हरियाणा: भारतीय रेलवे ने स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में एक बड़ा कदम उठाते हुए देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का संचालन शुरू कर दिया है। हरियाणा के जींद से शुरू हुई यह ट्रेन केवल परिवहन का नया साधन नहीं है, बल्कि 355 साल पुरानी वैज्ञानिक खोज और आधुनिक तकनीक के लंबे सफर का परिणाम है। हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक पर आधारित यह ट्रेन पर्यावरण के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि इससे कार्बन उत्सर्जन नहीं होता।
हाइड्रोजन ट्रेन के संचालन के साथ भारतीय रेलवे ने हरित ऊर्जा की दिशा में एक नई शुरुआत की है। विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले समय में यह तकनीक रेलवे के साथ-साथ भारी परिवहन और उद्योगों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है। इस ट्रेन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके संचालन के दौरान धुएं या कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन नहीं होता। फ्यूल सेल प्रक्रिया के बाद मुख्य रूप से पानी ही उप-उत्पाद के रूप में निकलता है।
इस आधुनिक तकनीक की जड़ें करीब 355 साल पुरानी वैज्ञानिक खोज से जुड़ी हैं। वर्ष 1671 में ब्रिटिश वैज्ञानिक रॉबर्ट बॉयल ने लंदन की प्रयोगशाला में धातु और अम्ल पर प्रयोग करते हुए पहली बार हाइड्रोजन बनने की प्रक्रिया दर्ज की थी। इसके बाद वर्ष 1776 में वैज्ञानिक हेनरी कैवेंडिश ने यह साबित किया कि हाइड्रोजन एक स्वतंत्र रासायनिक तत्व है और इसका पानी से संबंध है। उस समय की वैज्ञानिक खोज आज आधुनिक ऊर्जा तकनीक में बदलकर रेलवे ट्रैक तक पहुंच चुकी है।
हाइड्रोजन एक रंगहीन, गंधहीन और ब्रह्मांड में सबसे अधिक पाया जाने वाला तत्व है। हालांकि यह बेहद ज्वलनशील गैस है, लेकिन आधुनिक तकनीक के जरिए इसे नियंत्रित तरीके से ऊर्जा स्रोत के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। कार्बन उत्सर्जन न होने के कारण इसे भविष्य के स्वच्छ ईंधन के रूप में देखा जा रहा है।
हाइड्रोजन ट्रेन फ्यूल सेल तकनीक से संचालित होती है। इस प्रक्रिया में पानी के इलेक्ट्रोलिसिस के जरिए हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को अलग किया जाता है। इसके बाद फ्यूल सेल में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की नियंत्रित रासायनिक प्रतिक्रिया कर बिजली बनाई जाती है। यही बिजली ट्रेन के मोटर सिस्टम को ऊर्जा देती है और ट्रेन चलती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि हाइड्रोजन का उत्पादन सौर ऊर्जा या पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों से किया जाता है तो उसे ग्रीन हाइड्रोजन कहा जाता है। यह सबसे स्वच्छ प्रकार की हाइड्रोजन मानी जाती है। इसके अलावा ब्लू और ग्रे हाइड्रोजन भी होती हैं। ब्लू हाइड्रोजन प्राकृतिक गैस से बनाई जाती है, जिसमें कार्बन को अलग कर संग्रहित किया जाता है, जबकि ग्रे हाइड्रोजन जीवाश्म ईंधन से तैयार होती है और इसमें कार्बन उत्सर्जन अधिक होता है।
जींद से शुरू हुई हाइड्रोजन ट्रेन कई मायनों में खास है। यह डीजल ईंधन पर निर्भरता कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। रेलवे लंबे समय से ऊर्जा बचत और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम कर रहा है। हाइड्रोजन तकनीक इसी प्रयास को आगे बढ़ाने वाली पहल है।
गुजरात विद्यापीठ के रसायन विभागाध्यक्ष डॉ. सतबीर मोर के अनुसार, हाइड्रोजन ऊर्जा भविष्य के लिए बेहद उपयोगी विकल्प बन सकती है। पानी से हाइड्रोजन तैयार कर फ्यूल सेल के माध्यम से बिजली बनाना एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें प्रदूषण बहुत कम होता है।
भारत अब उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है, जहां हाइड्रोजन ट्रेन तकनीक का व्यावहारिक इस्तेमाल शुरू हो चुका है। यह उपलब्धि भारतीय रेलवे के आधुनिकीकरण और पर्यावरण अनुकूल परिवहन व्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानी जा रही है।
जींद से शुरू हुआ यह सफर केवल एक ट्रेन का सफर नहीं है, बल्कि विज्ञान की 355 साल पुरानी खोज से लेकर आधुनिक तकनीक तक पहुंचने की कहानी है। आने वाले वर्षों में हाइड्रोजन आधारित परिवहन भारत की ऊर्जा नीति और पर्यावरण संरक्षण में अहम भूमिका निभा सकता है।C