Jammu जम्मू: पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) एस.पी. वैद ने राज्य में लंबे समय से चले आ रहे क्षेत्रीय विवादों को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहां हर मुद्दा अंततः “जम्मू बनाम कश्मीर” की बहस में बदल जाता है। चाहे वह शिक्षा हो, स्वास्थ्य सेवाएं हों या विकास से जुड़ी परियोजनाएं — हर फैसले को क्षेत्रीय नजरिए से देखा जाता है, जिससे न केवल प्रशासनिक फैसले जटिल हो जाते हैं बल्कि विकास की गति भी प्रभावित होती है।
पूर्व डीजीपी एस.पी. वैद ने उदाहरण देते हुए कहा कि जब केंद्र सरकार ने देश में केंद्रीय विश्वविद्यालयों की स्थापना की, तब जम्मू-कश्मीर में भी एक नहीं बल्कि दो केंद्रीय विश्वविद्यालय बनाने पड़े — एक कश्मीर क्षेत्र में और दूसरा जम्मू क्षेत्र में। उन्होंने कहा कि यह फैसला शैक्षणिक जरूरतों के बजाय क्षेत्रीय संतुलन और राजनीतिक दबावों को ध्यान में रखकर लिया गया।
उन्होंने आगे कहा कि यही स्थिति स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में भी देखने को मिली। जब एम्स (AIIMS) जैसी प्रतिष्ठित स्वास्थ्य संस्था के लिए जगह तय की गई, तब फिर वही बहस खड़ी हो गई। परिणामस्वरूप जम्मू-कश्मीर देश का इकलौता ऐसा राज्य बन गया, जहां दो एम्स बनाए गए — एक कश्मीर में और दूसरा जम्मू में। एस.पी. वैद ने जोर देकर कहा कि भारत का कोई और राज्य ऐसा नहीं है, जहां दो एम्स हों। यह स्थिति अपने आप में दर्शाती है कि जम्मू-कश्मीर में विकास योजनाएं भी क्षेत्रीय राजनीति से अछूती नहीं रह पातीं।
एस.पी. वैद के मुताबिक, यह प्रवृत्ति लंबे समय से चली आ रही है और इसका नुकसान आम जनता को उठाना पड़ता है। विकास परियोजनाएं अक्सर जरूरत और प्राथमिकता के आधार पर नहीं, बल्कि संतुलन और “बराबरी दिखाने” की मजबूरी में तय की जाती हैं। इससे संसाधनों का बंटवारा भी प्रभावी ढंग से नहीं हो पाता।
उन्होंने कहा कि जम्मू और कश्मीर दोनों क्षेत्रों की अपनी-अपनी समस्याएं और जरूरतें हैं, लेकिन हर मुद्दे को प्रतिस्पर्धा के रूप में देखने से समाधान की बजाय टकराव बढ़ता है। एस.पी. वैद ने सुझाव दिया कि अब समय आ गया है जब जम्मू-कश्मीर में विकास को क्षेत्रीय चश्मे से देखने के बजाय समग्र दृष्टिकोण अपनाया जाए। पूर्व डीजीपी ने यह भी कहा कि यदि राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासन मिलकर क्षेत्रीय भावनाओं से ऊपर उठकर फैसले लें, तो राज्य में बेहतर शासन और तेज विकास संभव है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में नीति निर्धारक इस समस्या को गंभीरता से समझेंगे और जम्मू-कश्मीर को “जम्मू बनाम कश्मीर” की राजनीति से बाहर निकालकर एक साझा भविष्य की ओर ले जाने का प्रयास करेंगे।