नासिक : वन विभाग के कामकाज और वन्यजीव संरक्षण योजनाओं को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इंसानों और जंगली जानवरों के बीच बढ़ते संघर्ष या दुर्घटनाओं में घायल और अपंग होने वाले वन्यजीवों के इलाज और पुनर्वास के लिए बनाई गई योजनाओं पर बजट की कमी का असर पड़ता दिखाई दे रहा है।
वित्तीय वर्ष 2026-27 के दौरान अपंग जंगली जानवरों के लिए पुनर्वास केंद्र स्थापित करने की एक बड़ी योजना तैयार की गई थी। इसके लिए ₹152.60 करोड़ के बजट को मंजूरी दी गई थी। लेकिन बाद में राजस्व और वन विभाग की ओर से केवल ₹39.68 करोड़ की राशि ही स्वीकृत की गई।
इसका मतलब है कि कुल स्वीकृत बजट का 25 प्रतिशत से भी कम हिस्सा उपलब्ध कराया गया, जबकि लगभग 75 प्रतिशत राशि रोक दी गई। इस फैसले के बाद वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोगों और अधिकारियों के बीच चिंता बढ़ गई है।
पुनर्वास केंद्रों की योजना पर असर
वन विभाग की योजना का उद्देश्य उन जंगली जानवरों को सुरक्षित आश्रय और इलाज उपलब्ध कराना था, जो दुर्घटनाओं, मानव-वन्यजीव संघर्ष या अन्य कारणों से घायल होकर सामान्य जीवन जीने में सक्षम नहीं रह जाते।
ऐसे जानवरों के लिए विशेष पुनर्वास केंद्र बनाए जाने थे, जहां उनका इलाज, देखभाल और संरक्षण किया जा सके। लेकिन बजट में बड़ी कटौती होने से इन योजनाओं के क्रियान्वयन पर असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि घायल और अपंग जानवरों की देखभाल के लिए पर्याप्त संसाधनों की जरूरत होती है। केवल घोषणा करने से काम नहीं चलेगा, इसके लिए पर्याप्त बजट और लगातार निगरानी जरूरी है।
प्रशासनिक लापरवाही के आरोप
मामले में प्रशासनिक स्तर पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि बजट स्वीकृति और फंड जारी करने की प्रक्रिया में देरी और तकनीकी अड़चनों के कारण योजना प्रभावित हुई।
नागपुर स्थित अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक (बजट, योजना और विकास) के कार्यालय की गतिविधियों से भी इस बात का संकेत मिलता है कि फंड उपलब्ध कराने के लिए लगातार प्रयास किए गए।
जानकारी के अनुसार, 15 मई 2026 से 7 अगस्त 2026 के बीच नागपुर मुख्यालय ने प्रस्तावों और फंड की मांग को लेकर करीब 12 बार पत्राचार किया। इसके बावजूद अपेक्षित राशि पूरी तरह जारी नहीं हो सकी।
कागजों तक सीमित रहने का आरोप
वन विभाग पर पहले भी आरोप लगते रहे हैं कि कई योजनाएं कागजों पर तो तैयार होती हैं, लेकिन जमीन पर उनका असर दिखाई नहीं देता।
वन्यजीवों के इलाज और पुनर्वास को लेकर भी इसी तरह की चिंता जताई जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय पर पर्याप्त धन उपलब्ध नहीं कराया गया तो घायल वन्यजीवों की देखभाल और संरक्षण में मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ने की चुनौती
देश के कई हिस्सों में मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं। जंगलों के क्षेत्र में बदलाव, विकास कार्यों और अन्य कारणों से जंगली जानवर कई बार मानव आबादी के करीब पहुंच जाते हैं।
इस दौरान कई जानवर घायल हो जाते हैं या दुर्घटनाओं का शिकार हो जाते हैं। ऐसे मामलों में पुनर्वास केंद्रों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है।
बजट बढ़ाने की मांग
वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोगों का कहना है कि सरकार को ऐसी योजनाओं के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध कराना चाहिए। उनका कहना है कि वन्यजीव केवल पर्यावरण का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने मांग की है कि स्वीकृत बजट को जल्द से जल्द जारी किया जाए, ताकि पुनर्वास केंद्रों की स्थापना और संचालन का काम प्रभावित न हो।
विभागीय स्तर पर जारी प्रयास
हालांकि, वन विभाग की ओर से लगातार फंड उपलब्ध कराने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। नागपुर मुख्यालय द्वारा बार-बार पत्र भेजे जाने से यह स्पष्ट होता है कि विभाग योजना को आगे बढ़ाने के लिए प्रयासरत है।
अब देखना होगा कि सरकार और संबंधित विभाग इस योजना के लिए शेष राशि कब तक उपलब्ध कराते हैं।
वन्यजीव संरक्षण के लिए जरूरी कदम
वन्यजीवों के संरक्षण के लिए केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है। उनके सफल संचालन के लिए पर्याप्त बजट, प्रशिक्षित कर्मचारी और बेहतर सुविधाओं की जरूरत होती है।
₹152.60 करोड़ की योजना में सीमित फंड मिलने से एक बार फिर यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या वन्यजीव पुनर्वास जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं को प्राथमिकता मिल रही है या नहीं। अब सभी की नजर इस बात पर है कि सरकार इस दिशा में आगे क्या कदम उठाती है।