शिमला। हिमाचल प्रदेश के पच्छाद विधानसभा क्षेत्र में शिक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर स्थिति सामने आई है। यहां 12 प्राइमरी स्कूल पिछले एक साल से बिना शिक्षक के चल रहे हैं। स्कूलों की इमारतें हैं, बच्चे भी हैं, लेकिन उन्हें पढ़ाने के लिए स्थायी शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं। इससे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।

स्थिति यह है कि कई स्थानों पर बच्चों की शिक्षा जारी रखने के लिए स्थानीय लोग आगे आए हैं। ग्रामीणों ने चंदा जुटाकर निजी स्तर पर शिक्षकों की व्यवस्था की है और उन्हें वेतन भी दिया जा रहा है। ग्रामीणों की यह पहल बच्चों की पढ़ाई को पूरी तरह रुकने से बचा रही है, लेकिन सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रही है।

यह मामला हिमाचल प्रदेश विधानसभा में भी उठा। पच्छाद विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक रीना कश्यप ने शून्यकाल के दौरान इस मुद्दे को उठाते हुए सरकार का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि क्षेत्र के कई प्राइमरी स्कूल लंबे समय से शिक्षक विहीन हैं, जिससे बच्चों के भविष्य पर असर पड़ रहा है।

विधायक रीना कश्यप ने सरकार से मांग की कि प्रत्येक स्कूल में कम से कम एक शिक्षक की तत्काल नियुक्ति की जाए। उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों को भी बेहतर शिक्षा का अधिकार है और शिक्षक नहीं होने से उनकी पढ़ाई प्रभावित होना गंभीर चिंता का विषय है।

उन्होंने कहा कि स्कूलों में शिक्षक उपलब्ध नहीं होने के कारण अभिभावकों को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। कई परिवार अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर चिंतित हैं। ग्रामीणों द्वारा निजी स्तर पर शिक्षक रखने की व्यवस्था लंबे समय तक समाधान नहीं हो सकती।

शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने विधानसभा में इस मामले को स्वीकार किया और कहा कि प्रदेश के दुर्गम क्षेत्रों में शिक्षकों की कमी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। उन्होंने विशेष रूप से चंबा, शिमला और सिरमौर जैसे पहाड़ी क्षेत्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन इलाकों में शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिकता है।

शिक्षा मंत्री ने आश्वासन दिया कि जिन स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं, वहां तैनाती को प्राथमिकता के आधार पर किया जाएगा। उन्होंने कहा कि सरकार इस दिशा में लगातार प्रयास कर रही है और जल्द ही आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।

रोहित ठाकुर ने विधानसभा में जानकारी दी कि प्रदेश के 393 प्राइमरी और तीन माध्यमिक स्कूलों में प्रतिनियुक्ति के माध्यम से शिक्षकों की व्यवस्था की गई है। सरकार का प्रयास है कि किसी भी स्कूल में बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो।

शिक्षा विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती दूरदराज के क्षेत्रों में शिक्षकों की नियुक्ति और उन्हें लंबे समय तक बनाए रखना है। पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों में कई बार शिक्षक जाने से बचते हैं, जिससे वहां रिक्तियां बनी रहती हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि प्राथमिक शिक्षा बच्चों के भविष्य की नींव होती है। शुरुआती कक्षाओं में शिक्षक की अनुपलब्धता से बच्चों के सीखने की क्षमता और शैक्षणिक विकास पर सीधा असर पड़ सकता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में अभिभावक भी चाहते हैं कि सरकार स्थायी समाधान निकाले। उनका कहना है कि स्थानीय लोगों द्वारा अस्थायी व्यवस्था करना मजबूरी है, लेकिन बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए सरकारी शिक्षकों की नियुक्ति जरूरी है।

पच्छाद क्षेत्र के ग्रामीणों का कहना है कि स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक होने चाहिए ताकि बच्चों को दूसरे क्षेत्रों में जाने की जरूरत न पड़े। कई गरीब परिवारों के लिए बच्चों को दूर भेजकर पढ़ाना आसान नहीं होता।

इस मामले ने एक बार फिर प्रदेश में शिक्षकों की कमी और ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों को सामने ला दिया है। सरकार की ओर से आश्वासन मिलने के बाद अब लोगों की नजर इस बात पर है कि बिना शिक्षक वाले स्कूलों में नियुक्तियां कितनी जल्दी होती हैं।

हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य में शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए दूरदराज के क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। स्कूल भवन और सुविधाएं होने के बावजूद यदि शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं तो शिक्षा का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता।

फिलहाल सरकार ने शिक्षक विहीन स्कूलों में तैनाती को प्राथमिकता देने की बात कही है। अब देखना होगा कि इस दिशा में कितनी तेजी से कार्रवाई होती है और पच्छाद के बच्चों को नियमित शिक्षक कब तक मिल पाते हैं।

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