जंगल से बचाए गए पांच ओरंगुटानों की नंदनकानन में निगरानी, दो का इलाज जारी
भुवनेश्वर : जंगल से बचाए गए पांच ओरंगुटानों को नंदनकानन जूलॉजिकल पार्क में कड़ी निगरानी में रखा गया है। इनमें से दो ओरंगुटानों का स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण उपचार किया जा रहा है, जबकि शेष तीन की हालत स्थिर बताई गई है। चिड़ियाघर प्रशासन ने पांचों वन्यजीवों को दूसरे जानवरों से अलग क्वारंटीन क्षेत्र में रखा है, जहां पशु चिकित्सकों की टीम नियमित रूप से उनके स्वास्थ्य की जांच कर रही है।
नंदनकानन जूलॉजिकल पार्क के उपनिदेशक प्रदीप मिरासे ने बताया कि पांच में से एक ओरंगुटान को बुखार हो गया था। चिकित्सकों ने उसकी जांच करने के बाद उपचार शुरू कर दिया है। दवाएं दिए जाने के बाद उसकी हालत में सुधार दिखाई दे रहा है। उसके शरीर के तापमान और खानपान पर लगातार नजर रखी जा रही है। चिकित्सक यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि बुखार किसी गंभीर संक्रमण का संकेत न हो।
एक अन्य युवा ओरंगुटान के मल के नमूने की जांच में कृमि संक्रमण की पुष्टि हुई है। इसके बाद उसे संक्रमण दूर करने वाली जरूरी दवाएं दी गई हैं। चिड़ियाघर प्रशासन के मुताबिक, उसकी हालत भी नियंत्रण में है और इलाज का असर देखने के लिए नियमित जांच की जा रही है। संक्रमण के कारण उसकी भूख, वजन और सामान्य गतिविधियों पर विशेष निगरानी रखी जा रही है।
तीन अन्य ओरंगुटानों की हालत फिलहाल स्थिर है। हालांकि, जंगल में मिलने और फिर लंबी यात्रा के बाद चिड़ियाघर लाए जाने से उनमें तनाव की स्थिति हो सकती है। इसे देखते हुए उनके लिए शांत और नियंत्रित वातावरण तैयार किया गया है। उनके खानपान, व्यवहार, नींद और शारीरिक गतिविधियों का रिकॉर्ड रखा जा रहा है। चिकित्सकों और पशुपालकों की टीम चौबीसों घंटे उनकी देखभाल में लगी हुई है।
जिस स्थान पर ओरंगुटानों को क्वारंटीन किया गया है, वहां संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए नियमित रूप से कीटाणुनाशक का छिड़काव किया जा रहा है। वहां प्रवेश करने वाले कर्मचारियों के लिए भी विशेष सावधानियां निर्धारित की गई हैं। देखभाल से जुड़े उपकरणों, बर्तनों और अन्य सामान को उपयोग के बाद साफ और संक्रमणमुक्त किया जा रहा है। इसका उद्देश्य ओरंगुटानों के बीच तथा वहां मौजूद दूसरे वन्यजीवों तक किसी बीमारी के प्रसार को रोकना है।
इन युवा ओरंगुटानों के लिए विशेष आहार भी तैयार किया गया है। उनकी उम्र, स्वास्थ्य और पोषण संबंधी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए फल और अन्य उपयुक्त खाद्य पदार्थ दिए जा रहे हैं। पशु विशेषज्ञों की सलाह पर भोजन की मात्रा और समय निर्धारित किया गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार उन्हें तापमान नियंत्रित क्वारंटीन क्षेत्र में रखा गया है और फल, खिलौने तथा झूलने के लिए स्लिंग उपलब्ध कराए गए हैं, ताकि नए वातावरण में उनका शारीरिक और मानसिक तनाव कम किया जा सके। इंडियन एक्सप्रेस
चिड़ियाघर प्रशासन पांचों ओरंगुटानों की डीएनए जांच कराने की तैयारी भी कर रहा है। प्रदीप मिरासे के अनुसार, उनके पूरी तरह स्वस्थ होने के करीब 10 दिन बाद खून के नमूने लिए जाएंगे। यह प्रक्रिया केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण की सलाह के अनुसार पूरी की जाएगी। डीएनए जांच से ओरंगुटानों की प्रजाति, आनुवंशिक संबंध और संभावित मूल क्षेत्र के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलने की उम्मीद है।
ओरंगुटान भारत के प्राकृतिक वन्यजीव नहीं हैं। वे मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया के बोर्नियो तथा सुमात्रा द्वीपों के वर्षावनों में पाए जाते हैं। ऐसे में पांच युवा ओरंगुटानों का भारतीय जंगल में मिलना असामान्य घटना है। उनकी मौजूदगी ने इस आशंका को जन्म दिया है कि उन्हें अवैध अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव तस्करी के जरिए भारत लाया गया होगा और किसी कारण से जंगल में छोड़ दिया गया। हालांकि, उनकी उत्पत्ति और यहां पहुंचने की वास्तविक परिस्थितियों की आधिकारिक पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।
स्थानीय लोगों की नजर पड़ने के बाद वन विभाग को ओरंगुटानों के बारे में सूचना दी गई थी। इसके बाद अधिकारियों ने उन्हें सुरक्षित बचाकर नंदनकानन जूलॉजिकल पार्क पहुंचाया। पांचों युवा ओरंगुटानों को चिड़ियाघर में अलग रखकर चिकित्सकीय परीक्षण शुरू किया गया। वन्यजीव तस्करी की आशंका को देखते हुए संबंधित एजेंसियों ने इस मामले की जांच भी प्रारंभ कर दी है। अधिकारियों का प्रयास यह पता लगाना है कि ये वन्यजीव किस रास्ते से भारत पहुंचे और उन्हें जंगल में छोड़ने के पीछे कौन लोग शामिल हो सकते हैं।
मामले की गंभीरता इसलिए भी अधिक है क्योंकि ओरंगुटान की विभिन्न प्रजातियां विलुप्ति के गंभीर खतरे का सामना कर रही हैं। इनके प्राकृतिक आवासों की कटाई, जंगलों में आग, खनन और अवैध शिकार के कारण इनकी आबादी प्रभावित हुई है। अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत ओरंगुटानों के व्यावसायिक व्यापार पर प्रतिबंध है। इसके बावजूद कम उम्र के ओरंगुटानों को पकड़कर अवैध रूप से बेचने की घटनाएं संरक्षण एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं।
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, कम उम्र के ओरंगुटानों को उनकी मां से अलग किए जाने के बाद शारीरिक के साथ मानसिक समस्याएं भी हो सकती हैं। ऐसे जानवरों को नए वातावरण के अनुकूल बनाने के लिए लंबे समय तक विशेषज्ञ देखभाल की जरूरत पड़ती है। इसी कारण नंदनकानन प्रशासन उनके स्वास्थ्य सुधार के साथ व्यवहार में हो रहे बदलावों का भी अध्ययन कर रहा है।
फिलहाल चिड़ियाघर प्रशासन की पहली प्राथमिकता सभी पांचों ओरंगुटानों को पूरी तरह स्वस्थ करना है। इसके बाद केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण और अन्य विशेषज्ञ संस्थाओं की सलाह से उनके भविष्य को लेकर निर्णय लिया जाएगा। प्रस्तावित डीएनए जांच और संबंधित एजेंसियों की पड़ताल से इन दुर्लभ वन्यजीवों की पहचान तथा उनके भारत पहुंचने की पूरी कहानी सामने आने की उम्मीद है।