बेंगलुरु। पश्चिमी घाट के पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट को लेकर कर्नाटक में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। पूर्व गृह मंत्री और तीर्थहल्ली से भारतीय जनता पार्टी के विधायक अरागा ज्ञानेंद्र ने कहा है कि इस मुद्दे पर उचित निर्णय लेने में बीजेपी राज्य सरकार का सहयोग करेगी। उन्होंने रिपोर्ट पर चर्चा के लिए विशेष विधानसभा सत्र बुलाने के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि बीजेपी विधायक सत्र में शामिल होकर अपनी बात रखेंगे।

पत्रकारों से बातचीत में ज्ञानेंद्र ने कहा कि कस्तूरीरंगन रिपोर्ट से जुड़ा विषय पश्चिमी घाट के पर्यावरण और वहां रहने वाले लोगों के भविष्य से संबंधित है। इसलिए इस पर राजनीतिक पक्षपात से ऊपर उठकर निर्णय लिया जाना चाहिए। सरकार को सभी प्रभावित पक्षों की बात सुनने और जमीनी परिस्थितियों का अध्ययन करने के बाद ही कोई अंतिम फैसला करना चाहिए।

ज्ञानेंद्र ने कहा कि बीजेपी विशेष सत्र में सकारात्मक भूमिका निभाएगी। पार्टी के विधायक चर्चा में भाग लेकर पश्चिमी घाट के संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की समस्याओं और चिंताओं को सदन के सामने रखेंगे। उन्होंने कहा कि पर्यावरण की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन संरक्षण के नाम पर स्थानीय लोगों की आजीविका, जमीन और पारंपरिक अधिकारों को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।

पूर्व गृह मंत्री ने कांग्रेस नेताओं पर कस्तूरीरंगन रिपोर्ट को लेकर लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि कुछ कांग्रेस नेता राजनीतिक लाभ के लिए रिपोर्ट के प्रावधानों को लेकर जनता के बीच भ्रम पैदा कर रहे हैं। ज्ञानेंद्र ने कहा कि इस गंभीर विषय पर आरोप-प्रत्यारोप करने के बजाय तथ्यों और वैज्ञानिक आधार पर चर्चा होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि पश्चिमी घाट देश की महत्वपूर्ण प्राकृतिक विरासत है और इसके जंगलों, जलस्रोतों तथा जैव विविधता की रक्षा करना सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है। इसके साथ ही इस क्षेत्र में पीढ़ियों से रह रहे किसानों, आदिवासियों, वनवासियों और ग्रामीण परिवारों की रोजमर्रा की जरूरतों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। किसी भी नीति का उद्देश्य पर्यावरण और मानव जीवन के बीच संतुलन बनाना होना चाहिए।

ज्ञानेंद्र के मुताबिक स्थानीय समुदायों को संरक्षण की पूरी प्रक्रिया से जोड़ना जरूरी है। उन्होंने कहा कि स्थानीय लोगों को अलग रखकर पर्यावरण की सुरक्षा करना संभव नहीं है। जंगल और प्राकृतिक संसाधनों के आसपास रहने वाले समुदायों के पास उस इलाके की परिस्थितियों का लंबा अनुभव होता है। उनकी भागीदारी के बिना बनाई गई नीति को लागू करने में व्यावहारिक परेशानियां सामने आ सकती हैं।

उन्होंने कहा कि सरकार को ऐसा समाधान तैयार करना चाहिए, जिससे पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य पूरे हों और स्थानीय लोगों को अनावश्यक परेशानी का सामना न करना पड़े। रिपोर्ट लागू होने से खेती, मकान निर्माण, सड़क, बिजली, छोटे कारोबार और अन्य गतिविधियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इसकी स्पष्ट जानकारी लोगों को दी जानी चाहिए। अस्पष्टता बनी रहने से प्रभावित क्षेत्रों में भय और भ्रम बढ़ सकता है।

