नई दिल्ली। सिंधु जल संधि को लेकर अंतरराष्ट्रीय विवाद समाधान मंच कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के ताजा फैसले को भारत ने सिरे से खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय ने सोमवार को स्पष्ट किया कि भारत इस फैसले को स्वीकार नहीं करता और संबंधित मंच की वैधता को भी नहीं मानता।
भारत ने कहा है कि देश के संप्रभु फैसलों और अधिकारों पर किसी बाहरी निकाय का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है। विदेश मंत्रालय ने यह रुख सिंधु जल संधि की स्थिति और अंतरिम उपायों से जुड़े कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के फैसले के बाद सामने रखा है।
भारत ने कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को नकारा
विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि भारत ने इस मामले में कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के अधिकार क्षेत्र को पहले भी स्वीकार नहीं किया है।
मंत्रालय ने कहा कि भारत के संप्रभु निर्णयों से जुड़े मामलों में किसी अंतरराष्ट्रीय निकाय को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।
भारत का कहना है कि सिंधु जल संधि से जुड़े विवादों के समाधान के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए और किसी एकतरफा व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने जारी किया था फैसला
जानकारी के अनुसार, सोमवार को कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने सिंधु जल संधि की स्थिति और अंतरिम उपायों से जुड़े मामले में अपना फैसला जारी किया।
यह मंच अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान के लिए दुनिया के सबसे पुराने संस्थानों में से एक माना जाता है।
हालांकि, भारत ने इस फैसले को मानने से इनकार करते हुए कहा कि इस मामले में कोर्ट के पास अधिकार क्षेत्र नहीं है।
सिंधु जल संधि क्या है
सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ष 1960 में हुई एक महत्वपूर्ण जल समझौता है।
इस संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों के पानी के इस्तेमाल को लेकर दोनों देशों के बीच व्यवस्था तय की गई थी।
विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई इस संधि के तहत पूर्वी नदियों और पश्चिमी नदियों के जल उपयोग को लेकर नियम बनाए गए थे।
यह समझौता दोनों देशों के बीच कई दशकों से जल संबंधी विवादों को नियंत्रित करने का आधार रहा है।
भारत-पाकिस्तान के बीच लंबे समय से विवाद
सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच समय-समय पर मतभेद सामने आते रहे हैं।
दोनों देश अलग-अलग मुद्दों को लेकर संधि की व्याख्या और उसके प्रावधानों पर अपने-अपने पक्ष रखते रहे हैं।
भारत कई बार कह चुका है कि संधि के प्रावधानों के अनुसार ही वह अपने जल संसाधनों का उपयोग करता है।
विदेश मंत्रालय ने रखी भारत की स्थिति
विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों और संप्रभु अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।
मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया को भारत की सहमति और संधि के नियमों के अनुसार ही आगे बढ़ना चाहिए।
भारत ने कहा कि वह ऐसे किसी फैसले को स्वीकार नहीं करेगा, जिसमें अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन हो।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ी चर्चा
कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के फैसले के बाद सिंधु जल संधि को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और पाकिस्तान के बीच जल संसाधनों से जुड़े मुद्दे आने वाले समय में भी महत्वपूर्ण बने रहेंगे।
इस मामले में भारत का रुख स्पष्ट है कि वह अपनी संप्रभुता और अधिकारों से जुड़े मामलों में किसी बाहरी दबाव को स्वीकार नहीं करेगा।
आगे की रणनीति पर नजर
अब सभी की नजर भारत सरकार के अगले कदम पर है।
विदेश मंत्रालय ने फिलहाल अपना रुख स्पष्ट कर दिया है कि वह कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के फैसले को मान्यता नहीं देता।
आने वाले समय में भारत इस मामले को लेकर अपनी कूटनीतिक और कानूनी रणनीति को आगे बढ़ा सकता है।
सिंधु जल संधि से जुड़ा यह विवाद एक बार फिर भारत और पाकिस्तान के बीच जल बंटवारे के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ले आया है।