशहरा पुतलों से अलग है, जिन्हें उत्सव के बाद जला दिया जाता है।
यहां रावण की स्थायी प्रतिमा स्थापित है, जिसे श्रद्धालु धार्मिक आस्था के साथ देखते हैं।
इस प्रतिमा से जुड़ी परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है। हालांकि, इसकी स्थापना की सटीक अवधि को लेकर विभिन्न ऐतिहासिक विवरणों में अंतर मिलता है। कुछ पुरानी रिपोर्टों में इस परंपरा को लगभग 150 वर्ष पुराना बताया गया है, जबकि अन्य विवरणों में इससे भी पुरानी परंपरा का उल्लेख है।
संतान प्राप्ति की मान्यता से जुड़ी है पूजा
इस धार्मिक स्थल की सबसे चर्चित विशेषता संतान प्राप्ति की मनोकामना से जुड़ी आस्था है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, जिन दंपतियों को संतान सुख प्राप्त नहीं होता, वे यहां रावण की प्रतिमा के सामने पूजा-अर्चना करते हैं।
श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां सच्चे मन से प्रार्थना करने पर उनकी मनोकामना पूरी हो सकती है।
हालांकि, संतान प्राप्ति से संबंधित यह धार्मिक मान्यता है। इसका कोई चिकित्सकीय या वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
इसके बावजूद इस परंपरा का स्थानीय धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन में विशेष महत्व बना हुआ है।
हकीम बीरबल दास से जुड़ी है मंदिर की कहानी
पायल में रावण पूजा की परंपरा के पीछे हकीम बीरबल दास की कहानी बताई जाती है।
स्थानीय दूबे परिवार के अनुसार, उनके पूर्वज हकीम बीरबल दास को दो विवाह के बाद भी संतान सुख नहीं मिला था।
इससे दुखी होकर उन्होंने सांसारिक जीवन त्यागने का निर्णय लिया और संन्यास का मार्ग अपनाया।
बताया जाता है कि संन्यास के दौरान एक संत ने उन्हें गृहस्थ जीवन में लौटने की सलाह दी।
परिवार की परंपरागत कथा के अनुसार, बाद में दशहरे के दिन उन्हें पुत्र प्राप्त हुआ। इस घटना को परिवार ने विशेष धार्मिक महत्व दिया।
इसके बाद परिवार में रावण के प्रति आस्था की परंपरा शुरू हुई, जिसे आगे की पीढ़ियों ने जारी रखा।
वर्ष 1833 में राम मंदिर की स्थापना का उल्लेख
दूबे परिवार से जुड़े विवरणों के अनुसार, हकीम बीरबल दास के पुत्र ने वर्ष 1833 में श्रीराम मंदिर की स्थापना कराई थी।
इसके बाद रावण की विशाल प्रतिमा का निर्माण कराया गया।
यहां भगवान श्रीराम के मंदिर के साथ रावण की प्रतिमा का मौजूद होना इस स्थल की प्रमुख विशेषता है।
इससे यह भी स्पष्ट होता है कि स्थानीय परंपरा में भगवान श्रीराम के प्रति श्रद्धा और रावण से जुड़ी आस्था को अलग-अलग धार्मिक संदर्भों में देखा जाता है।
यहां के लोगों ने इस परंपरा को अपनी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बना रखा है।
पूजा में निभाई जाती हैं अनोखी रस्में
इस स्थल पर दशहरे के दौरान कुछ विशेष पारंपरिक रस्में भी निभाई जाती रही हैं।
पुराने विवरणों के अनुसार, यहां रावण की प्रतिमा के सामने शराब अर्पित करने और पशु बलि से जुड़ी परंपराओं का उल्लेख मिलता है।
समय के साथ कुछ रस्मों में बदलाव भी आया है। पुराने समाचार विवरणों में बताया गया है कि पशु बलि की जगह सांकेतिक अनुष्ठान अपनाए जाने लगे थे।
हालांकि, वर्तमान वर्ष में इन रस्मों को किस स्वरूप में आयोजित किया जाएगा, इसकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
धार्मिक पर्यटन के रूप में विकसित करने की चर्चा
पायल के इस अनूठे धार्मिक स्थल को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने की संभावनाओं पर भी चर्चा होती रही है।
स्थानीय स्तर पर श्रीलंका सरकार की ओर से मंदिर के कायाकल्प और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने संबंधी प्रस्ताव दिए जाने की बात सामने आई है।
हालांकि, इस संबंध में किसी आधिकारिक समझौते, स्वीकृत परियोजना या वित्तीय सहायता की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
यदि भविष्य में इस स्थल पर पर्यटन सुविधाओं का विस्तार किया जाता है, तो श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए बेहतर व्यवस्थाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं।
इससे स्थानीय व्यापार और रोजगार के अवसरों को भी लाभ मिलने की संभावना है।
पीढ़ियों से परंपरा निभा रहा दूबे परिवार
रावण की पूजा से जुड़ी इस परंपरा को बनाए रखने में स्थानीय दूबे परिवार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
परिवार के सदस्य कई पीढ़ियों से धार्मिक आयोजनों और प्रतिमा से जुड़ी परंपराओं को आगे बढ़ाते आ रहे हैं।
दशहरे के अवसर पर यहां होने वाले अनुष्ठान स्थानीय लोगों के लिए सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुके हैं।
यह परंपरा इस बात का उदाहरण है कि भारत में धार्मिक मान्यताओं और उत्सवों के स्वरूप अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हो सकते हैं।
बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश भी महत्वपूर्ण
दशहरे का त्योहार भगवान श्रीराम की विजय और सत्य, धर्म तथा अच्छाई की स्थापना का प्रतीक माना जाता है।
पायल में रावण की पूजा की परंपरा इससे अलग धार्मिक व्याख्या प्रस्तुत करती है।
रामायण परंपरा में रावण को विद्वान और शिवभक्त होने के साथ अहंकार तथा अधर्म का प्रतीक भी माना जाता है।
इस प्रकार विभिन्न धार्मिक परंपराओं में रावण के चरित्र के अलग-अलग पहलुओं को महत्व दिया जाता है।
पायल में कायम यह प्रथा भारतीय संस्कृति की विविधता और स्थानीय धार्मिक मान्यताओं को दर्शाती है।
करीब दो शताब्दियों से जुड़ी बताई जाने वाली इस परंपरा ने पायल कस्बे को विशिष्ट पहचान दी है। यहां रावण का दहन करने के बजाय उसकी पूजा की जाती है और श्रद्धालु संतान प्राप्ति सहित विभिन्न मनोकामनाओं के लिए प्रार्थना करते हैं।