New Delhi, नई दिल्ली : विश्व हिंदू परिषद ने रविवार को कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया ( सीबीसीआई ) के उस बयान की निंदा की जिसमें केरल की दो ईसाई ननों के खिलाफ छत्तीसगढ़ में दर्ज मामला रद्द करने की मांग की गई थी। विहिप ने कहा कि ननों को मानव तस्करी और अवैध धर्मांतरण के जघन्य अपराध के लिए गिरफ्तार किया गया था। संगठन के एक्स हैंडल पर एक पोस्ट के अनुसार, विश्व हिन्दू परिषद के संयुक्त महासचिव सुरेन्द्र जैन ने कहा, " सीबीसीआइ का छत्तीसगढ़ में ननों की जमानत का स्वागत करने और मामले को रद्द करने की मांग करने वाला बयान, पाखंड की पराकाष्ठा को फिर से उजागर करता है।उन्होंने कहा, "ननों को मानव तस्करी और अवैध धर्मांतरण के जघन्य अपराध के लिए गिरफ्तार किया गया था। उन्होंने सात दिन बाद आरोपों से इनकार क्यों किया? यह आरोपों की स्वीकृति है। इसमें कुछ भी नया नहीं है।"
शनिवार को, सीबीसीआई के अध्यक्ष और त्रिशूर के आर्कबिशप मार एंड्रयूज थजाथ ने एनआईए की विशेष अदालत द्वारा ननों को ज़मानत देने के फैसले का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि उनकी गिरफ्तारी "झूठे आरोपों" पर आधारित थी। न्होंने एएनआई को बताया, "मैं इस खुशखबरी के लिए ईश्वर और सभी का धन्यवाद करता हूं... दोनों बहनें अपने माता-पिता की अनुमति से अस्पताल में काम करने आई थीं... चरमपंथियों की भीड़ ने उन पर हमला किया... और उन्हें पूरी तरह से झूठे आरोपों के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। आर्कबिशप मार एंड्रयूज थजाथ ने ऐसी घटनाओं से लोगों की सुरक्षा के लिए सरकार से कानून बनाने की मांग की।
उन्होंने दोनों ननों की रिहाई के लिए प्रयास करने वाले सभी लोगों को धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा, "हमारा अनुरोध है कि इस मामले को जल्द से जल्द रद्द कर दिया जाए, क्योंकि देरी से और अधिक झूठे आरोप लग सकते हैं... ऐसी घटनाओं से बचाव के लिए सरकार को एक अधिनियम बनाना चाहिए... हाल के दिनों में कई कट्टरपंथी समूहों ने ईसाई धर्म पर हमला किया है... मैं बहनों की रिहाई के लिए प्रयास करने वाले सभी सद्भावना रखने वाले लोगों को धन्यवाद देता हूं और केंद्र और राज्य सरकारों को उनके सक्रिय हस्तक्षेप के लिए धन्यवाद देता हूं।"
शनिवार को एनआईए अदालत द्वारा जमानत दिए जाने के बाद ननों को जेल से रिहा कर दिया गया। केरल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने दुर्ग जेल से दोनों ननों का स्वागत किया। यह मामला भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 143 और उड़ीसा धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम, 1967 की धारा 3 के तहत दर्ज किया गया था।
Tags: