भुवनेश्वर : भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और संबलपुर से विधायक जयनारायण मिश्रा ने भाषा तथा राज्य गीत को लेकर बयान देकर नया विवाद खड़ा कर दिया है। उन्होंने दावा किया कि संबलपुरी ही ओडिशा की असली भाषा है और वर्तमान ओडिया भाषा पर बंगाली भाषा का प्रभाव पड़ा है। मिश्रा ने राज्य गीत ‘वंदे उत्कल जननी’ पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि यह गीत पूरे राज्य का प्रतिनिधित्व नहीं करता।

राज्य के पूर्व मंत्री और पूर्व नेता प्रतिपक्ष जयनारायण मिश्रा ने गुरुवार को कहा कि ओडिशा में बड़ी संख्या में लोग संबलपुरी भाषा में बातचीत करते हैं। उन्होंने दावा किया कि संबलपुरी बोलने वाले लोगों की संख्या ओडिया बोलने वालों से भी अधिक है। इसी आधार पर उन्होंने संबलपुरी को राज्य की वास्तविक भाषा बताए जाने की वकालत की।

मिश्रा ने कहा, “ओडिशा में काफी लोग संबलपुरी में बातचीत करते हैं। इनकी संख्या ओडिया बोलने वालों से भी ज्यादा है। इसलिए संबलपुरी ही ओडिशा की असली भाषा है। आज की ओडिया भाषा पर बंगाली भाषा का असर पड़ा है।” उनके इस बयान के बाद भाषा, क्षेत्रीय पहचान और राज्य की सांस्कृतिक एकता को लेकर बहस शुरू होने की संभावना है।

संबलपुर और राज्य के पश्चिम गीत को लेकर मिश्रा के विचार नए नहीं हैं। इससे पहले भी उन्होंने ‘वंदे उत्कल जननी’ पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना रहा है कि यह गीत मुख्य रूप से उत्कल क्षेत्र की प्रशंसा करता है, जबकि पश्चिमी और दक्षिणी हिस्सों के ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक योगदान को पर्याप्त जगह नहीं देता। उनके पुराने बयान को राज्य सरकार ने उनकी निजी राय बताया था।  

मिश्रा ने अपने ताजा बयान में कहा कि राज्य गीत में अविभाजित संबलपुर क्षेत्र के साथ बलांगीर, कालाहांडी और अथमालिक जैसे क्षेत्रों का भी प्रतिनिधित्व होना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि वर्तमान राज्य की पहचान केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। अलग-अलग भौगोलिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों को जोड़कर आधुनिक ओडिशा का निर्माण हुआ है, इसलिए राज्य गीत में सभी हिस्सों की भावना दिखाई देनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि ‘वंदे उत्कल जननी’ गीत पूरे ओडिशा का प्रतिनिधित्व नहीं करता, क्योंकि इसमें उत्कल क्षेत्र का गुणगान किया गया है। मिश्रा के अनुसार, राज्य गीत ऐसा होना चाहिए जिसे पश्चिमी, तटीय, उत्तरी और दक्षिणी क्षेत्रों के लोग समान रूप से अपना मान सकें। उन्होंने गीत के मौजूदा स्वरूप पर पुनर्विचार किए जाने की आवश्यकता जताई।

‘वंदे उत्कल जननी’ की रचना प्रसिद्ध कवि कांतकवि लक्ष्मीकांत महापात्र ने की थी। यह गीत लंबे समय से ओडिया अस्मिता, संस्कृति और भाषा के सम्मान से जुड़ा रहा है। जून 2020 में इसे औपचारिक रूप से राज्य गीत का दर्जा दिया गया था। सरकारी और सार्वजनिक कार्यक्रमों में निर्धारित नियमों के अनुसार इसका गायन किया जाता है।

जयनारायण मिश्रा के बयान से तटीय और पश्चिमी ओडिशा की भाषाई तथा क्षेत्रीय पहचान का पुराना मुद्दा फिर चर्चा में आ गया है। संबलपुरी को कई लोग स्वतंत्र भाषाई पहचान के रूप में देखते हैं, जबकि इसे कोसली या संबलपुरी-कोसली नाम से भी जाना जाता है। पश्चिमी क्षेत्रों में इसके अलग-अलग स्थानीय रूप प्रचलित हैं और लोकगीत, नृत्य, नाटक एवं साहित्य की समृद्ध परंपरा इससे जुड़ी हुई है।

