दक्षिण भारत में PM2.5 प्रदूषण से निपटने के लिए ‘एयरशेड अप्रोच’ जरूरी: स्टडी
बेंगलुरु। दक्षिण भारत में वायु प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए राज्यों को अपनी सीमाओं से आगे बढ़कर ‘एयरशेड अप्रोच’ अपनाने की जरूरत है। एक नई स्टडी में सामने आया है कि PM2.5 प्रदूषण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हवा के साथ एक राज्य से दूसरे राज्य तक पहुंचता है। ऐसे में केवल स्थानीय स्तर पर प्रदूषण के स्रोतों को नियंत्रित करना पर्याप्त नहीं होगा।
सेंटर फॉर स्टडी ऑफ साइंस, टेक्नोलॉजी एंड पॉलिसी (CSTEP) के शोधकर्ताओं द्वारा की गई इस स्टडी में दक्षिण भारत के पांच राज्यों—कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और केरल—में वायु प्रदूषण के स्रोत और उसके क्षेत्रीय प्रभाव का अध्ययन किया गया। शोध में पाया गया कि इन राज्यों में प्रदूषण के स्रोत और उसके असर वाले क्षेत्रों के बीच जटिल संबंध हैं।
स्टडी के मुताबिक, नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) के तहत देशभर में सूचीबद्ध 131 ‘नॉन-अटेनमेंट’ शहरों में से 25 शहर इन पांच दक्षिण भारतीय राज्यों में स्थित हैं। नॉन-अटेनमेंट शहर वे शहर हैं जहां वायु गुणवत्ता राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप नहीं पाई गई है।
शोधकर्ताओं ने इन शहरों की वायु गुणवत्ता और प्रदूषण के विभिन्न स्रोतों का विश्लेषण किया। इसके लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की वर्ष 2021 से 2025 तक की निगरानी अवधि के आंकड़ों को भी देखा गया।
आंकड़ों से पता चलता है कि इन शहरों में PM10 का स्तर राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों से अधिक पाया गया। हालांकि, विशाखापत्तनम को छोड़कर बाकी शहरों में PM2.5 का वार्षिक औसत स्तर निर्धारित राष्ट्रीय मानकों से कम रहा। इसके बावजूद, शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि PM2.5 को केवल शहर या राज्य की सीमा के भीतर नियंत्रित करने की रणनीति पर्याप्त नहीं हो सकती।
PM2.5 बेहद छोटे आकार के कण होते हैं, जो सांस के जरिए फेफड़ों तक पहुंच सकते हैं। इनका संबंध स्वास्थ्य संबंधी कई गंभीर समस्याओं से जोड़ा जाता है। यही वजह है कि PM2.5 को नियंत्रित करना वायु प्रदूषण प्रबंधन की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है।
स्टडी में ‘सोर्स-रिसेप्टर रिलेशनशिप’ का भी विश्लेषण किया गया। इसका अर्थ है कि प्रदूषण पैदा करने वाले स्रोत और उस प्रदूषण से प्रभावित क्षेत्र के बीच क्या संबंध है। शोधकर्ताओं ने पाया कि दक्षिण भारत के पांचों राज्यों में यह संबंध एक जैसा नहीं है।
कुछ इलाकों में PM2.5 प्रदूषण बढ़ने में स्थानीय उत्सर्जन की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण है। वहीं, कुछ क्षेत्रों में दूसरे राज्यों या क्षेत्रों से आने वाला प्रदूषण भी स्थानीय वायु गुणवत्ता को प्रभावित करता है। इसका अर्थ है कि किसी शहर में प्रदूषण को कम करने के लिए केवल उसी शहर में मौजूद उद्योगों, वाहनों या अन्य स्रोतों पर नियंत्रण करना पर्याप्त नहीं हो सकता।
शोध के दौरान क्षेत्रीय प्रदूषण में विभिन्न राज्यों के योगदान का सिमुलेशन भी किया गया। इससे PM2.5 के एक राज्य से दूसरे राज्य तक पहुंचने के अलग-अलग पैटर्न सामने आए। शोधकर्ताओं के अनुसार, हवा के प्रवाह और मौसम संबंधी परिस्थितियों के कारण प्रदूषण का असर प्रशासनिक सीमाओं से बाहर तक पहुंच सकता है।
