Jammu: पांच दिवसीय कार्य सप्ताह को लेकर कर्मचारियों का प्रदर्शन
बैंक हड़ताल के चलते कामकाज पर पड़ा असर
जम्मू: जम्मू-कश्मीर में शुक्रवार को बैंकिंग कामकाज प्रभावित हुआ, क्योंकि बैंक कर्मचारियों और अधिकारियों ने यूनाइटेड फोरम ऑफ़ बैंक यूनियंस के आह्वान पर देशव्यापी हड़ताल में हिस्सा लिया। यह हड़ताल उनकी लंबे समय से लंबित मांगों, खासकर बैंकिंग उद्योग में पांच दिन के कार्य-सप्ताह को लागू करने के समर्थन में की गई थी।
यूनियन प्रतिनिधियों ने इस हड़ताल को एक मज़बूत और सफल देशव्यापी कदम बताया जिसमें कर्मचारियों और अधिकारियों ने हड़ताल के समर्थन में काम से दूरी बनाए रखी। जम्मू में एआईबीओसी जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के सचिव राजेश मेहता के नेतृत्व में विभिन्न बैंकों और संबंधित यूनियनों के कर्मचारियों ने स्थानीय कार्यक्रम में भाग लिया। यूनियन नेताओं ने कहा कि बैंक कर्मचारियों को हड़ताल का रास्ता अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ा, क्योंकि औपचारिक समझौते और बार-बार आश्वासन के बावजूद उनकी जायज़ मांगें पूरी नहीं की गईं।
उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार के कार्यालयों में 1985 से पांच दिन काम करने की व्यवस्था लागू है और राज्य सरकार के कार्यालयों, ज़िला कार्यालयों, अदालतों, आयकर कार्यालयों, शेयर बाज़ार, भारतीय रिज़र्व बैंक और एलआईसी में भी इसका पालन किया जाता है। इनमें से ज़्यादातर संस्थानों में सप्ताहांत (वीकेंड) पर कोई वैकल्पिक भौतिक सेवा उपलब्ध नहीं होती है। बैंकिंग सेवाएं ग्राहकों के लिए एटीएम, इंटरनेट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग, यूपीआई और अन्य डिजिटल व वैकल्पिक माध्यमों से चौबीसों घंटे और सातों दिन उपलब्ध रहती हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि दुनिया के लगभग सभी देशों में पाँच-दिन की बैंकिंग व्यवस्था ही प्रचलित है। मार्च, 2024 के समझौते के तहत यूनियनें हर कामकाजी दिन में काम और बैंकिंग के घंटों को 40 मिनट बढ़ाने पर सहमत हुई थीं, ताकि बाकी शनिवारों को छुट्टी घोषित करने से ग्राहकों के लिए उपलब्ध कुल बैंकिंग घंटों में कोई कमी न आए। उन्होंने एक अहम बात यह भी बताई कि हड़ताल में शामिल होने वाले कर्मचारियों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। बैंकिंग उद्योग में हड़ताल वाले दिन का वेतन काट लिया जाता है। इस तरह शुक्रवार की कार्रवाई में शामिल होने वाले हर कर्मचारी और अधिकारी को पता था कि उन्हें एक दिन की सैलरी नहीं मिलेगी।
यूनियन के प्रतिनिधियों ने कहा कि इससे मांग की गंभीरता और पहले से तय किए गए उपाय को लागू करने में हुई लंबी देरी से पैदा हुई निराशा का पता चलता है।