वायनाड। मानियांगोडे के कोक्कुझी खेत में आयोजित कंबलानट्टी उत्सव ने कृषि, लोक संस्कृति और सामुदायिक सहभागिता का शानदार संगम प्रस्तुत किया। धान की खेती से जुड़ी पारंपरिक कृषि संस्कृति को जीवंत बनाए रखने के उद्देश्य से आयोजित इस समारोह में बड़ी संख्या में लोगों ने उत्साह के साथ भाग लिया। खेतों के बीच आयोजित कार्यक्रम में लोकगीतों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुनों के बीच प्रतिभागियों ने नृत्य और गीतों के माध्यम से उत्सव का आनंद लिया।
वायनाड में धान की खेती से जुड़ी परंपराओं में कंबला नट्टी का विशेष महत्व माना जाता है। खेती और ग्रामीण जीवन से जुड़े ऐसे आयोजन स्थानीय समुदाय को अपनी परंपराओं से जोड़ने का काम करते हैं। कोक्कुझी खेत में आयोजित कार्यक्रम ने भी इसी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का प्रयास किया।
इस कार्यक्रम का आयोजन OISKA कल्पेट्टा चैप्टर की अगुवाई में किया गया। आयोजन को सफल बनाने में कृषि विभाग, पोन्नाडा एस्टेट, VIMS मूपन्स नर्सिंग कॉलेज, पद्मप्रभा लाइब्रेरी, करिंगुट्टी VHSS, मुंडेरी VHSS, कल्पेट्टा NSS HSS और कोक्कुझी पदाशेखरम समिति ने सहयोग किया। विभिन्न संस्थाओं और संगठनों की भागीदारी ने आयोजन को सामुदायिक स्वरूप प्रदान किया।
समारोह का उद्घाटन जिला पंचायत अध्यक्ष चंद्रिका कृष्णन ने किया। उद्घाटन के दौरान उन्होंने कृषि और ग्रामीण परंपराओं से जुड़े आयोजनों के महत्व पर जोर दिया। धान की खेती केवल कृषि उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि क्षेत्र की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे उत्सव नई पीढ़ी को स्थानीय परंपराओं से परिचित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
कार्यक्रम के दौरान खेत का वातावरण पूरी तरह उत्सवी नजर आया। पारंपरिक लोकगीतों और थुडी, चीनी आदि की धुनों ने माहौल में नई ऊर्जा भर दी। संगीत की लय के साथ लोग उत्साहपूर्वक नृत्य करते और गीत गाते नजर आए। खेतों के बीच आयोजित इस सांस्कृतिक कार्यक्रम ने ग्रामीण जीवन की पारंपरिक छवि को एक बार फिर सामने ला दिया।
कंबला नट्टी जैसे आयोजनों की खासियत यह है कि इनमें कृषि कार्य और लोक संस्कृति एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। धान के खेतों में होने वाली गतिविधियां केवल मेहनत और उत्पादन तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि उनके साथ गीत, संगीत और सामूहिक उत्सव की परंपराएं भी जुड़ी होती हैं। कोक्कुझी में आयोजित समारोह ने इसी परंपरा को आधुनिक समय में भी जीवित रखने का संदेश दिया।
कार्यक्रम में विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक संगठनों की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही। इससे युवाओं और विद्यार्थियों को स्थानीय कृषि संस्कृति को करीब से समझने का अवसर मिला। आयोजन से जुड़ी संस्थाओं ने सामूहिक प्रयास के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की कि परंपराओं का संरक्षण केवल किसी एक व्यक्ति या संगठन की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि पूरे समाज की भागीदारी से ही सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाया जा सकता है।
समारोह की अध्यक्षता OISKA कल्पेट्टा के अध्यक्ष एडवोकेट S.A. नज़ीर ने की। उनकी अध्यक्षता में कार्यक्रम को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाया गया। आयोजन में शामिल लोगों ने पारंपरिक गीत-संगीत और नृत्य के माध्यम से अपनी भागीदारी दर्ज कराई।
कोक्कुझी पदाशेखरम समिति की भागीदारी ने कार्यक्रम को कृषि समुदाय से सीधा जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। धान के खेतों से संबंधित स्थानीय अनुभव और परंपराएं ऐसे आयोजनों का मुख्य आधार हैं। इस तरह के कार्यक्रम किसानों और आम लोगों के बीच संवाद और सामुदायिक भावना को भी मजबूत करते हैं।
वायनाड जैसे कृषि प्रधान क्षेत्र में धान की खेती की अपनी विशिष्ट पहचान है। बदलते समय और कृषि क्षेत्र में आ रहे बदलावों के बावजूद पारंपरिक कृषि संस्कृति से जुड़े उत्सव आज भी लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं। कंबलानट्टी उत्सव इसी सांस्कृतिक निरंतरता का उदाहरण बना।
आयोजन के दौरान लोकगीतों की प्रस्तुतियों ने विशेष आकर्षण पैदा किया। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की आवाज और गीतों की लय के साथ लोग स्वतः ही उत्सव का हिस्सा बनते चले गए। कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने नृत्य और गीतों में सक्रिय रूप से भाग लिया, जिससे पूरा खेत एक सामूहिक सांस्कृतिक मंच में बदल गया।
इस आयोजन की एक खास बात यह रही कि इसमें विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े संस्थानों और लोगों ने मिलकर भाग लिया। कृषि विभाग से लेकर शिक्षण संस्थानों और पुस्तकालय तक, कई संगठनों के सहयोग से कार्यक्रम आयोजित किया गया। इससे कृषि, शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक सहभागिता के बीच बेहतर समन्वय देखने को मिला।
आयोजकों का प्रयास रहा कि कंबला नट्टी की परंपरा को केवल एक सांस्कृतिक प्रदर्शन तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे कृषि जीवन और स्थानीय विरासत से जोड़कर प्रस्तुत किया जाए। खेत में उत्सव मनाने से लोगों को उस सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का अनुभव भी हुआ, जिसमें ऐसी परंपराएं विकसित हुई हैं।
कार्यक्रम में शामिल लोगों ने पारंपरिक गीतों पर नृत्य किया और सामूहिक रूप से उत्सव का आनंद लिया। बच्चों और युवाओं की भागीदारी ने कार्यक्रम को और जीवंत बना दिया। इससे यह उम्मीद भी जगी कि स्थानीय कृषि और लोक संस्कृति से जुड़े ऐसे आयोजनों के माध्यम से नई पीढ़ी अपनी परंपराओं के प्रति अधिक जागरूक होगी।
मानियांगोडे के कोक्कुझी खेत में आयोजित कंबलानट्टी उत्सव ने एक बार फिर यह दिखाया कि कृषि केवल खेतों में फसल उगाने की प्रक्रिया नहीं है। इसके साथ लोकगीत, परंपराएं, सामूहिक श्रम और उत्सव की भावनाएं भी जुड़ी होती हैं। ऐसे कार्यक्रम ग्रामीण संस्कृति को जीवित रखने के साथ-साथ समुदाय को एक साथ लाने का माध्यम बनते हैं।
लोकगीतों, पारंपरिक धुनों, नृत्य और सामूहिक भागीदारी से सजा यह आयोजन लंबे समय तक लोगों की यादों में बना रहेगा। कंबलानट्टी उत्सव ने खेतों के बीच संस्कृति और कृषि के उस रिश्ते को फिर जीवंत कर दिया, जो वायनाड की ग्रामीण पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।