बेंगलुरु। कर्नाटक खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन ने राज्य में ‘एनालॉग’ या ‘नॉन-डेयरी’ पनीर के खिलाफ बड़ा कदम उठाया है। विभाग ने पनीर के नाम पर बेचे जा रहे ऐसे उत्पादों के निर्माण, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, भंडारण, परिवहन, वितरण और बिक्री पर एक साल के लिए रोक लगा दी है। यह कार्रवाई खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता और उपभोक्ताओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए की गई है।

विभाग की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार, यह प्रतिबंध खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के तहत लगाया गया है। आदेश में एनालॉग या नॉन-डेयरी पनीर से जुड़ी सभी प्रमुख गतिविधियों को प्रतिबंध के दायरे में रखा गया है। विभाग के अनुसार यह रोक 17 अगस्त 2026 तक प्रभावी रहेगी।

क्या है एनालॉग पनीर?

एनालॉग पनीर को सामान्य तौर पर पनीर के विकल्प या उसकी औद्योगिक नकल के रूप में तैयार किया जाता है। पारंपरिक पनीर दूध या डेयरी सामग्री से तैयार होता है, जबकि एनालॉग पनीर में डेयरी के बजाय अलग-अलग वनस्पति आधारित सामग्री का इस्तेमाल किया जा सकता है।

ऐसे उत्पादों में पाम ऑयल जैसे वनस्पति तेल, औद्योगिक स्टार्च और अन्य रासायनिक या प्रसंस्करण सामग्री का इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है। इसके कारण यह उत्पाद देखने में पनीर जैसा लग सकता है, लेकिन इसकी सामग्री पारंपरिक डेयरी पनीर से अलग होती है।

खाद्य सुरक्षा विभाग की चिंता मुख्य रूप से ऐसे उत्पादों की बिक्री और लेबलिंग को लेकर है, खासकर तब जब उन्हें उपभोक्ताओं के सामने पनीर के रूप में पेश किया जाता है।

पनीर के नाम पर बिक्री पर सख्ती

विभाग के फैसले का सीधा असर उन इकाइयों और कारोबारियों पर पड़ेगा जो एनालॉग पनीर का निर्माण या व्यापार करते हैं। अब राज्य में ऐसे उत्पादों के उत्पादन से लेकर बाजार तक पहुंचाने की पूरी श्रृंखला प्रतिबंध के दायरे में आ गई है।

इसमें निर्माण के अलावा प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, स्टोरेज और ट्रांसपोर्टेशन जैसी गतिविधियां भी शामिल हैं। यानी केवल दुकान पर ऐसे उत्पाद की बिक्री रोकना ही विभाग का उद्देश्य नहीं है, बल्कि उसके निर्माण और सप्लाई नेटवर्क को भी प्रतिबंधित किया गया है।

उपभोक्ताओं के हित में कदम

खाद्य सुरक्षा विभाग की कार्रवाई को उपभोक्ताओं के हित में उठाए गए कदम के तौर पर देखा जा रहा है। बाजार में कई ऐसे उत्पाद उपलब्ध होते हैं, जो पारंपरिक खाद्य पदार्थों की तरह दिखाई देते हैं, लेकिन उनकी सामग्री अलग होती है।

यदि किसी उत्पाद को पनीर के नाम से बेचा जा रहा है और उसमें वास्तविक डेयरी सामग्री नहीं है, तो उपभोक्ता के लिए सही जानकारी प्राप्त करना महत्वपूर्ण हो जाता है। खासकर ऐसे ग्राहक जो अपनी डाइट या धार्मिक-सांस्कृतिक कारणों से डेयरी उत्पादों का चयन करते हैं, उनके लिए उत्पाद की सही जानकारी जरूरी है।

विभाग की ओर से लगाए गए प्रतिबंध का उद्देश्य ऐसे उत्पादों की उपलब्धता पर नियंत्रण रखना और खाद्य बाजार में मानकों का पालन सुनिश्चित करना है।

