शिमला। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के शांति विहार वार्ड से सटे समिट्री इलाके में कई रिहायशी भवनों की दीवारों और फर्श पर दरारें दिखाई देने के बाद स्थानीय लोगों में चिंता बढ़ गई है। इलाके के नीचे भट्टाकुफर से चलौंठी के बीच फोरलेन परियोजना के तहत टनलों का निर्माण चल रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि टनल निर्माण के दौरान की जा रही ब्लास्टिंग और उससे पैदा होने वाले कंपन के कारण मकानों में दरारें आई हैं। हालांकि अभी किसी सार्वजनिक तकनीकी जांच में यह स्थापित नहीं हुआ है कि भवनों को हुए नुकसान का कारण टनल निर्माण ही है।शुरुआती जानकारी में सात से अधिक भवनों में दरारें आने की बात सामने आई थी। बाद की एक स्थानीय रिपोर्ट में करीब 12 भवन प्रभावित होने का दावा किया गया है। प्रभावित भवनों की अंतिम संख्या प्रशासन की विस्तृत जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।मामले की गंभीरता को देखते हुए शनिवार को जिला प्रशासन की टीम ने प्रभावित इलाके का निरीक्षण किया। रिपोर्टों के अनुसार एडीएम प्रोटोकॉल ज्ञान सागर नेगी और एसडीएम ग्रामीण मनजीत शर्मा की अगुवाई में अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर भवनों की स्थिति देखी। बाद की रिपोर्ट में प्रशासन द्वारा संबंधित निर्माण कार्य को जांच पूरी होने तक रोकने के निर्देश दिए जाने की जानकारी सामने आई है।
दीवारों और फर्श पर दिखाई दीं दरारें
स्थानीय निवासियों के अनुसार शांति विहार वार्ड के समिट्री से सटे रिहायशी क्षेत्र में पिछले कुछ समय से मकानों की दीवारों और फर्श पर दरारें दिखाई दे रही हैं। लोगों का दावा है कि इनमें से कुछ दरारें लगातार चौड़ी हो रही हैं।इलाका घनी आबादी वाला है और यहां कई बहुमंजिला रिहायशी भवन मौजूद हैं। ऐसे में कुछ घरों में दरारें सामने आने के बाद आसपास रहने वाले दूसरे परिवार भी अपने मकानों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं।लोगों का कहना है कि उन्होंने अपनी जीवनभर की कमाई लगाकर मकान बनाए हैं और अब भवनों की सुरक्षा को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता ने उनकी चिंता बढ़ा दी है।
रिहायशी इलाके के नीचे बन रही दो टनल
स्थानीय पार्षद विनीत शर्मा के अनुसार भट्टाकुफर से चलौंठी के बीच फोरलेन परियोजना के तहत दो टनलों का निर्माण किया जा रहा है। निर्माण दोनों तरफ से आगे बढ़ रहा है और अब इसका हिस्सा शांति विहार के रिहायशी क्षेत्र के नीचे पहुंचने की बात कही जा रही है।स्थानीय लोगों का आरोप है कि टनल की खुदाई के दौरान रात के समय भी ब्लास्टिंग की जाती है। उनका दावा है कि इससे जमीन में कंपन महसूस होता है और इसी दौरान मकानों में दरारें बढ़ी हैं।हालांकि ब्लास्टिंग से ही दरारें आई हैं, इसकी आधिकारिक तकनीकी पुष्टि अभी सामने नहीं आई है। इसका पता भूवैज्ञानिक और संरचनात्मक जांच के बाद ही लगाया जा सकता है।
NHAI ने लगाए कंपन मापने वाले उपकरण
