बेंगलुरु। कर्नाटक के बहुचर्चित वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम से जुड़े कथित धन गबन मामले में मंत्री बी. नागेंद्र को गुरुवार को कर्नाटक हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिली। अदालत ने उनकी जमानत की उस शर्त में ढील दे दी, जिसके तहत उन्हें देश से बाहर जाने के लिए अदालत की अनुमति लेना जरूरी था। अब नागेंद्र भारत के भीतर बिना पूर्व न्यायिक अनुमति यात्रा कर सकेंगे, जबकि विदेश यात्रा के लिए उन्हें अदालत की अनुमति लेनी होगी।

नागेंद्र ने जमानत की शर्तों में बदलाव की मांग करते हुए हाई कोर्ट का रुख किया था। उनका तर्क था कि राज्य से बाहर और देश के भीतर यात्रा पर लगी पाबंदियां उनके सार्वजनिक और राजनीतिक दायित्वों के निर्वहन में बाधा बन रही थीं। हाई कोर्ट ने पहले ही उन्हें कर्नाटक से बाहर जाने पर लगी पाबंदी से राहत दी थी और अब देश से बाहर जाने से संबंधित शर्त को स्पष्ट करते हुए भारत के भीतर यात्रा की अनुमति दे दी है।

जमानत के बाद भी लगी थीं पाबंदियां

वाल्मीकि कॉर्पोरेशन मामले में जांच के दौरान बी. नागेंद्र पर गंभीर आरोप लगाए गए थे। प्रवर्तन निदेशालय ने 2024 में कथित तौर पर निगम की करीब 89.62 करोड़ रुपये की धनराशि के दुरुपयोग से जुड़े मामले में उन्हें गिरफ्तार किया था। ईडी के मुताबिक, जांच में रकम को कथित तौर पर फर्जी खातों के जरिए दूसरी जगह भेजे जाने के साक्ष्य मिले थे।

बाद में नागेंद्र को जमानत मिली। हालांकि जमानत के साथ अदालत की ओर से कुछ शर्तें लगाई गई थीं। इनमें यात्रा से संबंधित प्रतिबंध भी शामिल था। इन शर्तों में राहत पाने के लिए उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका दायर की।

भारत में यात्रा की मिली अनुमति

हाई कोर्ट के ताजा आदेश के बाद नागेंद्र अब देश के किसी भी हिस्से में यात्रा कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें हर बार अदालत से पूर्व अनुमति लेने की जरूरत नहीं होगी। हालांकि विदेश जाने की स्थिति में अदालत की अनुमति लेना अनिवार्य रहेगा।

यह राहत ऐसे समय मिली है जब नागेंद्र को लेकर कर्नाटक की राजनीति में पहले से ही विवाद चल रहा है। विपक्षी भाजपा और जेडीएस लगातार कांग्रेस सरकार पर निशाना साधते हुए नागेंद्र को मंत्रिमंडल से हटाने की मांग कर रहे हैं।

विधानसभा में भी गरमाया मुद्दा

वाल्मीकि कॉर्पोरेशन मामले को लेकर कर्नाटक विधानसभा में भी सियासी टकराव देखने को मिला है। विपक्षी दलों ने नागेंद्र की कैबिनेट में वापसी पर सवाल उठाते हुए सरकार से उन्हें हटाने की मांग की। विपक्ष का कहना रहा है कि मामले की जांच और कानूनी प्रक्रिया जारी रहने के बावजूद उन्हें मंत्री पद पर बनाए रखना उचित नहीं है।

भाजपा-जेडीएस ने इस मुद्दे पर सरकार के खिलाफ विरोध जताया और चेतावनी दी कि जब तक विवादित मंत्रियों को कैबिनेट से हटाया नहीं जाता, तब तक विधानसभा की कार्यवाही सुचारु रूप से चलने देना मुश्किल होगा। इससे सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच गतिरोध की स्थिति भी बनी।

नागेंद्र ने आरोपों से किया है इनकार

बी. नागेंद्र पहले भी अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को खारिज करते रहे हैं। हाल ही में उन्होंने भाजपा के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि उन्होंने कोई गलत काम नहीं किया है। दूसरी ओर, विपक्ष मामले में उनकी भूमिका को लेकर लगातार सवाल उठाता रहा है।

कानूनी तौर पर जमानत मिलने का अर्थ आरोपों से बरी होना नहीं है। मामले की जांच और न्यायिक प्रक्रिया अपने स्तर पर जारी रहती है। हाई कोर्ट का ताजा आदेश भी मुख्य रूप से उनकी जमानत की यात्रा संबंधी शर्तों में बदलाव से जुड़ा है।

89 करोड़ रुपये से अधिक के कथित गबन का मामला

वाल्मीकि निगम मामले में ईडी की जांच के अनुसार करीब 89.62 करोड़ रुपये की निगम निधि के कथित दुरुपयोग की जांच की गई थी। एजेंसी ने आरोप लगाया था कि बड़ी रकम को फर्जी खातों में स्थानांतरित किया गया और बाद में अलग-अलग माध्यमों से उसका इस्तेमाल किया गया। मामले की जांच के दौरान कई परिसरों में तलाशी भी ली गई थी।

यह मामला उस समय सामने आया था जब निगम के एक अधिकारी की आत्महत्या के बाद धन के कथित दुरुपयोग को लेकर शिकायतें और जांच शुरू हुई थीं। इसके बाद कर्नाटक पुलिस, सीबीआई और ईडी स्तर पर मामले की जांच आगे बढ़ी।

राजनीतिक दबाव के बीच राहत

बी. नागेंद्र के लिए हाई कोर्ट का यह आदेश ऐसे समय आया है जब उनकी राजनीतिक भूमिका को लेकर विपक्ष लगातार सरकार पर दबाव बना रहा है। अगस्त में उनकी कैबिनेट में वापसी के बाद भी भाजपा ने सवाल उठाए थे। वहीं कांग्रेस सरकार ने उनके मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने का बचाव किया है।

हाई कोर्ट से मिली यात्रा संबंधी राहत से नागेंद्र को अपने राजनीतिक और प्रशासनिक कार्यक्रमों में सुविधा मिल सकती है। हालांकि विदेश यात्रा के लिए अदालत की अनुमति की शर्त बरकरार है।

फिलहाल वाल्मीकि निगम मामले की कानूनी प्रक्रिया जारी है। हाई कोर्ट का ताजा आदेश नागेंद्र को यात्रा के मामले में राहत देता है, लेकिन इससे मामले में लगाए गए आरोपों का अंतिम निपटारा नहीं होता। जांच और आगे की न्यायिक कार्यवाही के बाद ही मामले की पूरी तस्वीर स्पष्ट होगी।

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