संबलपुरी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग भी लंबे समय से उठती रही है। इसके समर्थकों का कहना है कि इस भाषा का अपना व्यापक शब्द भंडार, साहित्य, लोक संस्कृति और बोलने वालों का बड़ा समुदाय है। इसके संरक्षण और विकास के लिए शिक्षा, प्रशासन तथा सांस्कृतिक संस्थानों में उचित स्थान मिलना चाहिए।

दूसरी ओर, ओडिया राज्य की आधिकारिक भाषा है और उसे भारत सरकार ने शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया है। ओडिया की अपनी प्राचीन साहित्यिक परंपरा और स्वतंत्र भाषाई विकास रहा है। भाषा विशेषज्ञों के बीच विभिन्न भारतीय भाषाओं पर पारस्परिक प्रभाव को स्वीकार किया जाता है, लेकिन किसी भाषा को दूसरी भाषा से प्रभावित बताकर उसकी मौलिकता पर सवाल उठाना संवेदनशील विषय माना जाता है।

भाषाविदों के अनुसार, पड़ोसी क्षेत्रों की भाषाओं के बीच शब्दों और उच्चारण का आदान-प्रदान स्वाभाविक है। ओडिया, बंगाली, असमिया और अन्य पूर्वी भारतीय भाषाएं भारतीय-आर्य भाषा परिवार से जुड़ी हैं। ऐतिहासिक संपर्क के कारण उनमें कुछ समानताएं हो सकती हैं, लेकिन प्रत्येक भाषा ने अलग व्याकरण, लिपि, साहित्य और सांस्कृतिक पहचान विकसित की है। इसलिए मिश्रा के दावे पर भाषाविदों की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होगी।

राजनीतिक रूप से भी यह बयान भाजपा के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है। पार्टी राज्य में सत्ता में है और भाषा तथा सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़े मुद्दों पर संवेदनशीलता बरतती रही है। यदि विपक्ष इस बयान को ओडिया भाषा या राज्य गीत के अपमान से जोड़ता है तो राजनीतिक विवाद तेज हो सकता है। इससे पहले भी इसी तरह की टिप्पणी के बाद सरकार ने मिश्रा के विचारों से दूरी बनाई थी।

साल 2025 में भी मिश्रा ने राज्य गीत पर सवाल उठाते हुए कहा था कि इसमें केवल एक क्षेत्र का गुणगान किया गया है। उस समय उनकी टिप्पणी पर कई राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने आपत्ति दर्ज की थी।  

विपक्षी दल अब भाजपा नेतृत्व से यह स्पष्ट करने की मांग कर सकते हैं कि वह विधायक के बयान का समर्थन करता है या इसे उनकी निजी राय मानता है। राज्य गीत और आधिकारिक भाषा जैसे मुद्दे सरकार की नीति से जुड़े होते हैं। इसलिए पार्टी या सरकार का आधिकारिक रुख सामने आने के बाद विवाद की दिशा अधिक स्पष्ट होगी।

संबलपुरी भाषा और संस्कृति को सम्मान देने की मांग व्यापक रूप से स्वीकार की जाती रही है, लेकिन इसे ओडिया भाषा के मुकाबले खड़ा करने की कोशिश पर सवाल उठ सकते हैं। सांस्कृतिक संगठनों का मानना है कि राज्य की विविधता का सम्मान करते हुए सभी भाषाओं और बोलियों के संरक्षण के लिए कदम उठाए जाने चाहिए। एक भाषा की पहचान मजबूत करने के लिए दूसरी भाषा की ऐतिहासिक भूमिका को कम नहीं किया जाना चाहिए।

फिलहाल जयनारायण मिश्रा के बयान ने भाषा और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की बहस को फिर हवा दे दी है। आने वाले दिनों में राजनीतिक दलों, साहित्यकारों, भाषाविदों और सांस्कृतिक संगठनों की प्रतिक्रिया सामने आने की संभावना है। यह भी देखना होगा कि राज्य सरकार इस विवाद पर क्या रुख अपनाती है और भाजपा अपने वरिष्ठ विधायक के बयान को किस रूप में देखती है।

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