इसी वजह से स्टडी में एयरशेड आधारित प्रदूषण नियंत्रण रणनीति अपनाने की जरूरत बताई गई है। एयरशेड से आशय ऐसे भौगोलिक क्षेत्र से है जहां हवा का प्रवाह प्रदूषकों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाता है। इस दृष्टिकोण में प्रशासनिक सीमाओं के बजाय हवा के बहाव और प्रदूषण के स्रोतों को आधार बनाकर नीति तैयार की जाती है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि दक्षिण भारतीय राज्यों को आपस में समन्वय बढ़ाना चाहिए। यदि किसी राज्य में होने वाला उत्सर्जन पड़ोसी राज्य के शहरों की हवा को प्रभावित कर रहा है, तो केवल प्रभावित शहर द्वारा कार्रवाई करने से समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी। स्रोत वाले क्षेत्र में भी उत्सर्जन को कम करना जरूरी होगा।
इसके लिए राज्यों के बीच प्रदूषण संबंधी आंकड़ों को साझा करने, संयुक्त अध्ययन करने और समान रणनीति विकसित करने की जरूरत हो सकती है। उद्योगों, वाहनों, बिजली उत्पादन, निर्माण गतिविधियों और अन्य उत्सर्जन स्रोतों से निकलने वाले प्रदूषकों की निगरानी को भी व्यापक क्षेत्रीय स्तर पर जोड़ने की आवश्यकता बताई गई है।
स्टडी के निष्कर्ष दक्षिण भारत के तेजी से बढ़ते शहरीकरण के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं। बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद, विशाखापत्तनम और अन्य बड़े शहरों में वाहनों की संख्या, निर्माण गतिविधियां और औद्योगिक विकास बढ़ रहे हैं। इससे स्थानीय स्तर पर प्रदूषण के स्रोत बढ़ सकते हैं, जबकि मौसम और हवा की दिशा के कारण क्षेत्रीय स्तर पर भी इसका प्रभाव दिखाई दे सकता है।
हालांकि, शोध में यह भी स्पष्ट किया गया है कि पांचों राज्यों में प्रदूषण की स्थिति एक जैसी नहीं है। कुछ स्थानों पर स्थानीय उत्सर्जन PM2.5 प्रदूषण का मुख्य कारण है। इसलिए एयरशेड अप्रोच का अर्थ यह नहीं है कि स्थानीय प्रदूषण नियंत्रण उपायों को नजरअंदाज किया जाए। इसके बजाय स्थानीय और क्षेत्रीय दोनों स्तरों की रणनीतियों को एक साथ लागू करने की जरूरत है।
विशेषज्ञों के अनुसार, वायु प्रदूषण से प्रभावी तरीके से निपटने के लिए पहले यह समझना जरूरी है कि प्रदूषण कहां से आ रहा है और वह किस दिशा में जा रहा है। इसके आधार पर प्रदूषण स्रोतों को प्राथमिकता दी जा सकती है और संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है।
दक्षिण भारत के पांच राज्यों में 25 नॉन-अटेनमेंट शहरों की मौजूदगी इस चुनौती की व्यापकता को दर्शाती है। PM10 का राष्ट्रीय मानकों से ऊपर रहना भी चिंता का विषय है, भले ही अधिकांश शहरों में PM2.5 का वार्षिक स्तर मानकों से नीचे दर्ज किया गया हो।
स्टडी का व्यापक संदेश यही है कि वायु प्रदूषण प्रशासनिक सीमाओं को नहीं मानता। इसलिए प्रदूषण नियंत्रण की नीतियां भी केवल राज्य या शहर की सीमाओं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। दक्षिण भारत के लिए साझा एयरशेड आधारित रणनीति तैयार करके स्थानीय उत्सर्जन को नियंत्रित करने के साथ-साथ अंतर-राज्यीय प्रदूषण के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
ऐसे में आने वाले समय में दक्षिणी राज्यों के बीच बेहतर समन्वय, वैज्ञानिक मॉडलिंग और रियल-टाइम प्रदूषण आंकड़ों का इस्तेमाल वायु गुणवत्ता सुधारने की दिशा में अहम भूमिका निभा सकता है।