लोगों की शिकायतों के बाद भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानी NHAI की ओर से इलाके में कंपन की निगरानी के लिए उपकरण लगाए जाने की जानकारी सामने आई है।इन उपकरणों का उद्देश्य टनल निर्माण के दौरान होने वाले कंपन की तीव्रता रिकॉर्ड करना बताया गया है। इसके अलावा प्रभावित और आसपास के भवनों की वीडियोग्राफी भी की जा रही है, ताकि उनकी मौजूदा स्थिति का रिकॉर्ड तैयार किया जा सके।स्थानीय निवासियों ने हालांकि सवाल उठाया है कि भवनों की वीडियोग्राफी टनल निर्माण शुरू होने से पहले क्यों नहीं की गई। उनका कहना है कि अगर निर्माण से पहले प्रत्येक भवन की स्थिति का रिकॉर्ड होता तो बाद में सामने आई दरारों की तुलना आसानी से की जा सकती थी।
प्रशासन की टीम ने किया निरीक्षण
शनिवार को प्रशासनिक अधिकारियों की टीम प्रभावित इलाके में पहुंची। अधिकारियों ने मकानों में आई दरारों को देखा और स्थानीय निवासियों की शिकायतें सुनीं।रिपोर्ट के मुताबिक निरीक्षण के बाद निर्माण कंपनी को प्रभावित हिस्से में काम रोकने के निर्देश दिए गए हैं। जांच पूरी होने तक आगे निर्माण नहीं करने को कहा गया है।यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि स्थानीय लोग पिछले कई दिनों से टनल निर्माण रोकने और इलाके की विस्तृत भूवैज्ञानिक जांच कराने की मांग कर रहे थे।
पूर्व मेयर संजय चौहान ने उठाए सवाल
शिमला के पूर्व मेयर संजय चौहान ने भी मामले को लेकर चिंता जताई है।उनका दावा है कि टनल का रास्ता करीब 250 से 300 भवनों के नीचे से गुजर रहा है। उन्होंने आशंका जताई कि पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बिना काम आगे बढ़ने पर बड़ी संख्या में भवन प्रभावित हो सकते हैं।यह संख्या और खतरे का आकलन पूर्व मेयर का दावा है और इसकी स्वतंत्र तकनीकी पुष्टि उपलब्ध नहीं है।संजय चौहान ने आरोप लगाया कि फोरलेन परियोजना का काम कर रही कंपनी ने टनल निर्माण शुरू करने से पहले स्थानीय निवासियों से पर्याप्त बातचीत नहीं की।उन्होंने प्रभावित मकान मालिकों को नुकसान का आकलन कर मुआवजा देने की भी मांग की है।
करीब 300 भवनों को लेकर चिंता
पार्षद विनीत शर्मा ने भी कहा है कि जिस हिस्से में अब टनल निर्माण आगे बढ़ना है, वह घनी आबादी वाला है।उनके मुताबिक इस क्षेत्र में करीब 300 भवन हो सकते हैं और इसलिए निर्माण से पहले भूवैज्ञानिक जांच आवश्यक है।स्थानीय प्रतिनिधियों की मांग है कि जब तक विशेषज्ञ यह स्पष्ट नहीं कर देते कि आगे की टनल खुदाई से मकानों को खतरा नहीं होगा, तब तक काम शुरू नहीं किया जाए।यह लगभग 300 भवनों वाला आंकड़ा स्थानीय प्रतिनिधियों का अनुमान है, न कि किसी सार्वजनिक तकनीकी सर्वेक्षण का अंतिम निष्कर्ष।
लोगों ने मेयर और डीसी से की थी मुलाकात
इस मामले को लेकर स्थानीय लोगों ने पहले नगर निगम के मेयर सुरेंद्र चौहान से मुलाकात की थी।पार्षद विनीत शर्मा की अगुवाई में प्रतिनिधिमंडल ने प्रभावित इलाके का निरीक्षण कराने और टनल निर्माण को रोकने की मांग रखी।इसके बाद स्थानीय लोगों ने उपायुक्त अनुपम कश्यप के सामने भी अपनी चिंताएं रखीं। निवासियों की मांग थी कि प्रशासन विशेषज्ञों की टीम भेजकर यह जांच कराए कि भवनों में आई दरारों का वास्तविक कारण क्या है और आगे निर्माण सुरक्षित तरीके से कैसे किया जा सकता है।
भूवैज्ञानिक जांच की मांग
