मणिपुर : होने वाली जनगणना प्रक्रिया को केंद्र सरकार ने फिलहाल स्थगित कर दिया है। राज्य में जनगणना की शुरुआत से पहले ही इसे टालने का फैसला लिया गया। सरकार के इस कदम के बाद कई सवाल उठ रहे हैं कि आखिर मणिपुर में जनगणना क्यों रोकी गई और इसके पीछे क्या वजह है।
मिली जानकारी के अनुसार, मणिपुर में जनगणना को लेकर पिछले कुछ समय से विवाद चल रहा था। कई नागरिक संगठनों और सामाजिक समूहों की मांग थी कि पहले राज्य में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस यानी NRC की प्रक्रिया पूरी की जाए और उसके बाद ही जनगणना कराई जाए। इन संगठनों का तर्क था कि राज्य में नागरिकता से जुड़े मुद्दों को स्पष्ट किए बिना जनसंख्या के आंकड़े सही तस्वीर नहीं दिखा पाएंगे।
NRC की मांग बनी विवाद की बड़ी वजह
मणिपुर में कई संगठनों की ओर से "पहले NRC फिर जनगणना" की मांग उठाई जा रही थी। इनका कहना है कि राज्य में अवैध प्रवासन और आबादी में बदलाव जैसे मुद्दों को देखते हुए पहले नागरिकों की पहचान सुनिश्चित होनी चाहिए। कुछ संगठनों ने 1951 के आंकड़ों को आधार बनाकर NRC अपडेट करने की मांग भी रखी है।
इन संगठनों का आरोप है कि पड़ोसी देशों से अवैध घुसपैठ के कारण राज्य की जनसांख्यिकी में बदलाव आया है। उनका कहना है कि अगर पहले नागरिकता की स्थिति साफ नहीं हुई तो जनगणना के आंकड़ों पर सवाल उठ सकते हैं।
अमित शाह की बैठक के बाद लिया गया फैसला
मणिपुर में जनगणना स्थगित करने का फैसला केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई बैठक के बाद लिया गया। बैठक में मणिपुर के राज्यपाल, मुख्यमंत्री और गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। इसके बाद केंद्र ने राज्य में जनगणना प्रक्रिया को अगले आदेश तक टालने का निर्णय लिया।
हालांकि सरकार की ओर से अभी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि जनगणना की नई तारीख क्या होगी। फिलहाल मणिपुर को आगामी जनगणना चरण से अलग रखा गया है।
जातीय तनाव भी बना चुनौती
मणिपुर पिछले कुछ समय से जातीय हिंसा और सामाजिक तनाव से जूझ रहा है। ऐसे हालात में जनगणना कराने को लेकर सुरक्षा और प्रशासनिक चुनौतियां भी सामने आ रही थीं। राज्य के कई इलाकों में सामान्य स्थिति बहाल करने की कोशिश जारी है। ऐसे में सरकार के सामने यह चुनौती थी कि जनगणना की प्रक्रिया निष्पक्ष और सुरक्षित तरीके से कैसे पूरी कराई जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि जनगणना सिर्फ आबादी गिनने की प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि इसके आंकड़ों का इस्तेमाल भविष्य की योजनाओं, संसाधनों के वितरण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े फैसलों में किया जाता है। इसलिए मणिपुर जैसे संवेदनशील राज्य में आंकड़ों की विश्वसनीयता बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
अलग-अलग समुदायों की अलग राय
मणिपुर में जनगणना और NRC को लेकर समुदायों के बीच अलग-अलग राय सामने आई है। कुछ संगठन NRC को जरूरी बता रहे हैं, जबकि कुछ समूहों का कहना है कि पहले जनगणना होनी चाहिए ताकि राज्य की वास्तविक जनसंख्या और सामाजिक स्थिति का पता चल सके।
विरोध करने वाले संगठनों का कहना है कि NRC जैसी प्रक्रिया लंबी और जटिल हो सकती है, जिससे आम लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। वहीं NRC समर्थक समूहों का तर्क है कि नागरिकता से जुड़े सवालों का समाधान किए बिना जनगणना अधूरी रहेगी।
आगे क्या होगा
अब सबकी नजर केंद्र सरकार के अगले फैसले पर है। मणिपुर में जनगणना कब शुरू होगी और क्या इससे पहले NRC को लेकर कोई कदम उठाया जाएगा, यह आने वाले दिनों में साफ होगा। फिलहाल सरकार ने राज्य में जनगणना प्रक्रिया को रोककर संवेदनशील मुद्दे पर आगे की रणनीति बनाने का संकेत दिया है।
मणिपुर का यह मामला सिर्फ एक राज्य की जनगणना तक सीमित नहीं है, बल्कि नागरिकता, सुरक्षा और सामाजिक संतुलन जैसे बड़े मुद्दों से जुड़ा हुआ है। इसलिए केंद्र सरकार इस पर बेहद सावधानी से आगे बढ़ रही है।
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