कस्तूरीरंगन समिति ने पश्चिमी घाट के कुछ हिस्सों को पारिस्थितिकी की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने की सिफारिश की थी। रिपोर्ट का उद्देश्य पश्चिमी घाट के पर्यावरण, वन क्षेत्र और जैव विविधता को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों पर नियंत्रण लगाना था। हालांकि, रिपोर्ट के संभावित प्रभाव को लेकर कर्नाटक सहित पश्चिमी घाट से जुड़े कई राज्यों में लंबे समय से चर्चा और विरोध होता रहा है।

स्थानीय लोगों की प्रमुख चिंता यह रही है कि पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्र घोषित होने के बाद उनकी जमीन, खेती और विकास कार्य प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर पर्यावरण संरक्षण से जुड़े संगठन पश्चिमी घाट में अनियंत्रित खनन, पत्थर खदानों, बड़े निर्माण और प्रदूषणकारी उद्योगों पर सख्ती की मांग करते रहे हैं। यही कारण है कि रिपोर्ट पर निर्णय लेते समय सरकार के सामने दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है।

अरागा ज्ञानेंद्र ने गाडगिल और कस्तूरीरंगन समितियों के गठन का उल्लेख करते हुए कांग्रेस को घेरा। उन्होंने कहा कि दोनों समितियों का गठन कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के कार्यकाल में किया गया था। ऐसे में कांग्रेस नेताओं को इस मुद्दे पर बीजेपी को दोष देने या जनता के बीच गलत धारणा पैदा करने से बचना चाहिए।

उन्होंने कहा कि राज्य के लोगों को यह बताया जाना चाहिए कि रिपोर्ट में वास्तव में क्या प्रस्ताव हैं और उनमें से कौन से प्रावधान स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल हैं। विशेष विधानसभा सत्र इस विषय पर खुली और विस्तृत चर्चा का अवसर दे सकता है। सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष के सदस्य प्रभावित जिलों की स्थिति तथा लोगों की आशंकाओं को सामने रख सकेंगे।

बीजेपी विधायक ने मांग की कि अंतिम निर्णय से पहले ग्राम पंचायतों, किसानों, जनप्रतिनिधियों, पर्यावरण विशेषज्ञों और स्थानीय संगठनों से सुझाव लिए जाएं। पश्चिमी घाट के हर क्षेत्र की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। इसलिए सभी इलाकों के लिए एक समान व्यवस्था लागू करने के बजाय स्थान आधारित समाधान पर विचार किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि सरकार को प्रभावित गांवों का सही सर्वेक्षण कराकर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। लोगों को यह भरोसा दिलाना होगा कि उनकी वैध संपत्तियों, कृषि गतिविधियों और बुनियादी सुविधाओं पर अनुचित रोक नहीं लगाई जाएगी। इसके साथ ही प्रकृति को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनानी होगी।

कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पर विशेष सत्र बुलाने की घोषणा के बाद अब सभी की नजर विधानसभा में होने वाली चर्चा पर है। बीजेपी के समर्थन की घोषणा से संकेत मिला है कि पार्टी इस मुद्दे पर सरकार के साथ विमर्श के लिए तैयार है। हालांकि, अंतिम निर्णय रिपोर्ट के प्रावधानों, केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों और प्रभावित क्षेत्रों की आपत्तियों को ध्यान में रखकर लिया जाएगा।

ज्ञानेंद्र ने दोहराया कि कस्तूरीरंगन रिपोर्ट को राजनीतिक हथियार बनाने के बजाय पश्चिमी घाट और वहां रहने वाले लोगों की सुरक्षा के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि विशेष विधानसभा सत्र में निष्पक्ष, तथ्यपूर्ण और व्यापक बहस के बाद ऐसा रास्ता निकलेगा, जिससे पर्यावरण भी सुरक्षित रहे और स्थानीय समुदायों के अधिकार तथा आजीविका भी प्रभावित न हों।

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