मांड्या। कावेरी बेसिन में पानी छोड़े जाने को लेकर कर्नाटक के मांड्या जिले में किसानों का विरोध-प्रदर्शन गुरुवार को और तेज हो गया। किसानों ने आरोप लगाया कि कृष्णराज सागर (KRS) बांध से जरूरत से ज्यादा पानी छोड़ा जा रहा है, जिससे कावेरी बेसिन के किसानों के सामने सिंचाई और जल उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ गई है।

किसानों का कहना है कि कावेरी नदी पर बने KRS बांध से बड़ी मात्रा में पानी बाहर छोड़े जाने के कारण आने वाले दिनों में कृषि क्षेत्र पर इसका असर पड़ सकता है। उन्होंने सरकार से मांग की कि स्थानीय किसानों की जरूरतों और जलाशय में उपलब्ध पानी की स्थिति को ध्यान में रखते हुए पानी छोड़ने के फैसले पर पुनर्विचार किया जाए।

संजय सर्कल पर किसानों का प्रदर्शन

गुरुवार को मांड्या के संजय सर्कल में किसानों ने विरोध-प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने कावेरी जल प्रबंधन से जुड़े फैसले के खिलाफ नाराजगी जताई और राज्य सरकार से किसानों के हितों को प्राथमिकता देने की मांग की।

किसानों का आरोप है कि कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण यानी CWMA के निर्देश के बाद कर्नाटक सरकार तमिलनाडु के लिए KRS से पानी छोड़ रही है। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि कावेरी बेसिन के किसान खुद पानी की उपलब्धता को लेकर चिंतित हैं, ऐसे में बड़ी मात्रा में पानी दूसरे राज्य के लिए छोड़ा जाना उनके लिए परेशानी बढ़ा सकता है।

प्रदर्शन के दौरान किसानों ने अपनी मांगों को लेकर सरकार के खिलाफ नाराजगी जाहिर की और पानी छोड़ने के फैसले पर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की।

15 दिनों तक रोज 12 हजार क्यूसेक पानी

कावेरी जल बंटवारे को लेकर हालिया घटनाक्रम में कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) की सिफारिश महत्वपूर्ण है। समिति ने 12 अगस्त से लगातार 15 दिनों तक प्रतिदिन 12,000 क्यूसेक पानी छोड़े जाने की सिफारिश की थी।

इसके बाद कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) ने इस सिफारिश को मंजूरी दे दी। इसी फैसले को लेकर कावेरी बेसिन के किसानों में असंतोष बढ़ा है।

किसानों का कहना है कि नदी के पानी पर निर्भर कृषि व्यवस्था में जलाशयों के पानी का इस्तेमाल स्थानीय जरूरतों के हिसाब से भी किया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि अगर बांध से लगातार बड़ी मात्रा में पानी छोड़ा जाता है तो भविष्य में सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी पर दबाव पड़ सकता है।

कावेरी जल को लेकर पुराना विवाद

कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी के पानी को लेकर लंबे समय से विवाद रहा है। दोनों राज्यों में कृषि और पेयजल की जरूरतें कावेरी नदी पर काफी हद तक निर्भर हैं। मानसून और जलाशयों में पानी की उपलब्धता के अनुसार दोनों राज्यों के बीच पानी छोड़ने को लेकर समय-समय पर विवाद सामने आते रहे हैं।

कावेरी बेसिन में स्थित मांड्या कर्नाटक के प्रमुख कृषि क्षेत्रों में शामिल है। यहां बड़ी संख्या में किसान सिंचाई के लिए कावेरी नदी और KRS जलाशय पर निर्भर हैं। इसलिए KRS से पानी छोड़ने का फैसला स्थानीय किसानों के लिए सीधे तौर पर महत्वपूर्ण माना जाता है।

किसानों को फसल की चिंता

प्रदर्शन कर रहे किसानों की सबसे बड़ी चिंता कृषि सिंचाई को लेकर है। किसानों का कहना है कि खेती के लिए पानी की उपलब्धता पहले से ही महत्वपूर्ण मुद्दा है। ऐसे में यदि KRS से लगातार पानी छोड़ा जाता है तो इसका असर जलाशय के भंडार और भविष्य की सिंचाई व्यवस्था पर पड़ सकता है।

किसानों ने मांग की है कि पानी छोड़ने का फैसला केवल अंतरराज्यीय जल बंटवारे को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि कावेरी बेसिन के किसानों की वास्तविक जरूरतों को देखते हुए किया जाना चाहिए।

सरकार पर दबाव बढ़ा

मांड्या में किसानों के विरोध के बाद राज्य सरकार पर भी दबाव बढ़ गया है। प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट किया कि वे कावेरी बेसिन के किसानों के हितों से समझौता नहीं चाहते। उनका कहना है कि राज्य सरकार को CWMA के आदेश के साथ-साथ स्थानीय परिस्थितियों का भी आकलन करना चाहिए।

किसानों ने यह भी संकेत दिया कि यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो विरोध-प्रदर्शन को और व्यापक किया जा सकता है। इससे कावेरी जल बंटवारे का मुद्दा एक बार फिर कर्नाटक में राजनीतिक और किसान आंदोलन का प्रमुख विषय बन सकता है।

जलाशय के स्तर पर नजर

KRS बांध से पानी छोड़े जाने के बीच अब जलाशय के जलस्तर और कावेरी बेसिन में पानी की उपलब्धता पर नजर बनी हुई है। आने वाले दिनों में बारिश और जलाशयों में पानी की आवक की स्थिति भी महत्वपूर्ण होगी।

यदि जलाशयों में पर्याप्त पानी की आवक होती है तो किसानों की चिंताएं कुछ कम हो सकती हैं। वहीं, पानी की आवक कम रहने और लगातार जल निकासी जारी रहने पर कृषि क्षेत्र में संकट की आशंका बढ़ सकती है।

फिलहाल मांड्या में किसानों का आंदोलन इस बात का संकेत है कि कावेरी जल बंटवारे का मुद्दा स्थानीय स्तर पर एक बार फिर संवेदनशील हो गया है। किसान KRS से पानी छोड़े जाने के फैसले पर पुनर्विचार और अपने हिस्से की सिंचाई जरूरतों को सुरक्षित करने की मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर, CWMA द्वारा मंजूर की गई 12,000 क्यूसेक प्रतिदिन पानी छोड़ने की व्यवस्था के बीच आने वाले दिनों में कर्नाटक सरकार के सामने किसानों की नाराजगी और अंतरराज्यीय जल प्रबंधन—दोनों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती होगी।

Tags: