Bhopal भोपाल। समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने सवाल उठाए हैं। भोपाल में दिए बयान में उन्होंने आरोप लगाया कि अलग-अलग राज्यों में यूसीसी के नाम पर एक जैसे प्रावधान आगे बढ़ाए जा रहे हैं। उन्होंने इसे मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों से जोड़ते हुए आपत्ति जताई। ओवैसी ने उत्तराखंड, गुजरात, असम, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र का उल्लेख किया। उनका दावा है कि इन राज्यों में यूसीसी को लेकर अपनाए जा रहे प्रावधानों में बुनियादी अंतर नहीं है और केवल अनुच्छेदों के नंबर बदले गए हैं। उन्होंने कहा, “उत्तराखंड का जो यूसीसी है वही गुजरात का है वही असम का है, वही मध्य प्रदेश का है, वही महाराष्ट्र का होने जा रहा है। उसमें सिर्फ अनुच्छेद के नंबर अलग हैं।
एआईएमआईएम प्रमुख ने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया के जरिए मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता को प्रभावित किया जा रहा है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 26 और 29 का उल्लेख करते हुए कहा कि इनसे जुड़े अधिकारों को खत्म किया जा रहा है। उनके बयान में मुख्य आपत्ति धार्मिक स्वतंत्रता और समुदाय की पहचान से जुड़े संवैधानिक संरक्षण को लेकर रही। ओवैसी ने विभिन्न राज्यों का नाम लेकर यूसीसी की दिशा और स्वरूप पर सवाल खड़े किए। उनका तर्क है कि राज्यों के स्तर पर अलग पहल के रूप में पेश किए जा रहे प्रावधान मूल रूप से समान हैं। हालांकि, उपलब्ध बयान में उन्होंने किसी राज्य के कानून या मसौदे की विशेष धारा का उदाहरण देकर तुलना नहीं की। उन्होंने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि किन प्रावधानों से किस अधिकार पर असर पड़ने का आरोप है।
उनकी टिप्पणी में दो प्रमुख मुद्दे सामने आए। पहला, अलग-अलग राज्यों के यूसीसी संबंधी प्रावधानों में समानता का दावा और दूसरा, उन प्रावधानों से मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित होने का आरोप। ओवैसी ने दोनों मुद्दों को आपस में जोड़ते हुए अपनी असहमति रखी। महाराष्ट्र का जिक्र उन्होंने वहां आगे होने वाली पहल के संदर्भ में किया। यहां अलग-अलग राज्यों में यूसीसी लागू होने, मसौदा तैयार होने अथवा प्रस्ताव के स्तर पर होने की स्थिति को एक समान नहीं माना जा सकता। ओवैसी का बयान इन राज्यों की पहल पर उनकी राजनीतिक प्रतिक्रिया है। उनके कथन से सभी उल्लिखित राज्यों में एक जैसा कानून लागू होने की पुष्टि नहीं होती। इसी तरह संवैधानिक अधिकार खत्म किए जाने की बात उनका आरोप है, किसी न्यायालय का निष्कर्ष नहीं।
बयान का केंद्रीय विषय यूसीसी के संभावित प्रभावों पर उनकी आपत्ति रहा। उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा उठाते हुए संविधान के अनुच्छेदों का हवाला दिया और राज्यों की पहल पर सवाल उठाए। उपलब्ध विवरण में उनके आरोपों पर संबंधित राज्य सरकारों की प्रतिक्रिया शामिल नहीं है। किसी विशेष प्रावधान की संवैधानिक स्थिति या उसके प्रभाव का निष्कर्ष भी इस संक्षिप्त बयान के आधार पर नहीं निकाला जा सकता।