उज्जैन। मध्य प्रदेश में करीब 2,600 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किए गए उज्जैन-गरोठ नेशनल हाईवे की गुणवत्ता को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। देवास रोड पर रेलवे ब्रिज के पास हाईवे का करीब 500 मीटर हिस्सा तकनीकी खराबी के कारण धंस गया है। सात महीने के भीतर यह दूसरी बार है जब इस हाईवे के हिस्से में ऐसी समस्या सामने आई है। अब नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) ने प्रभावित हिस्से को तोड़कर दोबारा बनाने का फैसला किया है।

इससे पहले 6 फरवरी को इसी हाईवे का करीब 200 मीटर हिस्सा धंस गया था। उस समय भी निर्माण की गुणवत्ता और तकनीकी खामियों को लेकर सवाल उठे थे। अब करीब सात महीने बाद फिर से बड़ा हिस्सा प्रभावित होने के बाद मामला गंभीर हो गया है। इस बार पूरे प्रभावित हिस्से का पुनर्निर्माण किया जा रहा है। निर्माण एजेंसी GVR ने सोमवार से खुदाई का काम भी शुरू कर दिया है।

उज्जैन-गरोठ नेशनल हाईवे को क्षेत्र में बेहतर सड़क संपर्क उपलब्ध कराने वाली महत्वपूर्ण परियोजना के रूप में देखा जा रहा है। लगभग 2,600 करोड़ रुपये की लागत वाली इस परियोजना से यातायात व्यवस्था बेहतर होने और कई इलाकों के बीच यात्रा का समय कम होने की उम्मीद है। लेकिन हाईवे के पूरी तरह शुरू होने से पहले ही बार-बार सामने आ रही तकनीकी समस्याओं ने इसकी निर्माण गुणवत्ता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

रेलवे ब्रिज के पास 500 मीटर हिस्सा प्रभावित

देवास रोड स्थित रेलवे ब्रिज के पास करीब 500 मीटर लंबे हिस्से में तकनीकी समस्या सामने आई है। सड़क का हिस्सा धंसने के बाद NHAI और निर्माण एजेंसी ने इसका निरीक्षण किया। अब प्रभावित सड़क को केवल मरम्मत करके ठीक करने के बजाय उसे तोड़कर दोबारा बनाने का निर्णय लिया गया है।

निर्माण एजेंसी ने प्रभावित हिस्से की खुदाई शुरू कर दी है। इस दौरान पुरानी सड़क की परतों को हटाकर जमीन और आधार को फिर से तैयार किया जाएगा। इसके बाद निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुसार सड़क का पुनर्निर्माण किया जाएगा।

हाईवे के इस हिस्से को दोबारा तैयार करने में समय लगने की संभावना है। इससे परियोजना को औपचारिक रूप से सौंपने और हाईवे पर पूरी तरह यातायात शुरू करने की समयसीमा आगे बढ़ सकती है।

फरवरी में भी धंसा था 200 मीटर हिस्सा

हाईवे पर यह पहली समस्या नहीं है। इससे पहले 6 फरवरी को करीब 200 मीटर हिस्सा धंसने की घटना सामने आई थी। उस समय प्रभावित हिस्से की मरम्मत और सुधार का काम किया गया था। अब कुछ ही महीनों के भीतर दूसरी बार बड़ा हिस्सा धंसने से निर्माण की तकनीकी निगरानी पर सवाल उठने लगे हैं।

सात महीने में दूसरी बार ऐसी स्थिति सामने आने के बाद यह जानना भी महत्वपूर्ण होगा कि सड़क के नीचे की मिट्टी, ड्रेनेज व्यवस्था, निर्माण सामग्री या किसी अन्य तकनीकी कारण से यह समस्या पैदा हुई है।

लगातार सामने आ रही खामियों के बाद अब पूरे प्रभावित हिस्से का पुनर्निर्माण किया जा रहा है। इससे यह संकेत मिलता है कि समस्या केवल ऊपरी सड़क की परत तक सीमित नहीं है और आधार से सुधार की आवश्यकता महसूस की गई है।

वायरल वीडियो से उठे गुणवत्ता पर सवाल

हाईवे की गुणवत्ता को लेकर विवाद उस समय और बढ़ गया जब दो दिन पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ। वीडियो में रेलवे ब्रिज के पास निर्माण सामग्री गिरती हुई दिखाई देने का दावा किया गया। वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने परियोजना की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए।

इसके बाद हाईवे के करीब 500 मीटर हिस्से के धंसने और उसे तोड़कर दोबारा बनाने की जानकारी ने इन सवालों को और गंभीर बना दिया है। इतनी बड़ी लागत वाली परियोजना में बार-बार तकनीकी खराबी सामने आने से निर्माण एजेंसी और निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।

हालांकि किसी वायरल वीडियो के आधार पर तकनीकी खराबी का अंतिम कारण तय नहीं किया जा सकता। इसके लिए विशेषज्ञ जांच और इंजीनियरिंग मूल्यांकन जरूरी होगा। NHAI के लिए भी यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि आखिर सड़क बार-बार क्यों धंस रही है।

2,600 करोड़ की परियोजना

उज्जैन-गरोठ हाईवे परियोजना की अनुमानित लागत करीब 2,600 करोड़ रुपये बताई गई है। इतनी बड़ी राशि से तैयार हो रही सड़क परियोजना में निर्माण की गुणवत्ता और सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। सड़क का इस्तेमाल प्रतिदिन बड़ी संख्या में छोटे और भारी वाहन करेंगे। इसलिए सड़क की मजबूती में किसी भी तरह की तकनीकी कमी भविष्य में गंभीर खतरा पैदा कर सकती है।

हाईवे के निर्माण के दौरान सामग्री की गुणवत्ता, सड़क की मोटाई, मिट्टी की मजबूती, जल निकासी और भारी वाहनों के दबाव जैसे पहलुओं को ध्यान में रखना जरूरी होता है। अगर इनमें से किसी स्तर पर तकनीकी खामी रहती है तो सड़क के धंसने या क्षतिग्रस्त होने की आशंका बढ़ सकती है।

हाईवे शुरू होने में हो सकती है देरी

प्रभावित हिस्से को पूरी तरह तोड़कर दोबारा बनाए जाने से हाईवे को सौंपने की प्रक्रिया में देरी होने की संभावना है। सड़क का निर्माण पूरा होने के बाद तकनीकी परीक्षण और निरीक्षण भी किया जाना होगा। इसके बाद ही प्रभावित हिस्से को यातायात के लिए पूरी तरह सुरक्षित माना जा सकेगा।

यात्रियों के लिए यह देरी असुविधा का कारण बन सकती है, लेकिन सड़क की सुरक्षा को देखते हुए तकनीकी खामियों को ठीक करना जरूरी है। जल्दबाजी में हाईवे खोलने के बजाय प्रभावित हिस्से को निर्धारित मानकों के अनुसार दोबारा तैयार करना महत्वपूर्ण होगा।

जांच के दायरे में आ सकती है निर्माण गुणवत्ता

बार-बार हाईवे धंसने की घटना के बाद निर्माण गुणवत्ता की विस्तृत जांच की मांग भी उठ सकती है। यह पता लगाना जरूरी होगा कि फरवरी में सामने आई समस्या और मौजूदा तकनीकी खराबी के कारण एक जैसे हैं या अलग-अलग।

यदि निर्माण सामग्री या तकनीकी प्रक्रिया में किसी स्तर पर कमी सामने आती है तो संबंधित निर्माण एजेंसी की जिम्मेदारी भी तय हो सकती है। वहीं अगर भौगोलिक या मिट्टी से जुड़ी कोई समस्या है तो भविष्य में हाईवे के दूसरे हिस्सों को सुरक्षित रखने के लिए भी अतिरिक्त उपाय करने पड़ सकते हैं।

फिलहाल निर्माण एजेंसी GVR ने प्रभावित हिस्से में खुदाई शुरू कर दी है और NHAI की निगरानी में पुनर्निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ने की उम्मीद है। सात महीने में दूसरी बार सड़क धंसने से परियोजना की गुणवत्ता पर उठे सवालों का जवाब अब तकनीकी जांच और पुनर्निर्माण की गुणवत्ता से ही मिल सकेगा।

करीब 2,600 करोड़ रुपये की लागत वाले उज्जैन-गरोठ नेशनल हाईवे के लिए यह घटना बड़ी चुनौती बन गई है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि 500 मीटर के प्रभावित हिस्से का पुनर्निर्माण कब तक पूरा होता है और हाईवे को यातायात के लिए कब पूरी तरह खोला जाता है।

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