होटल और रेस्टोरेंट पर भी असर

एनालॉग पनीर का इस्तेमाल खाद्य सेवा क्षेत्र में भी किया जा सकता है। होटल, रेस्टोरेंट, कैटरिंग कारोबार और अन्य खाद्य प्रतिष्ठानों में पनीर से बने व्यंजन बड़ी मात्रा में तैयार किए जाते हैं।

ऐसे में प्रतिबंध का असर उन कारोबारियों पर भी पड़ सकता है जो नॉन-डेयरी पनीर का इस्तेमाल अपने खाद्य उत्पादों में करते हैं। उन्हें अब पनीर की खरीद और उसके स्रोत को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी।

खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की ओर से बाजार और खाद्य प्रतिष्ठानों में निरीक्षण के दौरान ऐसे उत्पादों की जांच किए जाने की संभावना है।

कानून के तहत लगाया गया प्रतिबंध

कर्नाटक खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन ने यह कार्रवाई Food Safety and Standards Act, 2006 के तहत की है। विभाग की अधिसूचना में एनालॉग या नॉन-डेयरी पनीर से संबंधित निर्माण से लेकर बिक्री तक की गतिविधियों पर रोक का उल्लेख किया गया है।

इसका मतलब है कि संबंधित कारोबारी अब प्रतिबंधित अवधि के दौरान ऐसे उत्पाद को तैयार करने, पैक करने, रखने, एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने या बेचने का काम नहीं कर सकेंगे।

विभाग द्वारा जारी आदेश के मुताबिक प्रतिबंध 17 अगस्त 2026 तक प्रभावी रहेगा।

बाजार में जांच बढ़ने की संभावना

प्रतिबंध लागू होने के बाद खाद्य सुरक्षा विभाग द्वारा बाजारों, दुकानों, खाद्य प्रतिष्ठानों और निर्माण इकाइयों में निरीक्षण बढ़ाया जा सकता है। अधिकारियों की ओर से उत्पादों के नमूने लेकर उनकी जांच किए जाने की भी संभावना है।

यदि जांच के दौरान प्रतिबंधित उत्पाद पाए जाते हैं तो संबंधित कारोबारी के खिलाफ खाद्य सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है। इससे खाद्य कारोबारियों के बीच भी इस आदेश को लेकर सतर्कता बढ़ने की उम्मीद है।

डेयरी पनीर और एनालॉग उत्पाद में अंतर

पारंपरिक पनीर दूध से तैयार किया जाता है और इसमें डेयरी प्रोटीन प्रमुख भूमिका निभाता है। इसके विपरीत एनालॉग पनीर में डेयरी सामग्री की जगह वनस्पति तेल, स्टार्च और अन्य सामग्री का इस्तेमाल किया जा सकता है।

यही अंतर खाद्य सुरक्षा और लेबलिंग के लिहाज से महत्वपूर्ण है। उपभोक्ता जिस उत्पाद को पनीर समझकर खरीदता है, उसके बारे में उसे सही जानकारी मिलनी चाहिए। विभाग की कार्रवाई इसी तरह की स्पष्टता और खाद्य मानकों को लेकर सख्ती का संकेत देती है।

कारोबारियों के लिए बढ़ी जिम्मेदारी

प्रतिबंध के बाद खाद्य कारोबारियों के लिए उत्पादों की खरीद, स्टोरेज और बिक्री में अधिक सावधानी बरतना जरूरी होगा। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके प्रतिष्ठान में प्रतिबंधित एनालॉग पनीर का इस्तेमाल या बिक्री न हो।

कर्नाटक सरकार की यह कार्रवाई खाद्य पदार्थों में मिलावट और गलत तरीके से उत्पादों की बिक्री पर नियंत्रण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। आने वाले समय में विभाग की जांच और प्रवर्तन कार्रवाई से यह स्पष्ट होगा कि प्रतिबंध को राज्यभर में किस तरह लागू किया जाता है।

फिलहाल, 17 अगस्त 2026 तक एनालॉग या नॉन-डेयरी पनीर के निर्माण से लेकर बिक्री तक पर रोक लागू है। इससे उपभोक्ताओं को बाजार में उपलब्ध पनीर उत्पादों की गुणवत्ता और वास्तविक सामग्री को लेकर अधिक सतर्क रहने का संदेश भी गया है।

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