धनबाद। कभी-कभी सफर के दौरान हुई एक छोटी सी मुलाकात इंसान की पूरी जिंदगी की दिशा बदल देती है। धनबाद के अंकित राजगढ़िया के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। साल 2010 में 10वीं कक्षा के छात्र रहे अंकित प्रतिदिन कतरास से धनबाद तक ट्रेन से स्कूल आते-जाते थे। इसी दौरान ट्रेन में एक नेत्रहीन बच्ची से हुई मुलाकात ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने नेत्रदान के प्रति लोगों को जागरूक करने को अपने जीवन की मुहिम बना लिया। आज उनके परिवार और रिश्तेदारों के सहयोग से किए गए नेत्रदान के जरिए 12 लोगों के जीवन में रोशनी आने की बात कही जा रही है।
करीब 16 साल पहले हुई उस मुलाकात को अंकित आज भी नहीं भूले हैं। ट्रेन में सफर करते समय उनकी नजर एक नेत्रहीन बच्ची पर पड़ी। अंकित ने उससे बातचीत शुरू की। बातचीत के दौरान बच्ची ने अपने रोजमर्रा के जीवन और बिना दृष्टि के सामने आने वाली कठिनाइयों के बारे में बताया।
उस समय किशोर रहे अंकित के लिए यह अनुभव बिल्कुल नया था। बच्ची की बातें सुनकर उन्हें पहली बार गहराई से एहसास हुआ कि दृष्टि न होने के कारण किसी व्यक्ति को रोजाना कितनी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
ट्रेन से उतरे और सीधे आई-बैंक पहुंचे
नेत्रहीन बच्ची से बातचीत का अंकित पर इतना गहरा असर हुआ कि धनबाद पहुंचने के बाद वे सीधे शहीद निर्मल महतो मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के आई-बैंक पहुंच गए। यहां उन्होंने नेत्रदान के बारे में जानकारी हासिल की।
अंकित जानना चाहते थे कि मृत्यु के बाद आंखें दान करने की प्रक्रिया क्या होती है, इससे किस तरह जरूरतमंद लोगों की मदद की जा सकती है और इसके लिए परिवार को क्या करना पड़ता है।
आई-बैंक से मिली जानकारी के बाद उन्होंने तय किया कि वे केवल खुद जागरूक होकर नहीं रुकेंगे, बल्कि अपने परिवार और आसपास के लोगों को भी नेत्रदान के लिए प्रेरित करेंगे।
परिवार से शुरू हुई मुहिम
अंकित की नेत्रदान को लेकर शुरू हुई पहल धीरे-धीरे उनके परिवार और रिश्तेदारों तक पहुंची। शुरुआत में किसी किशोर द्वारा ऐसी गंभीर सामाजिक पहल को लेकर बात करना लोगों के लिए नया अनुभव रहा होगा, लेकिन अंकित लगातार नेत्रदान का महत्व समझाते रहे।
समय बीतने के साथ परिवार के सदस्य और रिश्तेदार भी उनकी सोच से जुड़ने लगे। मृत्यु के बाद आंखें दान करने के फैसले को परिवारों ने स्वीकार किया और इसी प्रयास के कारण जरूरतमंद लोगों तक कॉर्निया पहुंच सके।
अंकित के अनुसार उनके परिवार और रिश्तेदारों के सहयोग से अब तक 12 लोगों की जिंदगी रोशन हो चुकी है। यह संख्या उनके लिए केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि उस संकल्प का परिणाम है जिसकी शुरुआत स्कूल के दिनों में ट्रेन में मिली एक अनजान बच्ची से हुई थी।
एक बच्ची से शुरू हुआ सफर समाज तक पहुंचा
अंकित ने नेत्रदान की मुहिम को केवल अपने परिवार तक सीमित नहीं रखा। धीरे-धीरे उन्होंने समाज के दूसरे लोगों को भी इसके बारे में जागरूक करना शुरू किया। लोगों को समझाया कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद किया गया नेत्रदान किसी दृष्टिबाधित व्यक्ति के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकता है।
नेत्रदान को लेकर समाज में कई तरह की भ्रांतियां और जानकारी की कमी देखने को मिलती है। ऐसे में लोगों को सही प्रक्रिया समझाना और परिवारों को इसके लिए मानसिक रूप से तैयार करना बेहद महत्वपूर्ण होता है।
अंकित इसी दिशा में लगातार काम कर रहे हैं। उनका प्रयास है कि ज्यादा से ज्यादा लोग नेत्रदान के महत्व को समझें और जरूरत पड़ने पर अपने परिवार में इस विषय पर निर्णय लेने के लिए तैयार रहें।
समय पर आई-बैंक को सूचना देना जरूरी
नेत्रदान की प्रक्रिया में समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। मृत्यु के बाद जल्द से जल्द अधिकृत आई-बैंक या अस्पताल से संपर्क करना जरूरी होता है। प्रशिक्षित मेडिकल टीम जांच के बाद यह तय करती है कि कॉर्निया प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त है या नहीं।
आम तौर पर पूरी आंख को दूसरे व्यक्ति में प्रत्यारोपित नहीं किया जाता, बल्कि पारदर्शी कॉर्निया का इस्तेमाल उन मरीजों की दृष्टि बहाल करने में किया जा सकता है जिनमें कॉर्निया से संबंधित अंधत्व हो। इसलिए नेत्रदान को लेकर सही चिकित्सा जानकारी का प्रसार भी जरूरी है।
10वीं के छात्र का संकल्प बना मिशन
साल 2010 में अंकित के पास न तो कोई बड़ा संगठन था और न ही सामाजिक अभियान चलाने का अनुभव। उनके पास केवल उस नेत्रहीन बच्ची से बातचीत के बाद पैदा हुई संवेदना और कुछ करने की इच्छा थी।
यही इच्छा उन्हें आई-बैंक तक ले गई और फिर धीरे-धीरे एक अभियान में बदल गई। परिवार के लोगों ने जब इस पहल में साथ देना शुरू किया तो इसका वास्तविक प्रभाव भी सामने आने लगा।
अंकित की कहानी यह दिखाती है कि सामाजिक बदलाव की शुरुआत हमेशा बड़े संसाधनों से नहीं होती। कई बार एक अनुभव और उससे पैदा हुआ संकल्प भी लोगों को जोड़ सकता है।
आज भी जारी है रोशनी बांटने की मुहिम
करीब डेढ़ दशक बाद भी अंकित की मुहिम जारी है। उनका उद्देश्य अधिक से अधिक परिवारों को नेत्रदान के लिए जागरूक करना है, ताकि कॉर्निया की जरूरत वाले मरीजों को नई उम्मीद मिल सके।
ट्रेन में मिली उस नेत्रहीन बच्ची से शायद अंकित की मुलाकात कुछ समय की रही होगी, लेकिन उस बातचीत का प्रभाव उनके जीवन पर स्थायी हो गया। जिस बच्चे ने 10वीं कक्षा में पहली बार दृष्टिहीनता की मुश्किलों को करीब से समझा था, उसी अनुभव ने उसे दूसरों की जिंदगी में रोशनी पहुंचाने के अभियान से जोड़ दिया।
आज जब उनके परिवार और रिश्तेदारों के सहयोग से 12 लोगों के जीवन में रोशनी आने की बात सामने आती है, तो इस पूरी कहानी की शुरुआत उसी ट्रेन के छोटे से सफर और एक अनजान बच्ची से हुई बातचीत से जुड़ जाती है।