चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने करीब 26 साल पुराने हत्या के मामले में अहम फैसला सुनाते हुए दो आरोपितों की उम्रकैद की सजा को गैर इरादतन हत्या के मामले में बदल दिया है। अदालत ने माना कि घटना किसी सुनियोजित साजिश या पूर्व नियोजित हमले का परिणाम नहीं थी, बल्कि अचानक हुए विवाद और गुस्से में हुई मारपीट के दौरान यह घटना हुई।

हाई कोर्ट ने मामले में आरोपित बलवान सिंह और बस्ती राम को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304 भाग-दो के तहत दोषी माना। अदालत ने दोनों को सात-सात साल के कठोर कारावास और 10-10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। इससे पहले दोनों आरोपितों को हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।

यह मामला हरियाणा के रेवाड़ी जिले के कोसली थाना क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। घटना 21 मई 2000 की बताई जा रही है। उस समय साझा कुएं और बिजली की मोटर को लेकर दो पक्षों के बीच विवाद हुआ था। विवाद धीरे-धीरे बढ़ गया और मामला मारपीट तक पहुंच गया।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, करीब 70 वर्षीय मूलचंद ने बलवान सिंह के सामने कुएं की मोटर को नुकसान पहुंचाने को लेकर नाराजगी जताई थी। इसी बात को लेकर दोनों पक्षों के बीच कहासुनी शुरू हुई और बाद में विवाद बढ़ गया।

मामले में आरोप लगाया गया था कि विवाद के दौरान आरोपितों ने मूलचंद के साथ मारपीट की, जिससे उनकी मौत हो गई। इसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी। जांच के आधार पर आरोपितों के खिलाफ हत्या सहित अन्य धाराओं में मुकदमा चलाया गया।

निचली अदालत ने सुनवाई के बाद दोनों आरोपितों को हत्या का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद मामले को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी। हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि घटना अचानक हुए विवाद का परिणाम थी और इसमें हत्या की पूर्व योजना नहीं थी।

बचाव पक्ष की दलीलों पर विचार करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि घटना की परिस्थितियों से यह स्पष्ट होता है कि दोनों पक्षों के बीच अचानक विवाद हुआ था। अदालत ने माना कि आरोपितों का उद्देश्य पहले से हत्या करना साबित नहीं होता। इसलिए मामले को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के बजाय धारा 304 भाग-दो के तहत माना जाना उचित है।

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हर हत्या का मामला एक जैसा नहीं होता। किसी घटना में आरोपी की मंशा, परिस्थितियां और घटना से पहले की स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी होता है। इस मामले में अदालत ने पाया कि विवाद अचानक हुआ और गुस्से में मारपीट की स्थिति बनी।

अदालत ने उम्रकैद की सजा को संशोधित करते हुए दोनों आरोपितों को सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। इसके साथ ही प्रत्येक पर 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, हाई कोर्ट का यह फैसला इस बात को स्पष्ट करता है कि अपराध की प्रकृति तय करते समय घटना की परिस्थितियों और आरोपी की मंशा का आकलन महत्वपूर्ण होता है। यदि हत्या की पूर्व योजना या स्पष्ट इरादा साबित नहीं होता, तो अदालत परिस्थितियों के आधार पर सजा में बदलाव कर सकती है।

करीब ढाई दशक पुराने इस मामले में फैसला आने के बाद दोनों पक्षों के बीच लंबे समय से चल रही कानूनी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण पूरा हुआ है। हाई कोर्ट के फैसले से यह भी स्पष्ट हुआ कि न्यायालय केवल आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि पूरे घटनाक्रम और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निर्णय लेता है।

फिलहाल हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार दोनों आरोपितों को संशोधित सजा भुगतनी होगी। अदालत ने मामले में हत्या की धारा को बदलते हुए इसे गैर इरादतन हत्या की श्रेणी में माना है।

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