मेकेदातु परियोजना पर फिर टकराव

Update: 2026-08-06 06:53 GMT

बेंगलुरु/चेन्नई: कावेरी नदी पर प्रस्तावित मेकेदातु बैलेंसिंग रिज़र्वोयर-कम-पेयजल परियोजना एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच इस परियोजना को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद अब भी जारी है। जहां कर्नाटक इसे बेंगलुरु की भविष्य की पेयजल जरूरतों को पूरा करने और कावेरी जल प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए जरूरी बता रहा है, वहीं तमिलनाडु इसका लगातार विरोध कर रहा है। दूसरी ओर, पर्यावरण विशेषज्ञों ने भी परियोजना के संभावित प्रभावों को लेकर चिंता जताई है।

कर्नाटक सरकार का कहना है कि मेकेदातु परियोजना राजधानी बेंगलुरु और आसपास के क्षेत्रों की बढ़ती आबादी की जल जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। राज्य के अनुसार, तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण बेंगलुरु में पानी की मांग लगातार बढ़ रही है और भविष्य में पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए नए जल स्रोतों की आवश्यकता होगी।

कर्नाटक का तर्क है कि प्रस्तावित जलाशय कावेरी बेसिन में जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन में मदद करेगा। राज्य सरकार के मुताबिक, परियोजना का उद्देश्य पेयजल भंडारण बढ़ाना और जल प्रवाह को नियंत्रित करना है, जिससे सूखे या कम बारिश वाले समय में पानी की उपलब्धता बनाए रखने में सहायता मिल सके।

वहीं, तमिलनाडु सरकार इस परियोजना का विरोध कर रही है। उसका कहना है कि मेकेदातु बांध बनने से कावेरी नदी के निचले हिस्से में पानी के प्राकृतिक प्रवाह पर असर पड़ सकता है। तमिलनाडु की चिंता है कि इससे राज्य को मिलने वाले कावेरी जल की मात्रा प्रभावित हो सकती है और पहले से तय जल बंटवारे की व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।

कावेरी जल विवाद दोनों राज्यों के बीच कई दशकों से राजनीतिक और कानूनी मुद्दा रहा है। नदी के पानी के बंटवारे को लेकर दोनों राज्यों के बीच कई बार मतभेद सामने आए हैं। ऐसे में मेकेदातु परियोजना को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर जल संसाधनों के इस्तेमाल और राज्यों के अधिकारों से जुड़े सवालों को सामने ला दिया है।

तमिलनाडु का कहना है कि कावेरी नदी एक अंतरराज्यीय नदी है और इसके पानी से जुड़े किसी भी बड़े फैसले का असर सभी संबंधित राज्यों पर पड़ता है। राज्य का तर्क है कि किसी भी नई परियोजना को आगे बढ़ाने से पहले जल बंटवारे से जुड़े सभी पहलुओं और संभावित प्रभावों पर विचार किया जाना चाहिए।

इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू पर्यावरण से जुड़ा हुआ है। पर्यावरणविदों ने चिंता जताई है कि प्रस्तावित परियोजना कावेरी वन्यजीव अभयारण्य के भीतर बनाई जाएगी, जो जैव विविधता के लिहाज से बेहद संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े जलाशय के निर्माण से जंगल, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ सकता है।

पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट को मंजूरी देने से पहले उसके पर्यावरणीय प्रभावों का विस्तृत अध्ययन जरूरी है। उनका मानना है कि नदी और जंगल जैसे प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े क्षेत्रों में विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाना बेहद आवश्यक है।

कर्नाटक की ओर से कहा जाता रहा है कि परियोजना को पर्यावरणीय नियमों और आवश्यक मंजूरियों के अनुसार ही आगे बढ़ाया जाएगा। राज्य का कहना है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों को ध्यान में रखते हुए कदम उठाए जाएंगे।

मेकेदातु परियोजना केवल एक जल परियोजना नहीं, बल्कि राज्यों के बीच जल अधिकार, शहरी जरूरतों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े बड़े मुद्दों का प्रतीक बन गई है। बेंगलुरु जैसे तेजी से विकसित होते शहर के लिए पानी की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती है, जबकि नदी के निचले हिस्सों में रहने वाले क्षेत्रों के लिए जल प्रवाह बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस विवाद का समाधान संवाद और वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर ही संभव है। दोनों राज्यों के हितों को ध्यान में रखते हुए ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जिसमें पेयजल जरूरतों, कृषि आवश्यकताओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन कायम रह सके।

आने वाले समय में मेकेदातु परियोजना पर केंद्र सरकार, संबंधित प्राधिकरणों और दोनों राज्यों के बीच होने वाली चर्चाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। परियोजना को लेकर राजनीतिक और कानूनी प्रक्रियाएं जारी हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि कावेरी नदी से जुड़ा यह मुद्दा आने वाले वर्षों में भी दक्षिण भारत की जल राजनीति का एक प्रमुख विषय बना रहेगा।

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