बेंगलुरु। कर्नाटक सरकार राज्य पुलिस के लिए वाहनों की खरीद व्यवस्था में बड़ा बदलाव करने पर विचार कर रही है। गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने कहा कि पुलिस विभाग के लिए गाड़ियां सीधे खरीदने के पारंपरिक तरीके के स्थान पर उन्हें किराए या लीज पर लेने की संभावनाओं का अध्ययन किया जा रहा है। प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य उपलब्ध सरकारी धन का प्रभावी इस्तेमाल करना, पुलिस को आधुनिक वाहन उपलब्ध कराना और परिचालन क्षमताओं को मजबूत करना है।
इस संबंध में मंत्री ने कर्नाटक पुलिस विभाग के कम्युनिकेशन, लॉजिस्टिक्स और मॉडर्नाइजेशन डिवीजन के अधिकारियों के साथ बैठक की। बैठक में 20 से अधिक कार और दोपहिया वाहन बनाने वाली कंपनियों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। इनमें इलेक्ट्रिक वाहनों के साथ पेट्रोल-डीजल जैसे पारंपरिक ईंधन से चलने वाली गाड़ियां बनाने वाली कंपनियों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। सभी पक्षों ने पुलिस की जरूरतों के अनुसार वाहनों की उपलब्धता और संभावित लीज मॉडल पर विचार साझा किए।
प्रियांक खड़गे ने कहा कि सरकार का प्रमुख उद्देश्य जनता के पैसे का अधिक असरदार और जिम्मेदारीपूर्ण तरीके से उपयोग करना है। पुलिस के लिए बड़ी संख्या में वाहन खरीदने पर सरकार को एकमुश्त भारी धनराशि खर्च करनी पड़ती है। इसके बाद वाहनों के रखरखाव, मरम्मत, बीमा और समय के साथ उन्हें बदलने की जिम्मेदारी भी विभाग को उठानी पड़ती है। लीज या किराया मॉडल अपनाने पर इन खर्चों को व्यवस्थित करने और जरूरत के अनुसार नए वाहन लेने का विकल्प मिल सकता है।
सरकार अभी इस प्रस्ताव के आर्थिक और परिचालन पहलुओं का आकलन कर रही है। यह देखा जाएगा कि सीधे वाहन खरीदने और लीज पर लेने में से कौन-सा तरीका लंबे समय में सरकारी खजाने के लिए अधिक उपयोगी होगा। प्रस्ताव को लागू करने से पहले लीज की अवधि, प्रति वाहन खर्च, रखरखाव की जिम्मेदारी, बीमा, वाहन खराब होने की स्थिति में विकल्प तथा सेवा की शर्तों का अध्ययन किया जाएगा।
पुलिस विभाग को गश्त, आपातकालीन प्रतिक्रिया, अपराध नियंत्रण, यातायात प्रबंधन, संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी और अधिकारियों की आवाजाही के लिए बड़ी संख्या में वाहनों की जरूरत होती है। कई बार पुराने वाहनों की मरम्मत पर अधिक खर्च होने के बावजूद उनकी परिचालन क्षमता अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहती। ऐसे वाहनों के कारण आपात स्थिति में पुलिस को घटनास्थल तक पहुंचने में परेशानी हो सकती है।
लीज मॉडल के माध्यम से पुलिस विभाग को निर्धारित समय के बाद पुराने वाहनों को बदलकर नए और आधुनिक वाहन उपलब्ध कराए जा सकते हैं। इससे वाहन बेड़े की औसत आयु कम रखने और उसे बेहतर स्थिति में बनाए रखने में मदद मिलने की उम्मीद है। अगर लीज अनुबंध में रखरखाव और मरम्मत की जिम्मेदारी संबंधित कंपनी को दी जाती है, तो विभाग पर तकनीकी प्रबंधन का बोझ भी कम हो सकता है।
