बेंगलुरु। कर्नाटक में वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी और जेल एवं सुधार सेवाओं के महानिदेशक आलोक कुमार ने राज्य सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में उनके खिलाफ रखे गए कथित गलत तथ्यों पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने मुख्य सचिव शालिनी रजनीश को पत्र लिखकर अदालत में उनके बारे में दिए गए बयानों को सुधारने की मांग की है। आलोक कुमार का कहना है कि 2019 के फोन टैपिंग मामले में उनके खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की जांच पहले ही बंद हो चुकी है, इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट में उनके खिलाफ जांच लंबित होने की बात कही गई।यह विवाद कर्नाटक लोक सेवा आयोग (KPSC) की भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की जांच के लिए गठित विशेष जांच दल (SIT) से जुड़ा है। कर्नाटक हाई कोर्ट ने आलोक कुमार को एसआईटी का प्रमुख नियुक्त किया था। हालांकि, राज्य सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
मुख्य सचिव को पत्र लिखकर जताई नाराजगी
आलोक कुमार ने 5 अक्टूबर को मुख्य सचिव शालिनी रजनीश को पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट में उनके खिलाफ प्रस्तुत किए गए तथ्यों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल को मामले से जुड़ी गलत जानकारी दी गई थी।पत्र में आलोक कुमार ने कहा कि बिना किसी गलती के उनका नाम अनावश्यक रूप से विवाद में घसीटा गया। इससे उनकी पेशेवर ईमानदारी और प्रतिष्ठा पर सवाल खड़े हुए हैं।उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दिए गए बयान सरकारी रिकॉर्ड में उपलब्ध तथ्यों के विपरीत हैं। उनके मुताबिक, अदालत में ऐसी जानकारी पेश की गई, जिससे उनकी छवि प्रभावित हुई।
कपिल सिब्बल के बयान पर उठाए सवाल
एक अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में कर्नाटक सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने हाई कोर्ट द्वारा गठित एसआईटी के सदस्यों की नियुक्ति पर आपत्ति जताई थी।सिब्बल ने आलोक कुमार को जांच दल का प्रमुख बनाए जाने का विरोध करते हुए वर्ष 2019 के फोन टैपिंग मामले का उल्लेख किया था। उन्होंने अदालत में कुमार के खिलाफ पूर्व में हुई जांच से जुड़े मुद्दे उठाए।आलोक कुमार ने अपने पत्र में कहा कि यह दावा तथ्यात्मक रूप से गलत है कि उनके खिलाफ सीबीआई की जांच अभी जारी है। उन्होंने मुख्य सचिव से सरकार की कानूनी टीम को सही जानकारी उपलब्ध कराने का अनुरोध किया।
CBI जांच बंद होने का किया दावा
आलोक कुमार के अनुसार, वर्ष 2019 के फोन टैपिंग मामले में सीबीआई की जांच पूरी हो चुकी है। जांच एजेंसी ने जून 2021 में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी, जिसे विशेष अदालत ने फरवरी 2024 में स्वीकार कर लिया था।उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ जांच लंबित होने की जानकारी देना गलत है। आलोक कुमार के मुताबिक, अदालत में ऐसी बात रखे जाने से उनकी पेशेवर छवि को नुकसान पहुंचा है।हालांकि, इस मामले से जुड़ी विभागीय कार्रवाई का अलग कानूनी इतिहास है। राज्य सरकार ने मई 2025 में उनके खिलाफ नए सिरे से विभागीय कार्रवाई शुरू करने का निर्णय लिया था। इसे आलोक कुमार ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण में चुनौती दी थी, जहां उन्हें अंतरिम राहत मिली। इससे संबंधित मामला हाई कोर्ट में लंबित बताया गया है।
KPSC भर्ती घोटाले की जांच से जुड़ा विवाद
कर्नाटक लोक सेवा आयोग की दो भर्ती प्रक्रियाओं में कथित अनियमितताओं की जांच को लेकर यह विवाद सामने आया है।कर्नाटक हाई कोर्ट ने 21 सितंबर को मामले की नए सिरे से जांच के लिए एसआईटी गठित करने का निर्देश दिया था। इसमें वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी आलोक कुमार को प्रमुख बनाया गया था।राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के आदेश का विरोध करते हुए तर्क दिया कि जांच दल के सदस्यों का चयन करने का अधिकार सरकार के पास होना चाहिए।सुप्रीम कोर्ट ने एक अक्टूबर को हाई कोर्ट के आदेश के संबंधित हिस्सों पर रोक लगा दी थी। इसके बाद 13 अक्टूबर को राज्य सरकार को एसआईटी के सदस्यों में बदलाव करने की अनुमति भी दी गई।
सरकार से गलत जानकारी सुधारने की मांग
आलोक कुमार ने मुख्य सचिव से आग्रह किया कि सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए जाने वाले हलफनामे में उनके खिलाफ किसी भी अप्रमाणित या गलत आरोप को शामिल नहीं किया जाए।उन्होंने कहा कि अदालत के सामने तथ्यात्मक स्थिति स्पष्ट करना जरूरी है। साथ ही उन्होंने बताया कि उन्होंने स्वयं एसआईटी प्रमुख बनने का अनुरोध नहीं किया था, बल्कि हाई कोर्ट ने उन्हें इस जिम्मेदारी के लिए चुना था।फिलहाल यह मामला एसआईटी की संरचना, राज्य सरकार की आपत्तियों और आलोक कुमार की पेशेवर प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ है। उनकी ओर से सरकार को भेजे गए पत्र के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकार अदालत के समक्ष उनके संबंध में क्या स्पष्टीकरण प्रस्तुत करती है।
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