स्थानीय निवासियों की प्रमुख मांग इलाके का वैज्ञानिक और भूवैज्ञानिक अध्ययन कराने की है।
लोग चाहते हैं कि विशेषज्ञ यह जांच करें कि टनल किस गहराई से गुजर रही है, आसपास की चट्टानों और मिट्टी की स्थिति कैसी है, ब्लास्टिंग से कितना कंपन पैदा हो रहा है और इसका ऊपर बने भवनों पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।साथ ही प्रभावित मकानों की संरचनात्मक जांच कराने की भी मांग उठी है।निवासियों का कहना है कि यदि विशेषज्ञ टनल निर्माण को सुरक्षित बताते हैं और पर्याप्त सुरक्षा उपाय किए जाते हैं, तभी काम आगे बढ़ना चाहिए।
भट्टाकुफर और दूसरे इलाकों को लेकर भी चिंता
भट्टाकुफर, माठू कॉलोनी, चलौंठी और लिंडीधार जैसे इलाकों में भी फोरलेन परियोजना के दौरान पहले नुकसान और जमीन की स्थिरता से जुड़ी शिकायतें सामने आने की स्थानीय रिपोर्टें हैं।इन क्षेत्रों में NHAI की ओर से कुछ स्थानों पर जमीन को स्थिर करने के लिए काम किए जाने और कुछ भवनों के अधिग्रहण की भी खबर है।हालांकि अलग-अलग स्थानों पर हुए नुकसान के कारण समान हों, यह जरूरी नहीं है। प्रत्येक इलाके की भूगर्भीय स्थिति और निर्माण गतिविधियों का अलग तकनीकी अध्ययन आवश्यक होगा।
ढली-संजौली बाईपास सड़क पर भी दरारों की रिपोर्ट
बाद की स्थानीय रिपोर्ट में ढली-संजौली बाईपास सड़क पर भी दरारें दिखाई देने की जानकारी सामने आई है।इसी रिपोर्ट में प्रभावित भवनों की संख्या करीब 12 बताई गई और प्रशासन द्वारा निर्माण रोकने के निर्देश देने की बात कही गई।प्रभावित मकानों की संख्या को लेकर अलग-अलग रिपोर्ट होने के कारण प्रशासनिक सर्वेक्षण का अंतिम आंकड़ा महत्वपूर्ण होगा।
मुआवजे की मांग भी तेज
जिन लोगों के मकानों में दरारें आई हैं, उन्होंने नुकसान की मरम्मत कराने और जिम्मेदारी तय होने की स्थिति में मुआवजा देने की मांग की है।स्थानीय प्रतिनिधियों का कहना है कि प्रभावित परिवारों को अकेला नहीं छोड़ा जाना चाहिए। पहले भवनों की सुरक्षा जांच होनी चाहिए और यदि किसी मकान में रहने को लेकर जोखिम पाया जाता है तो प्रशासन को तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए।हालांकि मुआवजा किस एजेंसी को देना होगा और नुकसान के लिए कौन जिम्मेदार है, यह कारण और जवाबदेही तय होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
तकनीकी जांच से साफ होगा दरारों का कारण
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि मकानों में दरारें दिखाई देने की खबरें सामने आई हैं और टनल निर्माण भी इसी क्षेत्र में चल रहा है, लेकिन दोनों के बीच सीधा कारणात्मक संबंध अभी तकनीकी रूप से स्थापित नहीं हुआ है।स्थानीय लोग ब्लास्टिंग और कंपन को जिम्मेदार बता रहे हैं। NHAI ने कंपन रिकॉर्ड करने के लिए उपकरण लगाए हैं और भवनों की वीडियोग्राफी की जा रही है।अब प्रशासनिक निरीक्षण, कंपन के आंकड़ों, भूवैज्ञानिक अध्ययन और भवनों की संरचनात्मक जांच के बाद ही स्थिति ज्यादा स्पष्ट हो सकेगी।फिलहाल प्रभावित इलाके में सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है। स्थानीय लोगों की मांग है कि जांच पूरी होने और विशेषज्ञों से सुरक्षा की पुष्टि मिलने तक ब्लास्टिंग और टनल निर्माण आगे न बढ़ाया जाए।