कर्नाटक के जंगलों में अवैध शिकार के पांच मामले, वन्यजीव सुरक्षा पर उठे सवाल
बेंगलुरु। कर्नाटक के जंगलों में पिछले एक महीने के दौरान अवैध शिकार की घटनाओं में बढ़ोतरी ने वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरण संगठनों की चिंता बढ़ा दी है। राज्य के अलग-अलग हिस्सों में महज 30 दिनों के भीतर अवैध शिकार के पांच बड़े मामले सामने आए हैं। इन घटनाओं ने वन्यजीव सुरक्षा व्यवस्था और जंगलों में निगरानी को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
वन विभाग और पुलिस की कार्रवाई में अब तक आठ लोगों की गिरफ्तारी हुई है। अधिकारियों के अनुसार, अवैध शिकार के पीछे मुख्य कारण बाजार में जंगली जानवरों के मांस की बढ़ती मांग बताई जा रही है। इसी मांग के चलते कुछ लोग जंगलों में अवैध गतिविधियों को अंजाम देने की कोशिश कर रहे हैं।
कर्नाटक में सामने आए इन मामलों में सबसे ज्यादा चर्चा कावेरी वन्यजीव अभयारण्य में हुई घटना की हो रही है। यहां वन विभाग की कार्रवाई के दौरान तीन लोगों की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। मृतकों के परिवार और स्थानीय लोग घटना की परिस्थितियों को लेकर सवाल उठा रहे हैं, जबकि वन विभाग का कहना है कि कार्रवाई कथित शिकारियों के खिलाफ की गई थी।
हनुरू तालुक के शाग्या गांव के पास हुई गोलीबारी की घटना के बाद राज्य में अवैध शिकार को लेकर बहस तेज हो गई है। घटनास्थल से हथियार, टॉर्च, शिकार से जुड़े सामान और कथित जंगली जानवरों का मांस बरामद होने की बात सामने आई थी। हालांकि, घटना के तरीके और कार्रवाई को लेकर कई सवाल भी उठाए जा रहे हैं।
इसी बीच राज्य के अन्य हिस्सों में भी अवैध शिकार से जुड़े मामले सामने आए हैं। सोमवार को बीदर जिले में स्थानीय लोगों और पुलिस ने तेलंगाना से आए तीन संदिग्ध शिकारियों को पकड़ा। पुलिस के अनुसार, इन लोगों की गतिविधियां संदिग्ध पाई गईं और पूछताछ के बाद मामले की जांच शुरू की गई।
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि अवैध शिकार केवल जानवरों की संख्या को प्रभावित नहीं करता, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाता है। जंगलों में मौजूद हर जीव पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में शिकार की घटनाएं बढ़ना गंभीर चिंता का विषय है।
विशेषज्ञों के अनुसार, जंगली जानवरों के मांस की मांग और अवैध व्यापार इस समस्या को बढ़ावा देते हैं। शिकारी अक्सर आर्थिक लाभ के लिए संरक्षित प्रजातियों को निशाना बनाते हैं। इसके लिए वे जंगलों में छिपकर गतिविधियां करते हैं, जिससे वन विभाग के सामने भी बड़ी चुनौती खड़ी होती है।
वन विभाग ने अवैध शिकार रोकने के लिए गश्त बढ़ाने और संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी मजबूत करने की बात कही है। अधिकारियों का कहना है कि जंगलों में संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है और स्थानीय लोगों की मदद से भी जानकारी जुटाई जा रही है।
कावेरी वन्यजीव अभयारण्य की घटना के बाद वन विभाग की कार्रवाई पर सवाल उठने के साथ-साथ अवैध शिकार की समस्या पर भी ध्यान केंद्रित हुआ है। कई संगठनों ने मांग की है कि जंगलों में सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया जाए तथा अवैध शिकार में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
स्थानीय समुदायों की भूमिका भी वन्यजीव संरक्षण में महत्वपूर्ण मानी जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रामीणों को जागरूक करने और उन्हें संरक्षण अभियान से जोड़ने से अवैध गतिविधियों पर रोक लगाने में मदद मिल सकती है।
पिछले एक महीने में सामने आए पांच मामलों ने यह संकेत दिया है कि वन्यजीव अपराधियों पर नजर रखने के लिए और प्रभावी रणनीति की जरूरत है। केवल कार्रवाई के बाद गिरफ्तारी करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि अवैध शिकार के पूरे नेटवर्क को खत्म करने की आवश्यकता है।
फिलहाल कर्नाटक में वन विभाग और पुलिस अवैध शिकार से जुड़े मामलों की जांच में जुटे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और विभाग वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए क्या नए कदम उठाते हैं और कावेरी अभयारण्य गोलीकांड की जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है।