मैसूर दशहरा 2026 की तैयारियों का शुभारंभ, 9 हाथियों के दल को किया गया रवाना
मैसूर। दुनिया भर में अपनी भव्यता, परंपरा और ऐतिहासिक विरासत के लिए प्रसिद्ध मैसूर दशहरा महोत्सव 2026 की तैयारियां आधिकारिक तौर पर शुरू हो गई हैं। मैसूर के प्रभारी मंत्री डॉ. यतींद्र सिद्धारमैया ने बुधवार सुबह हुंसूर के वीरनाहोसहली में पारंपरिक पूजा-अर्चना के बाद दशहरा ‘गजपड़े’ यानी हाथियों के दल को रवाना किया। यह कार्यक्रम सुबह 10 बजे से 10:28 बजे के बीच शुभ ‘तुला लग्न’ में संपन्न हुआ।
दशहरा की तैयारियों की शुरुआत के साथ ही मैसूर में एक बार फिर उत्सव का माहौल बनने लगा है। ऐतिहासिक मैसूर दशहरा में हाथियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। ये हाथी भव्य दशहरा जुलूस की प्रमुख पहचान हैं और उत्सव के दौरान आकर्षण का केंद्र बने रहते हैं।
पूजा-अर्चना के बाद हाथियों को रवाना किया
वीरनाहोसहली में आयोजित पारंपरिक कार्यक्रम में डॉ. यतींद्र सिद्धारमैया ने विधिवत पूजा-अर्चना की। इसके बाद उन्होंने फलों की टोकरी भेंट कर दशहरा हाथियों के दल को हरी झंडी दिखाकर मैसूर के लिए रवाना किया।
दशहरा गजपड़े के रवाना होने के साथ ही महोत्सव की तैयारियों का औपचारिक आगाज हो गया। परंपरा के अनुसार हाथियों को विशेष प्रशिक्षण और अभ्यास के लिए मैसूर लाया जाता है, जहां वे दशहरा जुलूस के लिए निर्धारित प्रक्रियाओं से गुजरते हैं।
पहले चरण में 9 हाथी पहुंचे
इस वर्ष दशहरा गजपड़े के पहले चरण में कुल 9 हाथियों को मैसूर के लिए रवाना किया गया है। इनमें धनंजय, महेंद्र, एकलव्य, प्रशांत, गोपी, श्रीराम, सुग्रीव, लक्ष्मी और कावेरी शामिल हैं।
इन हाथियों को दशहरा समारोह की तैयारियों के लिए विशेष निगरानी में रखा जाएगा। महोत्सव के दौरान उनकी भूमिका को देखते हुए उनके स्वास्थ्य, खान-पान, प्रशिक्षण और नियमित अभ्यास पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
मैसूर दशहरा में हाथियों को केवल जुलूस का हिस्सा नहीं माना जाता, बल्कि वे इस ऐतिहासिक परंपरा की पहचान बन चुके हैं। दशहरा के मुख्य आकर्षणों में शामिल भव्य हाथी जुलूस को देखने के लिए देश-विदेश से पर्यटक मैसूर पहुंचते हैं।
ऐतिहासिक परंपरा का अहम हिस्सा है गजपड़े
मैसूर दशहरा की सबसे खास परंपराओं में से एक ‘गजपड़े’ है। हाथियों के दल को सजाकर दशहरा जुलूस में शामिल किया जाता है। विशेष रूप से मुख्य जुलूस के दौरान हाथियों की मौजूदगी पूरे आयोजन को भव्य रूप देती है।
हाथियों के प्रशिक्षण की प्रक्रिया कई चरणों में होती है। उन्हें शहर के वातावरण, भीड़, शोर और जुलूस के दौरान होने वाली गतिविधियों के अनुरूप तैयार किया जाता है। इसके लिए उन्हें नियमित अभ्यास कराया जाता है, ताकि मुख्य समारोह के दौरान किसी तरह की परेशानी न हो।
पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र
मैसूर दशहरा कर्नाटक के सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आयोजनों में से एक है। इसकी भव्यता देखने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से पर्यटक पहुंचते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मैसूर दशहरा की पहचान है।