बैठक के दौरान वाहन निर्माता कंपनियों के प्रतिनिधियों से पुलिस की अलग-अलग जरूरतों के अनुसार मॉडल प्रस्तुत करने के लिए कहा गया। शहरी क्षेत्रों में त्वरित प्रतिक्रिया और यातायात प्रबंधन के लिए छोटे तथा आसानी से संचालित होने वाले वाहनों की जरूरत हो सकती है। वहीं ग्रामीण, पहाड़ी या दुर्गम इलाकों के लिए मजबूत और अधिक क्षमता वाले वाहनों की आवश्यकता पड़ती है। महिला सुरक्षा दल, हाईवे पेट्रोलिंग, आपातकालीन सेवाओं और वरिष्ठ अधिकारियों के उपयोग के लिए भी अलग श्रेणी के वाहन जरूरी होते हैं।
बैठक में इलेक्ट्रिक वाहनों की उपयोगिता पर भी चर्चा हुई। सरकार इस बात का अध्ययन कर सकती है कि पुलिस के दैनिक कार्यों में इलेक्ट्रिक कारों और दोपहिया वाहनों को किस सीमा तक शामिल किया जा सकता है। शहरों में सीमित दूरी की गश्त और प्रशासनिक कामकाज के लिए इलेक्ट्रिक वाहन उपयोगी साबित हो सकते हैं। इनके इस्तेमाल से ईंधन पर होने वाला खर्च और वाहनों से निकलने वाला प्रदूषण कम करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, पुलिस के लिए इलेक्ट्रिक वाहन अपनाने से पहले चार्जिंग स्टेशन, बैटरी की क्षमता और आपात स्थिति में लगातार वाहन उपलब्ध रहने जैसे विषयों पर विचार करना जरूरी होगा। लंबी दूरी की यात्रा, ग्रामीण इलाकों में गश्त और चौबीस घंटे की ड्यूटी के लिए चार्जिंग व्यवस्था महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। इसलिए सरकार इलेक्ट्रिक और पारंपरिक वाहनों का मिश्रित बेड़ा तैयार करने की संभावना भी तलाश सकती है।
लीज व्यवस्था को लागू करने में पारदर्शी निविदा प्रक्रिया और स्पष्ट सेवा मानक महत्वपूर्ण होंगे। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रतिस्पर्धी दरों पर अच्छी गुणवत्ता वाले वाहन मिलें और किसी वाहन में खराबी आने पर उसकी जगह तत्काल दूसरा वाहन उपलब्ध कराया जाए। कंपनियों के प्रदर्शन की नियमित समीक्षा और अनुबंध की शर्तों का पालन भी जरूरी होगा।
वाहन निर्माता कंपनियों के साथ हुई इस बैठक को प्रारंभिक विचार-विमर्श के रूप में देखा जा रहा है। कंपनियों से मिलने वाले सुझावों, पुलिस विभाग की आवश्यकताओं और वित्तीय विश्लेषण के आधार पर आगे की नीति तैयार की जा सकती है। योजना को स्वीकृति मिलने पर वाहनों की श्रेणी और संख्या निर्धारित करने के बाद चरणबद्ध तरीके से इसे लागू किया जा सकता है।
सरकार का मानना है कि आधुनिक और सुव्यवस्थित वाहन बेड़ा पुलिस की प्रतिक्रिया क्षमता को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। घटनास्थल तक जल्दी पहुंचना, संकट में फंसे नागरिकों की सहायता करना और नियमित गश्त बढ़ाना बेहतर सार्वजनिक सेवा से सीधे जुड़ा है। पर्याप्त संख्या में चालू हालत वाले वाहन उपलब्ध होने से पुलिसकर्मियों को अपने दायित्व निभाने में सुविधा होगी।
फिलहाल सरकार ने इस मॉडल पर अंतिम निर्णय नहीं लिया है। संबंधित विभागों और वाहन कंपनियों से मिले सुझावों का मूल्यांकन करने के बाद आगे की रूपरेखा सामने आने की उम्मीद है। यदि यह प्रस्ताव व्यवहार्य पाया जाता है, तो पुलिस विभाग में वाहन प्रबंधन की मौजूदा व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव हो सकता है।