मैसूर में CREST का जल संरक्षण मॉडल, पानी की निर्भरता घटी

Update: 2026-06-16 11:19 GMT

Karnataka कर्नाटक: ऊर्जा संकट और बढ़ती संसाधन जरूरतों के बीच कर्नाटक के मैसूर में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग कॉलेज का ‘सेंटर फॉर रिन्यूएबल एनर्जी एंड सस्टेनेबल टेक्नोलॉजी’ (CREST) अपनी तकनीकी पहल के जरिए स्थायी समाधान प्रस्तुत कर रहा है। इस केंद्र का उद्देश्य न केवल मैसूर बल्कि पूरे कर्नाटक में नवीकरणीय और टिकाऊ तकनीकों के माध्यम से ऊर्जा और जल संसाधनों की जरूरतों को पूरा करना है।

CREST द्वारा विकसित किए जा रहे मॉडल मुख्य रूप से वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting - RWH) और ऊर्जा संरक्षण पर आधारित हैं। इन तकनीकों को विभिन्न संस्थानों और औद्योगिक परिसरों में लागू किया जा रहा है, ताकि प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भरता को कम किया जा सके।

इस पहल के तहत दो बीयर कंपनियों के कैंपस में रेनवाटर हार्वेस्टिंग तालाबों का सफल मॉडल तैयार किया गया है। इन तालाबों के निर्माण और डिजाइन में NIE-CREST ने तकनीकी सहायता प्रदान की है, जिससे वर्षा जल को संग्रहित कर पुनः उपयोग में लाया जा रहा है।

NIE-CREST के प्रमुख एस. शमसुंदर ने बताया कि इन औद्योगिक इकाइयों को सामान्यतः बहुत अधिक पानी की आवश्यकता होती है, लेकिन RWH तालाबों के उपयोग से उनकी निर्भरता में महत्वपूर्ण कमी आई है। उनके अनुसार, इस तकनीक के लागू होने के बाद कावेरी और काबिनी नदियों तथा बोरवेल जल स्रोतों पर निर्भरता लगभग 30 प्रतिशत तक कम हो गई है।

उन्होंने कहा कि यह मॉडल न केवल जल संरक्षण में मदद कर रहा है, बल्कि उद्योगों को पर्यावरण के अनुकूल संचालन की दिशा में भी प्रेरित कर रहा है। CREST का उद्देश्य ऐसे और अधिक प्रोजेक्ट विकसित करना है, जिन्हें शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों में आसानी से अपनाया जा सके।

विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते मौसम, घटते भूजल स्तर और बढ़ती जनसंख्या के दबाव के बीच इस तरह की तकनीकें बेहद महत्वपूर्ण हैं। वर्षा जल संचयन जैसे उपाय न केवल पानी की उपलब्धता बढ़ाते हैं, बल्कि दीर्घकालिक जल संकट को भी कम करने में मदद करते हैं।

CREST की टीम का कहना है कि आने वाले समय में वे इस मॉडल को अन्य उद्योगों और शैक्षणिक संस्थानों तक भी विस्तार देने की योजना बना रहे हैं, ताकि अधिक से अधिक क्षेत्र जल संरक्षण की दिशा में आत्मनिर्भर बन सकें।

इस पहल को कर्नाटक में सतत विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जो ऊर्जा और जल दोनों क्षेत्रों में संतुलन स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।

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