पन्ना टाइगर रिजर्व में बना आलीशान रिसोर्ट बना विवाद का कारण, वन्यजीवों के विचरण पर मंडराया संकट
मध्य प्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व क्षेत्र में बने आलीशान रिसोर्ट को लेकर विवाद गहराया।
पन्ना : मध्य प्रदेश का पन्ना टाइगर रिजर्व एक बार फिर पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े गंभीर विवाद के केंद्र में है। टाइगर रिजर्व के इको-सेंसिटिव क्षेत्र (Eco-Sensitive Zone) में बने एक आलीशान रिसोर्ट को लेकर सवाल उठ रहे हैं। पर्यावरणविदों और वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्माण न केवल प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर रहा है, बल्कि बाघों और अन्य वन्यजीवों के पारंपरिक विचरण मार्ग (Wildlife Corridor) में भी बाधा उत्पन्न कर रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, पन्ना टाइगर रिजर्व केवल बाघों का सुरक्षित आवास नहीं है, बल्कि यह कई दुर्लभ प्रजातियों और जंगलों के बीच प्राकृतिक संपर्क बनाए रखने वाला महत्वपूर्ण क्षेत्र भी है। ऐसे में यदि वन्यजीव गलियारों (Wildlife Corridors) पर बड़े पैमाने पर व्यावसायिक निर्माण होते हैं, तो इससे वन्यजीवों की आवाजाही, प्रजनन और भोजन की तलाश जैसी प्राकृतिक गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं।
क्यों बढ़ा विवाद?
पन्ना टाइगर रिजर्व के आसपास बने इस आलीशान रिसोर्ट को लेकर आरोप है कि इसका निर्माण ऐसे क्षेत्र में हुआ है, जहां से बाघ, तेंदुए, भालू, लकड़बग्घे, चीतल, सांभर और अन्य वन्यजीव नियमित रूप से आवागमन करते हैं। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि रिसोर्ट में लगातार मानव गतिविधियां, वाहन, रोशनी और शोर-शराबा वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।
वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी संरक्षित क्षेत्र के आसपास अनियोजित पर्यटन विकास लंबे समय में संरक्षण प्रयासों को कमजोर कर सकता है।
वन्यजीव गलियारे क्यों हैं महत्वपूर्ण?
वन्यजीव गलियारे (Wildlife Corridors) ऐसे प्राकृतिक मार्ग होते हैं जिनके माध्यम से जानवर एक जंगल से दूसरे जंगल तक सुरक्षित रूप से पहुंचते हैं। इन गलियारों की मदद से वन्यजीव भोजन, पानी, प्रजनन और नए आवास की तलाश कर पाते हैं।
यदि इन मार्गों पर होटल, रिसोर्ट, सड़क या अन्य स्थायी निर्माण हो जाएं, तो वन्यजीवों की आवाजाही बाधित हो सकती है। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ने और जैव विविधता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है।
बाघों के संरक्षण पर पड़ सकता है असर
पन्ना टाइगर रिजर्व देश के उन चुनिंदा टाइगर रिजर्व में शामिल है जहां बाघों की संख्या बढ़ाने के लिए वर्षों तक विशेष संरक्षण कार्यक्रम चलाए गए। कभी यहां बाघों की संख्या लगभग समाप्त हो गई थी, लेकिन पुनर्वास और संरक्षण प्रयासों के बाद यहां बाघों की आबादी फिर से बढ़ी।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बाघों के प्राकृतिक मूवमेंट को बाधित किया गया तो भविष्य में उनके प्रजनन और क्षेत्र विस्तार पर असर पड़ सकता है।
पर्यावरणविदों की चिंता
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि संरक्षित क्षेत्रों के आसपास किसी भी निर्माण की अनुमति देते समय पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment) और वन्यजीवों के विचरण मार्गों का वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक होना चाहिए।
उनका तर्क है कि पर्यटन विकास और वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। यदि पर्यटन गतिविधियां संरक्षण के मूल उद्देश्य को नुकसान पहुंचाती हैं, तो ऐसे निर्माणों की समीक्षा की जानी चाहिए।
स्थानीय लोगों की राय
स्थानीय लोगों का मानना है कि पर्यटन से रोजगार और आय के अवसर बढ़ते हैं, लेकिन विकास ऐसा होना चाहिए जिससे जंगल और वन्यजीव सुरक्षित रहें। कई ग्रामीणों का कहना है कि यदि वन्यजीवों के प्राकृतिक मार्ग बाधित होंगे तो जानवर गांवों की ओर आने लगेंगे, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ सकता है।
नियम क्या कहते हैं?
वन्यजीव संरक्षण से जुड़े नियमों के अनुसार, राष्ट्रीय उद्यानों और टाइगर रिजर्व के आसपास विकास गतिविधियों के लिए विभिन्न स्तरों पर पर्यावरणीय और वन संबंधी मंजूरियां आवश्यक होती हैं। इको-सेंसिटिव जोन में किसी भी बड़े निर्माण के लिए निर्धारित दिशानिर्देशों का पालन करना अनिवार्य होता है।
यदि किसी परियोजना से वन्यजीवों के आवागमन या पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका हो, तो संबंधित प्राधिकरण जांच और आवश्यक कार्रवाई कर सकते हैं।
पर्यटन और संरक्षण के बीच संतुलन जरूरी
विशेषज्ञों का कहना है कि इको-टूरिज्म का उद्देश्य प्रकृति संरक्षण को बढ़ावा देना होना चाहिए, न कि वन्यजीवों के आवास पर दबाव बढ़ाना। टिकाऊ पर्यटन (Sustainable Tourism) मॉडल अपनाकर स्थानीय अर्थव्यवस्था और जैव विविधता दोनों की रक्षा की जा सकती है।