महोत्सव के दौरान मैसूर शहर को विशेष रूप से सजाया जाता है। महलों, प्रमुख सड़कों और सार्वजनिक स्थलों पर रोशनी और सजावट की जाती है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों, पारंपरिक प्रस्तुतियों और ऐतिहासिक आयोजनों के कारण पूरे शहर में उत्सव का माहौल रहता है।
दशहरा जुलूस इस पूरे आयोजन का प्रमुख आकर्षण होता है। इसमें सजे-धजे हाथियों की मौजूदगी लोगों का ध्यान विशेष रूप से खींचती है।
हाथियों की देखभाल पर विशेष जोर
दशहरा समारोह में हाथियों की अहम भूमिका होने के कारण उनकी देखभाल भी प्रशासन की प्राथमिकताओं में रहती है। हाथियों को मैसूर लाने के बाद उनके लिए निर्धारित स्थानों पर भोजन और आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था की जाती है।
उनके स्वास्थ्य की निगरानी के लिए विशेषज्ञों की मदद ली जाती है। प्रशिक्षण के दौरान भी हाथियों की क्षमता और व्यवहार पर नजर रखी जाती है। जुलूस में शामिल होने वाले हाथियों को भीड़ और शोर के बीच शांत रहने का अभ्यास कराया जाता है।
इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि हाथी और उनके साथ काम करने वाले महावत सुरक्षित रहें और मुख्य समारोह बिना किसी बाधा के संपन्न हो।
दशहरा की तैयारियों को मिली गति
पहले चरण में नौ हाथियों को रवाना किए जाने के साथ अब मैसूर दशहरा की तैयारियां तेज होने की उम्मीद है। आने वाले दिनों में अन्य हाथियों को भी चरणबद्ध तरीके से मैसूर लाया जा सकता है।
हाथियों के पहुंचने के बाद प्रशिक्षण और अभ्यास की गतिविधियां शुरू होंगी। इसके साथ ही शहर में महोत्सव से जुड़े अन्य इंतजामों को भी अंतिम रूप देने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
दशहरा आयोजन के लिए प्रशासन के सामने सुरक्षा, यातायात, पर्यटकों की सुविधा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के प्रबंधन जैसी कई जिम्मेदारियां रहती हैं। ऐसे में तैयारियों का समय पर शुरू होना महत्वपूर्ण माना जाता है।
परंपरा और आधुनिक आयोजन का संगम
मैसूर दशहरा की खासियत यह है कि इसमें सदियों पुरानी परंपराओं के साथ आधुनिक आयोजन व्यवस्था का भी समावेश देखने को मिलता है। धार्मिक अनुष्ठान, शाही परंपराएं, सांस्कृतिक कार्यक्रम और आधुनिक प्रकाश सज्जा महोत्सव को विशिष्ट बनाते हैं।
गजपड़े का रवाना होना इसी परंपरा का हिस्सा है। शुभ मुहूर्त में पूजा-अर्चना के बाद हाथियों को रवाना करना आयोजन की धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को दर्शाता है।
मैसूर में उत्सव की शुरुआत
वीरनाहोसहली से नौ हाथियों के रवाना होने के साथ मैसूर में दशहरा 2026 की तैयारियों का औपचारिक शुभारंभ हो चुका है। धनंजय, महेंद्र, एकलव्य, प्रशांत, गोपी, श्रीराम, सुग्रीव, लक्ष्मी और कावेरी अब महोत्सव की तैयारियों का हिस्सा बनेंगे।
आने वाले दिनों में इन हाथियों का प्रशिक्षण और अभ्यास जारी रहेगा। जैसे-जैसे दशहरा नजदीक आएगा, मैसूर शहर में उत्सव की रौनक भी बढ़ती जाएगी।
इस बार भी उम्मीद है कि मैसूर दशहरा अपनी भव्यता, सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक परंपराओं के साथ देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करेगा। गजपड़े की पहली खेप का रवाना होना इस भव्य आयोजन की तैयारियों की दिशा में पहला बड़ा कदम है।