कटक: ओडिशा उच्च न्यायालय ने नयागढ़ जिले के एक आपराधिक मामले में आरोपी व्यक्ति की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उसने अपने खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने की मांग की थी। अदालत ने पाया कि उस व्यक्ति ने जानबूझकर यह बात छिपाई थी कि उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय, दोनों ही जगहों से उसकी अग्रिम जमानत (anticipatory bail) याचिकाएं खारिज हो चुकी थीं।

न्यायमूर्ति सिबो शंकर मिश्रा ने याचिकाकर्ता पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया, क्योंकि वह "साफ नीयत" (clean hands) के साथ अदालत के सामने नहीं आया था। उन्होंने याचिकाकर्ता को यह राशि ओडिशा मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा करने का निर्देश दिया।

न्यायमूर्ति मिश्रा ने बेनुधर प्रधान द्वारा दायर एक याचिका को खारिज करते हुए यह आदेश दिया। प्रधान ने 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' (BNSS) की धारा 528 के तहत फटेगढ़ पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR को रद्द करने की मांग की थी। प्रधान पर 'भारतीय न्याय संहिता' (BNS), 2023 की विभिन्न धाराओं के तहत हत्या के प्रयास सहित कई अपराधों का आरोप है। इस मामले में जांच चल रही है और यह मामला भापुर के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) के समक्ष लंबित है।

उच्च न्यायालय ने गौर किया कि प्रधान ने 21 अक्टूबर को FIR रद्द करने की याचिका दायर की थी, जबकि इससे पहले 10 सितंबर को उच्च न्यायालय और 16 अक्टूबर को सर्वोच्च न्यायालय ने उसकी अग्रिम जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं। हालांकि, उसने अपनी नई याचिका में इन दोनों आदेशों के बारे में कोई जानकारी नहीं दी।

न्यायाधीश ने कहा कि याचिकाकर्ता का यह कर्तव्य था कि वह पहले आए न्यायिक आदेशों के बारे में पूरी और स्पष्ट जानकारी दे। जब यह मुद्दा उठाया गया, तो याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि उच्च न्यायालय के नियमों के अनुसार, BNSS की धारा 528 के तहत FIR रद्द करने की याचिका दायर करते समय, पहले खारिज हुई अग्रिम जमानत याचिका का जिक्र करना जरूरी नहीं है।

 

Tags: