तिरुवनंतपुरम। CPI(M) नेता और विधायक पी. ए. मुहम्मद रियास ने केंद्र सरकार की जन्म और मृत्यु पंजीकरण व्यवस्था से जुड़े कथित बदलावों को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने शनिवार को कहा कि यदि जन्म-मृत्यु रजिस्ट्रेशन के आंकड़ों को आधार, मतदाता सूची, राशन कार्ड और शैक्षणिक दाखिले जैसी व्यवस्थाओं से जोड़ने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं तो इसकी कड़ी निगरानी जरूरी है।

रियास ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म फेसबुक पर एक पोस्ट के जरिए इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने आशंका जताई कि भविष्य में यदि जन्म प्रमाणपत्र नागरिकों के विभिन्न अधिकारों और सरकारी सेवाओं तक पहुंच तय करने वाला महत्वपूर्ण दस्तावेज बन जाता है, तो इसका सबसे अधिक असर आम लोगों और समाज के पिछड़े तबकों पर पड़ सकता है।

नागरिक अधिकारों से जुड़ा बताया संवेदनशील मुद्दा

रियास ने अपने पोस्ट में जन्म प्रमाणपत्र की बढ़ती भूमिका को लेकर चिंता जाहिर की। उनका कहना है कि यदि किसी व्यक्ति के लिए सरकारी योजनाओं, पहचान संबंधी दस्तावेजों, मतदाता सूची या शिक्षा से जुड़ी सुविधाओं में जन्म प्रमाणपत्र महत्वपूर्ण आधार बन जाता है, तो दस्तावेजी कमियों के कारण कई लोगों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।

उन्होंने कहा कि देश में ऐसे परिवारों की संख्या कम नहीं है, जिनके पास पुराने या जरूरी दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों, गरीब परिवारों और सामाजिक रूप से पिछड़े समुदायों के लोगों को दस्तावेज तैयार कराने और उन्हें अपडेट रखने में अक्सर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

ऐसे में जन्म-मृत्यु पंजीकरण के डेटा को दूसरी महत्वपूर्ण सरकारी व्यवस्थाओं से जोड़ने की प्रक्रिया को पूरी पारदर्शिता और सावधानी के साथ आगे बढ़ाने की जरूरत है।

आधार और मतदाता सूची से लिंकिंग पर सवाल

CPI(M) नेता ने विशेष रूप से जन्म-मृत्यु रजिस्ट्रेशन डेटा को आधार, वोटर लिस्ट, राशन कार्ड और शैक्षणिक प्रवेश जैसी व्यवस्थाओं से जोड़ने की कथित कवायद पर सवाल उठाया है।

उनका कहना है कि अलग-अलग सरकारी डेटाबेस को आपस में जोड़ने से प्रशासनिक स्तर पर डेटा का इस्तेमाल आसान हो सकता है, लेकिन इसके साथ नागरिकों के अधिकार और व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा से जुड़े सवाल भी खड़े होते हैं।

रियास ने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी ऐसी व्यवस्था को लागू करने से पहले यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इससे आम नागरिकों को अनावश्यक परेशानी न हो और किसी व्यक्ति को केवल दस्तावेजी कमी के कारण सरकारी सुविधा या अधिकार से वंचित न होना पड़े।

गरीब और पिछड़े वर्गों पर असर की आशंका

रियास ने अपने बयान में खास तौर पर गरीब और पिछड़े वर्गों का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि समाज के कमजोर तबकों के पास कई बार जन्म, निवास, शिक्षा और अन्य पहचान से जुड़े दस्तावेज पूरे नहीं होते।

यदि भविष्य में जन्म प्रमाणपत्र का इस्तेमाल नागरिकों के अधिकारों या सरकारी सेवाओं की पात्रता तय करने के लिए व्यापक स्तर पर किया जाता है, तो दस्तावेजों की कमी बड़ी समस्या बन सकती है।

उन्होंने इस बात की ओर भी संकेत किया कि देश के दूरदराज क्षेत्रों में लोगों को प्रशासनिक प्रक्रियाओं तक पहुंच बनाने में कठिनाइयां होती हैं। ऐसे में डिजिटल या आपस में जुड़े डेटाबेस पर अत्यधिक निर्भरता से उन लोगों के लिए नई चुनौतियां पैदा हो सकती हैं, जो तकनीकी और प्रशासनिक सुविधाओं से पूरी तरह परिचित नहीं हैं।

डेटा सुरक्षा को लेकर भी चिंता

जन्म और मृत्यु से संबंधित जानकारी संवेदनशील व्यक्तिगत डेटा का हिस्सा होती है। रियास की चिंता में डेटा सुरक्षा का पहलू भी महत्वपूर्ण है। उनका कहना है कि यदि अलग-अलग सरकारी डेटाबेस को आपस में जोड़ा जाता है तो यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि नागरिकों की व्यक्तिगत जानकारी सुरक्षित रहे और उसका अनधिकृत इस्तेमाल न हो।

ऐसी किसी भी व्यवस्था में डेटा तक किसकी पहुंच होगी, जानकारी का इस्तेमाल किन उद्देश्यों के लिए किया जाएगा और नागरिकों को अपनी जानकारी में गलती होने पर उसे सुधारने का क्या अधिकार होगा, इन सवालों का स्पष्ट जवाब होना चाहिए।

निगरानी और पारदर्शिता की जरूरत

रियास ने कहा कि इस तरह की प्रक्रिया पर लोकतांत्रिक और सार्वजनिक निगरानी जरूरी है। उनका मानना है कि केंद्र सरकार को प्रस्तावित बदलावों के उद्देश्य, प्रक्रिया और संभावित प्रभावों के बारे में स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए।

उन्होंने संकेत दिया कि तकनीक के इस्तेमाल से सरकारी सेवाओं को बेहतर और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है, लेकिन इसका उद्देश्य नागरिकों के अधिकारों को सीमित करना नहीं होना चाहिए।

सरकारी सेवाओं में डेटा की भूमिका बढ़ रही

देश में विभिन्न सरकारी योजनाओं और सेवाओं के लिए डिजिटल डेटाबेस का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। पहचान, राशन, शिक्षा, स्वास्थ्य और चुनाव से जुड़े रिकॉर्ड को अधिक व्यवस्थित बनाने के लिए तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है।

इसी पृष्ठभूमि में जन्म और मृत्यु के रजिस्ट्रेशन से जुड़े डेटा को अन्य सरकारी रिकॉर्ड से जोड़ने की चर्चा महत्वपूर्ण हो जाती है। समर्थकों की नजर में इससे रिकॉर्ड में एकरूपता और प्रशासनिक दक्षता बढ़ सकती है, जबकि रियास जैसे आलोचक इसके संभावित सामाजिक और नागरिक अधिकार संबंधी प्रभावों को लेकर सावधानी बरतने की मांग कर रहे हैं।

फिलहाल रियास ने इस मुद्दे पर केंद्र के कथित कदम की कड़ी निगरानी की जरूरत बताई है। उन्होंने खास तौर पर यह चिंता जताई कि यदि जन्म प्रमाणपत्र भविष्य में नागरिक अधिकारों तक पहुंच का प्रमुख आधार बनता है तो दस्तावेजी रूप से कमजोर वर्गों को नुकसान हो सकता है। ऐसे में किसी भी बदलाव को लागू करने से पहले पारदर्शिता, डेटा सुरक्षा और नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक होगा।

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