चंडीगढ़: हरियाणा के सरकारी स्कूलों में बच्चों को मिलने वाले मिड-डे मील की खाद्य सामग्री की गुणवत्ता को लेकर शिक्षा विभाग ने अब सख्त रुख अपनाया है। स्कूलों में खराब गुणवत्ता की दाल, मसाले, गुड़ और अन्य खाद्य सामग्री पहुंचने की शिकायतों के बाद एलिमेंट्री एजुकेशन निदेशालय ने जिला और ब्लॉक स्तर के अधिकारियों को विशेष निर्देश जारी किए हैं। विभाग ने स्पष्ट किया है कि स्कूलों में खाद्य सामग्री की डिलीवरी स्वीकार करने से पहले उसकी अच्छी तरह जांच की जाएगी। यदि किसी सामान की गुणवत्ता मानकों के अनुरूप नहीं पाई जाती है तो उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा और तत्काल बदलवाने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
मामला उस समय गंभीर हुआ जब हिसार जिले के एक सरकारी स्कूल में मिड-डे मील के लिए भेजे गए राजमा की गुणवत्ता पर सवाल खड़े हुए। जानकारी के अनुसार, स्कूल में पहुंची राजमा को पकाने से पहले कई घंटों तक पानी में भिगोकर रखा गया। इसके बाद उसे उबालने की कोशिश की गई, लेकिन लंबे समय तक पकाने के बावजूद राजमा नहीं गली। इससे स्कूल प्रबंधन को खाद्य सामग्री की गुणवत्ता को लेकर संदेह हुआ। इसके अलावा अलग-अलग स्कूलों से भेजे जा रहे मसालों के बासी होने और गुड़ की गुणवत्ता खराब होने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं।
शिक्षा विभाग के सामने लगातार पहुंच रही शिकायतों के बाद अब अधिकारियों को जिम्मेदारी तय करते हुए कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं। एलिमेंट्री एजुकेशन निदेशालय की ओर से सहायक निदेशक मिड-डे मील ने जिला शिक्षा अधिकारियों, जिला एलिमेंट्री शिक्षा अधिकारियों और ब्लॉक एजुकेशन अधिकारियों को निर्देश जारी किए हैं। अधिकारियों से कहा गया है कि बच्चों को दिए जाने वाले भोजन की गुणवत्ता से किसी भी स्तर पर समझौता नहीं किया जाना चाहिए।
नए निर्देशों के तहत सरकारी स्कूलों के मुख्य अध्यापकों और प्रिंसिपलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण कर दी गई है। स्कूल में खाद्य सामग्री पहुंचने पर डिलीवरी लेने से पहले उसकी जांच करनी होगी। इसमें दाल, राजमा, चना, सोया, बेसन, रागी का आटा, गुड़, तेल, मूंगफली और मसालों सहित अन्य सामग्री की गुणवत्ता देखी जाएगी। यदि सामान खराब, बासी या निर्धारित गुणवत्ता के अनुरूप नहीं पाया जाता है तो स्कूल प्रबंधन को उसे लेने से इनकार करना होगा और संबंधित एजेंसी से उसे बदलवाना होगा।
इसके साथ ही जिला और ब्लॉक स्तर के शिक्षा अधिकारियों को समय-समय पर स्कूलों का औचक निरीक्षण करने के निर्देश दिए गए हैं। इन निरीक्षणों के दौरान यह देखा जाएगा कि स्कूलों में पहुंचने वाली खाद्य सामग्री किस गुणवत्ता की है और बच्चों को भोजन तैयार करने में किसी तरह की लापरवाही तो नहीं हो रही है। विभाग का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को पौष्टिक और गुणवत्तापूर्ण भोजन उपलब्ध कराया जा सके।
दरअसल, हरियाणा शिक्षा विभाग ने पिछले साल नवंबर में सरकारी स्कूलों के लिए खाद्य सामग्री की आपूर्ति को लेकर हरियाणा एग्रो इंडस्ट्रीज कॉरपोरेशन के साथ एक साल का अनुबंध किया था। इस व्यवस्था के तहत स्कूलों में चना, सोया, राजमा, बेसन, रागी का आटा, गुड़, दाल, तेल, मूंगफली और मसालों जैसी सामग्री की सप्लाई की जानी थी। हालांकि अनुबंध के बाद अलग-अलग स्कूलों से खाद्य सामग्री की गुणवत्ता को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं।
स्कूलों के हेड और प्रिंसिपलों की ओर से भी कई बार संबंधित अधिकारियों को शिकायतें दी गईं। शिक्षकों और स्कूल प्रबंधन का कहना था कि खराब गुणवत्ता की सामग्री से बच्चों के लिए भोजन तैयार करना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में शिक्षा विभाग ने शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए अब सप्लाई व्यवस्था की निगरानी बढ़ाने का फैसला किया है।
राजकीय प्राथमिक शिक्षक संघ के राज्य उपाध्यक्ष गोपी चंद ने भी खाद्य सामग्री की गुणवत्ता को लेकर मिल रही शिकायतों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कई स्कूलों से खराब मसाले, कच्चा माल और दालों को लेकर शिकायतें मिली थीं। शिक्षक संघ की ओर से इन समस्याओं को शिक्षा निदेशालय के सामने भी उठाया गया था। उन्होंने पुरानी व्यवस्था को बेहतर बताते हुए कहा कि पहले सरकार स्कूलों को सीधे बजट उपलब्ध कराती थी और अच्छी गुणवत्ता का भोजन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी स्कूल प्रबंधन की होती थी।
शिक्षा निदेशालय ने अब हरियाणा एग्रो इंडस्ट्रीज कॉरपोरेशन लिमिटेड के प्रबंध निदेशक को भी पत्र भेजकर खाद्य सामग्री की गुणवत्ता में तत्काल सुधार करने को कहा है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि बच्चों के भोजन से जुड़े मामले में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
नई व्यवस्था के तहत यदि स्कूलों में खराब खाद्य सामग्री पहुंचती है तो उसे तुरंत बदलवाने की जिम्मेदारी संबंधित एजेंसी की होगी। वहीं अधिकारी औचक निरीक्षण के जरिए यह सुनिश्चित करेंगे कि निर्देशों का पालन हो रहा है या नहीं। शिक्षा विभाग की इस सख्ती का उद्देश्य सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण को प्राथमिकता देना है, ताकि मिड-डे मील योजना अपने उद्देश्य के मुताबिक बच्चों को सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण भोजन उपलब्ध करा सके।