बेंगलुरु। कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने केंद्र सरकार की इथेनॉल नीति को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर केंद्र की उस व्यवस्था पर निशाना साधा, जिसके तहत खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किसानों से चावल की खरीद की जाती है और उसके भंडारण व परिवहन पर भी सरकारी खर्च होता है। खड़गे ने सवाल किया कि यदि यही चावल बाद में इथेनॉल उत्पादन करने वाली कंपनियों को खरीद लागत से करीब 40 प्रतिशत कम कीमत पर बेचा जाता है, तो इस व्यवस्था का आर्थिक औचित्य क्या है।
खड़गे ने अपनी टिप्पणी में केंद्र की इथेनॉल नीति को लेकर तंज कसते हुए कहा कि भारत में इथेनॉल का “हिसाब-किताब” समझ से परे है। उनके बयान ने खाद्य सुरक्षा, सरकारी खरीद, सार्वजनिक संसाधनों और जैव ईंधन नीति के बीच संतुलन को लेकर नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है।
किसानों से खरीद और सरकारी खर्च का सवाल
प्रियांक खड़गे का मुख्य सवाल सरकारी खरीद व्यवस्था से जुड़ा है। खाद्य सुरक्षा के लिए सरकार किसानों से अनाज खरीदती है। इसके बाद खरीदे गए अनाज को सुरक्षित रखने के लिए भंडारण की व्यवस्था की जाती है और जरूरत के अनुसार उसे अलग-अलग स्थानों तक पहुंचाने पर परिवहन खर्च भी सरकार उठाती है।
खड़गे का तर्क है कि इस पूरी प्रक्रिया में सरकारी धन का इस्तेमाल होता है। यानी किसानों से अनाज खरीदने से लेकर उसे स्टोर करने और एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने तक की लागत का भार अंततः सार्वजनिक धन पर पड़ता है।
ऐसे में उनका सवाल है कि जब इसी चावल का इस्तेमाल बाद में इथेनॉल बनाने के लिए किया जाता है और उसे खरीद लागत से काफी कम कीमत पर उपलब्ध कराया जाता है, तो इस अंतर का बोझ किस पर पड़ता है।
खरीद लागत से 40 फीसदी कम कीमत का दावा
कर्नाटक के गृह मंत्री ने दावा किया कि सरकार जिस चावल को किसानों से खरीदती है, उसे इथेनॉल बनाने वाली कंपनियों को करीब 40 प्रतिशत कम कीमत पर बेचती है। उन्होंने इसी अंतर को अपनी आलोचना का प्रमुख आधार बनाया है।
उनके मुताबिक, यदि किसी खाद्यान्न को खरीदने, स्टोर करने और परिवहन में सरकारी संसाधन खर्च होते हैं, तो उसे कम कीमत पर औद्योगिक इस्तेमाल के लिए उपलब्ध कराने की नीति पर पारदर्शी तरीके से चर्चा होनी चाहिए।
खड़गे ने यह सवाल ऐसे समय उठाया है जब भारत में पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण को बढ़ाने और आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने की नीति पर जोर दिया जा रहा है।
इथेनॉल नीति का व्यापक उद्देश्य
भारत सरकार लंबे समय से पेट्रोल में इथेनॉल के मिश्रण को बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है। इसका उद्देश्य जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना, कच्चे तेल के आयात पर होने वाले खर्च को घटाना और किसानों के लिए कृषि उत्पादों के वैकल्पिक बाजार तैयार करना है।
इथेनॉल का उत्पादन गन्ने और अन्य कृषि उत्पादों के अलावा कुछ परिस्थितियों में अतिरिक्त या अधिशेष अनाज से भी किया जा सकता है। इससे कृषि क्षेत्र को अतिरिक्त मांग मिल सकती है और जैव ईंधन क्षेत्र को बढ़ावा दिया जा सकता है।
हालांकि, खाद्यान्न का इस्तेमाल ईंधन बनाने के लिए करने को लेकर समय-समय पर बहस भी होती रही है। सवाल यह रहता है कि जिस अनाज का इस्तेमाल खाद्य सुरक्षा के लिए किया जा सकता है, उसका औद्योगिक इस्तेमाल किस सीमा तक उचित है।
खाद्य सुरक्षा बनाम जैव ईंधन
प्रियांक खड़गे की टिप्पणी इसी व्यापक बहस को सामने लाती है। भारत जैसे बड़े देश में खाद्य सुरक्षा एक महत्वपूर्ण नीति प्राथमिकता है। गरीब और जरूरतमंद परिवारों को खाद्यान्न उपलब्ध कराने के लिए सरकार बड़े पैमाने पर अनाज की खरीद और वितरण करती है।
दूसरी तरफ, जैव ईंधन नीति के तहत कृषि उत्पादों का इस्तेमाल ऊर्जा क्षेत्र में किया जा रहा है। सरकार का तर्क रहा है कि अधिशेष अनाज का इस्तेमाल इथेनॉल के लिए किया जा सकता है, जिससे किसानों को बाजार मिल सकता है और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो सकती है।
लेकिन खड़गे का सवाल इस बात पर है कि ऐसी व्यवस्था में सरकारी खरीद और सब्सिडी का आर्थिक लाभ किसे मिल रहा है और उसका वास्तविक खर्च कितना है।
राजनीतिक बहस तेज होने के संकेत
केंद्र की नीतियों पर सवाल उठाने वाले खड़गे पहले भी आर्थिक और सामाजिक मुद्दों को लेकर सरकार की आलोचना करते रहे हैं। इस बार उनका निशाना इथेनॉल नीति बनी है। उनके बयान से केंद्र और राज्य सरकार के बीच नीति को लेकर राजनीतिक बहस तेज होने की संभावना है।
यह मुद्दा खासतौर पर किसानों से जुड़ा होने के कारण महत्वपूर्ण है। यदि सरकार किसानों से अनाज खरीदती है, तो उसका समर्थन मूल्य, खरीद लागत और अंतिम इस्तेमाल किसानों के हित से सीधे जुड़े सवाल हैं।
खड़गे की टिप्पणी का एक पहलू यह भी है कि सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि खाद्य सुरक्षा के लिए खरीदे गए अनाज को औद्योगिक इस्तेमाल के लिए कम कीमत पर उपलब्ध कराने से सार्वजनिक वित्त पर कितना प्रभाव पड़ता है।
पारदर्शिता की मांग अहम
इथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देना भारत की ऊर्जा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन इसके साथ सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर पारदर्शिता भी जरूरी है। यही वह बिंदु है जिस पर प्रियांक खड़गे ने केंद्र सरकार से सवाल किया है।
उनकी टिप्पणी के बाद अब बहस केवल इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह भी सवाल उठेगा कि खाद्य सुरक्षा के लिए खरीदे गए अनाज का इस्तेमाल किस कीमत और किन शर्तों पर औद्योगिक क्षेत्र को किया जा रहा है।
फिलहाल खड़गे के बयान ने इथेनॉल नीति के आर्थिक पहलू को राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। आने वाले दिनों में केंद्र की ओर से इस कीमत अंतर और सरकारी खरीद व्यवस्था को लेकर स्पष्टीकरण दिए जाने पर बहस को और दिशा मिल सकती है।