मुंबई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुंबई दौरे से ठीक एक दिन पहले बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स (BKC) स्थित जियो वर्ल्ड प्लाजा में कथित तौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) का फर्जी पहचान पत्र दिखाकर प्रवेश करने के मामले की जांच अब मुंबई क्राइम ब्रांच की क्राइम इंटेलिजेंस यूनिट (CIU) ने अपने हाथ में ले ली है। इस मामले में रोहन प्रेमल पारेख और उनके बॉडीगार्ड दिलीप राजाराम कुंडे को गिरफ्तार किया गया था। वहीं, पुलिस को मामले में वांछित प्रथमेश बागुल की तलाश है। पुलिस ने फरार आरोपी के घर पर नोटिस भेजकर उसे जांच में शामिल होने के लिए कहा है।
मामला प्रधानमंत्री के मुंबई दौरे से जुड़ा होने के कारण सुरक्षा के लिहाज से भी संवेदनशील माना जा रहा है। CIU के जांच संभालने के बाद अब पुलिस आरोपियों की गतिविधियों, कथित पहचान पत्र, उनके संपर्कों और उस दस्तावेज को तैयार करने या उपलब्ध कराने वाले लोगों की भूमिका की जांच कर रही है।
कथित फर्जी PMO ID से प्रवेश का आरोप
पुलिस के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुंबई दौरे से एक दिन पहले पारेख और उनके बॉडीगार्ड दिलीप राजाराम कुंडे BKC स्थित जियो वर्ल्ड प्लाजा पहुंचे थे। आरोप है कि परिसर में प्रवेश के दौरान पारेख ने PMO से जुड़ा होने का दावा करते हुए कथित तौर पर एक फर्जी पहचान पत्र दिखाया।
हाई-प्रोफाइल परिसर में इस तरह के पहचान पत्र का इस्तेमाल सुरक्षा एजेंसियों के लिए गंभीर मामला माना गया। इसके बाद दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि आरोपियों ने कथित पहचान पत्र का इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया और क्या उनके पास परिसर में प्रवेश करने की कोई वैध अनुमति थी।
फरार आरोपी के घर भेजा गया नोटिस
मामले में प्रथमेश बागुल भी पुलिस की नजर में है। वह फिलहाल फरार बताया जा रहा है। पुलिस ने उसके घर पर नोटिस भेजा है और उसकी तलाश जारी है। जांच एजेंसी उसके संभावित ठिकानों और संपर्कों की जानकारी जुटा रही है।
पुलिस यह भी पता लगाने का प्रयास कर रही है कि पारेख और कुंडे के साथ बागुल का क्या संबंध था। यदि कथित फर्जी पहचान पत्र किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से तैयार या उपलब्ध कराया गया था तो बागुल की भूमिका जांच में महत्वपूर्ण हो सकती है।
कोर्ट में बचाव पक्ष ने रखा PMO नौकरी का दावा
एस्प्लेनेड कोर्ट में सुनवाई के दौरान पारेख के वकीलों ने मामले में एक अलग पक्ष रखा। बचाव पक्ष ने दावा किया कि कुछ लोगों ने पारेख से संपर्क किया था और उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़ी एक भूमिका की पेशकश की गई थी।
वकीलों के मुताबिक, कथित नियुक्ति के संबंध में पारेख को ईमेल और दस्तावेज भी भेजे गए थे। बचाव पक्ष का तर्क है कि इसी कथित पेशकश के आधार पर पारेख के पास PMO से जुड़ी भूमिका होने की बात सामने आई।
हालांकि, अदालत में किए गए इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। पुलिस की जांच में भी फिलहाल ऐसा कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है, जिससे यह साबित हो कि पारेख को वास्तव में PMO से संबंधित किसी पद की पेशकश की गई थी।
पुलिस को नहीं मिला आधिकारिक सबूत
पुलिस सूत्रों के अनुसार, अब तक की जांच में कथित नियुक्ति के संबंध में किसी आधिकारिक ईमेल या दस्तावेज का पता नहीं चला है। जांच एजेंसी अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि बचाव पक्ष की ओर से जिन ईमेल और दस्तावेजों का उल्लेख किया गया, वे वास्तव में मौजूद हैं या नहीं।
यदि ऐसे दस्तावेज मिलते हैं तो उनकी सत्यता और स्रोत की जांच की जाएगी। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि ईमेल किसने भेजे, किस पते से भेजे गए और उनमें PMO से संबंधित पद की पेशकश किस आधार पर की गई थी।
साथ ही यह भी जांच का विषय होगा कि कहीं किसी व्यक्ति ने फर्जी दस्तावेज या झूठी पहचान के जरिए पारेख को गुमराह तो नहीं किया।
कथित पहचान पत्र की प्रमाणिकता पर जांच
पूरे मामले में कथित PMO पहचान पत्र जांच का अहम हिस्सा है। पुलिस इसकी डिजाइन, विवरण, जारी करने वाली अथॉरिटी और अन्य पहचान संबंधी सूचनाओं की जांच कर रही है। अगर यह फर्जी पाया जाता है तो इसे बनाने या उपलब्ध कराने वालों की भूमिका की भी पड़ताल की जाएगी।
जांच एजेंसी यह भी देख सकती है कि आरोपी के पास यह पहचान पत्र कब से था और क्या इससे पहले भी इसका कहीं इस्तेमाल किया गया था। इसके अलावा पुलिस आरोपियों के मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से भी मामले से जुड़े सुराग तलाश सकती है।
सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल
प्रधानमंत्री के दौरे से ठीक पहले एक कथित फर्जी PMO पहचान पत्र के आधार पर हाई-प्रोफाइल परिसर में प्रवेश की कोशिश ने सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए हैं। ऐसे स्थानों पर प्रवेश से पहले पहचान और दस्तावेजों का सत्यापन सुरक्षा व्यवस्था का अहम हिस्सा होता है।
हालांकि मामले की पूरी तस्वीर जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी। पुलिस इस बात की भी जांच कर रही है कि कथित फर्जी पहचान पत्र की वजह से किसी सुरक्षा प्रोटोकॉल का उल्लंघन हुआ था या नहीं।
CIU के सामने कई सवाल
क्राइम इंटेलिजेंस यूनिट के सामने अब कई अहम सवाल हैं। इनमें कथित फर्जी ID की उत्पत्ति, आरोपियों का उद्देश्य, प्रथमेश बागुल की भूमिका और PMO से जुड़ी नौकरी की कथित पेशकश का सच प्रमुख हैं।
इसके अलावा जांच एजेंसी यह भी पता लगाने की कोशिश करेगी कि क्या इस मामले में अन्य लोग शामिल हैं। अगर फर्जी पहचान पत्र किसी संगठित तरीके से तैयार किया गया था तो नेटवर्क के दूसरे सदस्यों तक पहुंचना भी पुलिस की प्राथमिकता हो सकती है।
जांच के बाद साफ होगी तस्वीर
फिलहाल पारेख और उनके बॉडीगार्ड दिलीप राजाराम कुंडे पुलिस की गिरफ्त में हैं, जबकि प्रथमेश बागुल फरार है। उसके घर नोटिस भेजे जाने के बाद पुलिस उसके सामने आने का इंतजार कर रही है।
दूसरी ओर, बचाव पक्ष ने PMO से जुड़ी भूमिका की कथित पेशकश का दावा किया है, लेकिन पुलिस को अभी तक इसकी पुष्टि करने वाला कोई आधिकारिक दस्तावेज या ईमेल नहीं मिला है।
अब CIU की जांच इस मामले की वास्तविकता सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। कथित फर्जी PMO पहचान पत्र का स्रोत, आरोपियों का मकसद, फरार आरोपी की भूमिका और नौकरी की पेशकश से जुड़े दावे की सच्चाई सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि पूरा मामला किस स्तर तक फैला हुआ है।