दत्तात्रेय होसबाले बोले, ज्ञान-कौशल-संस्कार से बनेगी बेहतर शिक्षा

Update: 2026-08-01 14:11 GMT

मुंबई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने शिक्षा के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि ज्ञान, कौशल और चरित्र तीनों का समन्वय ही वास्तविक शिक्षा है। उन्होंने कहा कि विकसित भारत के निर्माण के लिए केवल आर्थिक रूप से सक्षम नागरिक ही नहीं, बल्कि संस्कारित, चरित्रवान, आत्मविश्वासी और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना भी जरूरी है।

होसबाले मुंबई में आयोजित 'विकसित भारत हेतु शिक्षा' विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। यह कार्यक्रम शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास और मुंबई विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज मुंबई में आयोजित किया गया था। कार्यक्रम में देशभर के शिक्षाविदों, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों, नीति-निर्माताओं, विश्वविद्यालयों के कुलपतियों और तकनीकी संस्थानों के निदेशकों ने हिस्सा लिया।

अपने संबोधन में दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं होना चाहिए, बल्कि विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जीवन के चार महत्वपूर्ण आयाम माने गए हैं और शिक्षा व्यवस्था को इन सभी पहलुओं के संतुलित विकास के लिए विद्यार्थियों को तैयार करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि आज के समय में संवादहीनता एक बड़ी चुनौती बन गई है। समाज और नई पीढ़ी के बीच संवाद को फिर से मजबूत करने की जरूरत है। होसबाले ने कहा कि वर्तमान पीढ़ी को उसी तरीके से नहीं पढ़ाया जा सकता, जिस तरह पिछली पीढ़ियों को पढ़ाया गया था। समय और परिस्थितियों के अनुसार शिक्षा की पद्धतियों में बदलाव जरूरी है।

उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य केवल एक 'फैक्ट्री' की तरह विद्यार्थियों को तैयार करना नहीं है, बल्कि एक मजबूत सभ्यता और समाज का निर्माण करना है। इसके लिए मानव जीवन से जुड़े सभी पहलुओं पर ध्यान देना होगा। उन्होंने कहा कि विकसित भारत 2047 केवल एक लक्ष्य नहीं, बल्कि एक सतत यात्रा है। समय के अनुसार नीतियों में बदलाव हो सकता है, लेकिन देश की मूल संस्कृति और मूल्यों को बनाए रखना जरूरी है।

होसबाले ने भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान के बीच बेहतर तालमेल की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा में जीवन, प्रकृति और समाज को समझने की गहरी दृष्टि रही है। आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ इस ज्ञान को जोड़कर एक ऐसी शिक्षा प्रणाली विकसित की जा सकती है, जो भविष्य की जरूरतों को पूरा कर सके।

उन्होंने कहा कि विकसित भारत का निर्माण केवल आर्थिक विकास से संभव नहीं होगा। इसके लिए ऐसे नागरिकों की जरूरत है, जो जिम्मेदार, आत्मनिर्भर और समाज के प्रति संवेदनशील हों। शिक्षा संस्थानों को विद्यार्थियों में नेतृत्व क्षमता, नैतिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना विकसित करनी चाहिए।

संगोष्ठी में शिक्षा, उद्योग, शासन और समाज के विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों ने विकसित भारत-2047 के लिए शिक्षा की भूमिका पर चर्चा की। वक्ताओं ने कौशल विकास, नई तकनीक, भारतीय मूल्यों और रोजगारपरक शिक्षा को मजबूत करने पर अपने विचार रखे।

गौरतलब है कि इससे पहले भी विकसित भारत हेतु शिक्षा विषय पर देश के विभिन्न राज्यों में ज्ञान सभाओं का आयोजन किया जा चुका है। केरल के कोच्चि में आयोजित कार्यक्रम में देशभर के प्रमुख शिक्षाविदों ने शिक्षा के भविष्य को लेकर मंथन किया था। इसके बाद महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और दिल्ली समेत कई राज्यों में इस विषय पर चर्चा हुई।

मुंबई में आयोजित यह संगोष्ठी उसी श्रृंखला का अगला चरण थी, जिसमें शिक्षा जगत के साथ-साथ उद्योग और आर्थिक क्षेत्र के लोगों को भी एक मंच पर लाकर विकसित भारत के लिए शिक्षा की दिशा पर विचार किया गया।

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