भुवनेश्वर। ओडिशा की निर्माण श्रमिक कल्याण योजना में कथित बड़ी अनियमितता सामने आई है। एक ड्राफ्ट ऑडिट रिपोर्ट में दावा किया गया है कि योजना के तहत मृत घोषित किए गए हजारों श्रमिकों के नाम पर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) और राज्य खाद्य सुरक्षा योजना (SFSS) के तहत सब्सिडी वाला अनाज जारी होता रहा।
रिपोर्ट के अनुसार, 2,487 ऐसे निर्माण श्रमिकों के रिकॉर्ड मिले हैं, जिन्हें आधिकारिक रूप से मृत घोषित किया जा चुका था, लेकिन इसके बाद भी उनके नाम से राशन का लाभ जारी रहने की बात सामने आई है।
ऑडिट में बताया गया कि कई मामलों में श्रमिकों के नॉमिनी को मृत्यु लाभ का भुगतान किया गया, लेकिन इसके बाद भी उन्हीं लाभार्थियों के आधार विवरण के जरिए राशन लेने की प्रक्रिया पूरी होती रही।
ड्राफ्ट रिपोर्ट के अनुसार, ऑडिट में 753 ऐसे मामले सामने आए, जहां श्रमिकों के मृत घोषित होने के बाद भी कई बार आधार प्रमाणीकरण किया गया। रिपोर्ट में इस स्थिति को लेकर सवाल उठाए गए हैं कि जब श्रमिकों की मृत्यु दर्ज हो चुकी थी, तो उनके नाम पर राशन वितरण कैसे जारी रहा।
ऑडिट रिपोर्ट में बताया गया है कि इन 753 मामलों में मृत श्रमिकों के नॉमिनी को मृत्यु मुआवजे के रूप में कुल 15.10 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया। इसके बावजूद संबंधित लाभार्थियों के नाम पर राशन लेने की गतिविधियां दर्ज होने की बात कही गई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि आधार प्रमाणीकरण यह संकेत देता है कि राशन लेने के समय लाभार्थी की मौजूदगी दर्ज हुई थी। ऐसे में मृत्यु रिकॉर्ड और बाद में हुए लेनदेन की वैधता को लेकर जांच की जरूरत बताई गई है।
निर्माण श्रमिक कल्याण योजना का उद्देश्य राज्य के निर्माण क्षेत्र से जुड़े श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना है। इसके तहत पंजीकृत श्रमिकों और उनके परिवारों को विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का लाभ दिया जाता है।
मृत्यु की स्थिति में श्रमिकों के नामित परिजनों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाती है। लेकिन ऑडिट में सामने आए मामलों ने योजना के रिकॉर्ड प्रबंधन और लाभ वितरण प्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं।
रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि लाभार्थियों के डेटा, मृत्यु रिकॉर्ड और आधार आधारित प्रमाणीकरण के बीच समन्वय की कमी हो सकती है। ऐसे मामलों में रिकॉर्ड की जांच और जिम्मेदारी तय करने की जरूरत बताई गई है।
ऑडिट टीम ने सरकारी विभागों से इन मामलों की समीक्षा करने और यह पता लगाने को कहा है कि ऐसी स्थिति कैसे बनी। साथ ही यह भी जांच का विषय है कि क्या किसी स्तर पर जानबूझकर रिकॉर्ड में गड़बड़ी की गई या यह प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम है।
सरकारी योजनाओं में आधार आधारित प्रमाणीकरण का उद्देश्य लाभ सही व्यक्ति तक पहुंचाना और फर्जी लाभार्थियों को रोकना होता है। लेकिन इस मामले में आधार रिकॉर्ड और मृत्यु प्रमाण से जुड़े विरोधाभास सामने आने के बाद सिस्टम की निगरानी व्यवस्था पर चर्चा शुरू हो गई है।
फिलहाल यह रिपोर्ट ड्राफ्ट चरण में है और संबंधित विभागों की ओर से इस पर प्रतिक्रिया आना बाकी है। अंतिम रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कितने मामलों में वास्तविक अनियमितता हुई और कितने मामले रिकॉर्ड संबंधी त्रुटियों से जुड़े हैं।
इस मामले ने कल्याणकारी योजनाओं में डेटा प्रबंधन, लाभार्थियों के सत्यापन और निगरानी व्यवस्था को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी योजनाओं में नियमित ऑडिट और रिकॉर्ड अपडेट की प्रक्रिया मजबूत होना जरूरी है, ताकि वास्तविक लाभार्थियों तक सहायता पहुंच सके।
अब नजर इस बात पर है कि ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर राज्य सरकार और संबंधित विभाग आगे क्या कदम उठाते हैं और कथित गड़बड़ियों को दूर करने के लिए कौन-से सुधार लागू किए जाते हैं।