कोच्चि: सरकार की इन दलीलों ने हाई कोर्ट को संतुष्ट नहीं किया कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) को जांच एजेंसी नहीं माना जा सकता और उसकी रिपोर्ट में तथ्यों की पुष्टि के लिए शुरुआती जांच ज़रूरी थी। प्रिवेंशन ऑफ़ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत नियम है कि अगर जांच के दौरान कानून के उल्लंघन का कोई सबूत मिलता है, तो आगे की कार्रवाई के लिए मामले को संबंधित एजेंसी को सौंपा जाना चाहिए। जस्टिस ए. बदरुद्दीन ने कहा कि जब ED धारा 66(2) के तहत ऐसी रिपोर्ट सौंपती है, तो केस दर्ज करना अनिवार्य हो जाता है।
एडवोकेट जनरल जाजू बाबू ने बताया था कि विजिलेंस कोर्ट ने MLA मैथ्यू कुझलनादन और अन्य की याचिकाएं खारिज कर दी थीं, और इस फैसले को बाद में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा था। वे फैसले इस आधार पर लिए गए थे कि CMRL की डायरी में दर्ज एंट्रीज़ का कोई सबूत के तौर पर महत्व नहीं था और कोई सहायक दस्तावेज़ पेश नहीं किए गए थे। हालांकि, कोर्ट ने गौर किया कि ED द्वारा पेश किए गए सबूत शुरुआती मामले के निपटारे के बाद मिले थे, इसलिए सुप्रीम कोर्ट का पिछला फैसला भी विजिलेंस जांच में बाधा नहीं बनता है। आरोपी और आरोप (ED रिपोर्ट के अनुसार) 1. पिनाराई विजयन: अपनी बेटी वीना के ज़रिए 3.28 करोड़ रुपये की रिश्वत ली।
2. मोहम्मद रियास: वीना और उसके सहयोगियों के ज़रिए रिश्वत की रकम दुबई भेजने में मदद की।
3. वीना: पिनाराई विजयन और रियास की ओर से रिश्वत की रकम इकट्ठा करने और भेजने में मदद की।
4. एक्सलॉजिक सॉल्यूशंस: इस कंपनी का इस्तेमाल फर्जी वित्तीय लेन-देन के लिए किया गया था।
5. शशिधरन कार्था: रिश्वत दी।
6. पी. सुरेश कुमार: रिश्वत देने में मदद की।
7. एम्पावर इंडिया कैपिटल इन्वेस्टमेंट्स: इस फर्म का इस्तेमाल रिश्वत की रकम ट्रांसफर करने के लिए किया गया था।
8. शैजल 9. पी. निखिल
10. वारिस उर्फ हसन वारिश
11. वी. पी. फैज़ल
12. एम. नंदूलाल: ये पांच लोग वीना और रियास को रिश्वत की रकम इकट्ठा करने और ट्रांसफर करने में मदद करने में शामिल थे। 13. अन्य जिनकी पहचान अभी बाकी है: साजिश और पैसे के ट्रांसफर में मदद की।