हुब्बल्ली: देश की एकमात्र BIS सर्टिफाइड तिरंगा बनाने वाली यूनिट हुब्बल्ली की बेंगेरी खादी यूनियन इस समय आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रही है। खादी ग्रामोद्योग संयुक्त संघ (KKGSS) से जुड़ी इस यूनियन को इस सीजन में दोहरी मार झेलनी पड़ी है। एक तरफ केंद्र सरकार की झंडा संशोधन नीति के बाद पिछले तीन वर्षों में कारोबार में गिरावट आई है, वहीं दूसरी ओर राज्य सरकार की ओर से बुनकरों को मिलने वाली प्रोत्साहन राशि का बकाया बढ़कर करीब 150 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।

यूनियन के सदस्यों का कहना है कि खादी के तिरंगे की बिक्री में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। इस बार यूनियन ने 2 करोड़ रुपये के झंडे बेचने का लक्ष्य रखा था, लेकिन वह केवल 88 लाख रुपये की बिक्री ही कर पाई। यूनियन के मुताबिक, बिक्री में आई इस बड़ी गिरावट का मुख्य कारण झंडा संहिता में किए गए बदलाव हैं।

खादी ग्रामोद्योग संयुक्त संघ के सचिव शिवानंद मथापति ने बताया कि केंद्र सरकार द्वारा झंडा संहिता में संशोधन के बाद गैर-खादी कपड़े से बने तिरंगे के इस्तेमाल की अनुमति दी गई। इसके बाद बाजार में पॉलिएस्टर और अन्य कपड़ों से बने झंडों की उपलब्धता बढ़ गई। उन्होंने कहा कि खादी के झंडे की तुलना में पॉलिएस्टर के झंडे सस्ते और हल्के होते हैं, जिसके कारण ग्राहक और संस्थाएं उनकी ओर अधिक आकर्षित हो रही हैं।

उन्होंने कहा कि खादी के तिरंगे की अपनी अलग पहचान है, क्योंकि यह हाथ से बुने हुए कपड़े से तैयार किए जाते हैं और इसके निर्माण में बड़ी संख्या में बुनकरों की मेहनत जुड़ी होती है। लेकिन कीमत अधिक होने और बाजार में सस्ते विकल्प उपलब्ध होने के कारण खादी झंडों की मांग प्रभावित हुई है।

बेंगेरी खादी यूनियन देश की एकमात्र ऐसी इकाई है जिसे भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) से प्रमाणन प्राप्त है और जो आधिकारिक रूप से तिरंगा बनाने का काम करती है। लंबे समय से यह यूनियन देशभर में खादी के राष्ट्रीय ध्वज की आपूर्ति करती रही है।

यूनियन के सदस्यों का कहना है कि कारोबार में गिरावट का सीधा असर बुनकरों और कर्मचारियों पर पड़ रहा है। खादी उत्पादन से जुड़े कई परिवार अपनी आजीविका के लिए इसी काम पर निर्भर हैं। ऐसे में सरकार की ओर से मिलने वाली प्रोत्साहन राशि का समय पर भुगतान नहीं होने से आर्थिक दबाव बढ़ रहा है।

KKGSS के अधिकारियों ने बताया कि राज्य सरकार की ओर से बुनकरों को मिलने वाला इंसेंटिव लंबे समय से लंबित है। अब यह राशि करीब 150 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है। यूनियन के सदस्य इस मामले को लेकर मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से मुलाकात करने की तैयारी कर रहे हैं।

यूनियन के प्रतिनिधियों का कहना है कि वे मुख्यमंत्री के सामने लंबित इंसेंटिव फंड जारी करने के साथ-साथ खादी उद्योग से जुड़े अन्य मुद्दों को भी उठाएंगे। उनका कहना है कि यदि समय पर आर्थिक सहायता नहीं मिली तो खादी उत्पादन और इससे जुड़े रोजगार पर असर पड़ सकता है।

शिवानंद मथापति ने राज्य में नकली खादी की बिक्री को लेकर भी चिंता जताई है। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में खासकर विधान सौधा के आसपास नकली खादी के गोदाम संचालित हो रहे हैं। उन्होंने सरकार से ऐसे मामलों की जांच कर कार्रवाई करने की मांग की है।

खादी यूनियन का कहना है कि असली खादी उत्पादों की पहचान और बिक्री को बढ़ावा देने के लिए सख्त कदम उठाने की जरूरत है। उनका तर्क है कि नकली खादी से न केवल उपभोक्ताओं को नुकसान होता है, बल्कि असली खादी बनाने वाले बुनकरों और कारीगरों की आय भी प्रभावित होती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि खादी केवल एक कपड़ा उद्योग नहीं बल्कि देश की स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी विरासत भी है। तिरंगा बनाने में खादी का उपयोग लंबे समय से सम्मान और परंपरा का प्रतीक रहा है। ऐसे में खादी उद्योग को आर्थिक और नीतिगत समर्थन की जरूरत है।

फिलहाल बेंगेरी खादी यूनियन की नजर राज्य सरकार के साथ होने वाली संभावित बैठक पर है। यूनियन उम्मीद कर रही है कि लंबित इंसेंटिव राशि जारी होने और खादी तिरंगे को बढ़ावा देने के लिए कदम उठाए जाएंगे।

खादी यूनियन का कहना है कि यदि सरकार उचित सहायता देती है तो वह फिर से अपने पुराने स्तर की बिक्री हासिल कर सकती है और देशभर में खादी तिरंगे की मांग को बढ़ाया जा सकता है।

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