चंडीगढ़। हरियाणा में धान की सरकारी खरीद को लेकर किसानों की सक्रियता बढ़ गई है। 15 सितंबर से धान खरीद शुरू करने की मांग और मंडियों में किसानों को होने वाली संभावित परेशानियों को लेकर किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने मुख्य सचिव अमनीत कुमार से मुलाकात की। इस दौरान धान खरीद से जुड़े मुद्दों को सरकार के सामने रखा गया। वहीं आगे की रणनीति तय करने के लिए 16 सितंबर को बैठक बुलाने की बात सामने आई है।
धान की फसल मंडियों में पहुंचने के समय को देखते हुए खरीद की तारीख किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। किसानों का कहना है कि फसल तैयार होने के बाद अगर सरकारी खरीद समय पर शुरू नहीं होती तो उन्हें मंडियों में इंतजार करना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में किसानों को फसल रखने और उसकी सुरक्षा को लेकर भी परेशानी हो सकती है।
इसी मुद्दे को लेकर गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने मुख्य सचिव से मुलाकात कर किसानों की बात रखी। किसानों की प्रमुख मांग है कि धान की खरीद 15 सितंबर से शुरू की जाए, ताकि तैयार फसल लेकर मंडी पहुंचने वाले किसानों को किसी तरह की दिक्कत न हो।
हरियाणा देश के प्रमुख धान उत्पादक राज्यों में शामिल है। खरीफ सीजन में बड़ी संख्या में किसान धान की खेती करते हैं। फसल तैयार होने के बाद सरकारी खरीद किसानों की आय से सीधे जुड़ा महत्वपूर्ण चरण होता है। ऐसे में खरीद की शुरुआत, मंडियों की व्यवस्था और भुगतान प्रक्रिया को लेकर किसान संगठन लगातार सक्रिय रहते हैं।
धान खरीद के दौरान न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP पर खरीद किसानों के लिए महत्वपूर्ण होती है। सरकारी खरीद व्यवस्था के जरिए पात्र और निर्धारित मानकों पर खरीदी जाने वाली फसल के लिए किसानों को घोषित समर्थन मूल्य मिलता है। इस वजह से खरीद में देरी होने पर किसानों में चिंता बढ़ सकती है।
किसान संगठनों का जोर इस बात पर रहता है कि जैसे ही फसल मंडियों में आनी शुरू हो, खरीद एजेंसियां भी सक्रिय हो जाएं। अगर खरीद शुरू नहीं होती तो किसानों को फसल खुले में रखनी पड़ सकती है। बारिश या मौसम खराब होने की स्थिति में इससे नुकसान का जोखिम बढ़ जाता है।
धान में नमी की मात्रा भी खरीद के दौरान बड़ा मुद्दा रहती है। कटाई के तुरंत बाद मंडी पहुंचने वाली फसल में निर्धारित सीमा से अधिक नमी होने की स्थिति में खरीद प्रभावित हो सकती है। इसलिए किसान संगठनों की मांग रहती है कि खरीद प्रक्रिया में व्यावहारिक परिस्थितियों का ध्यान रखा जाए।
हालांकि धान खरीद के लिए गुणवत्ता और नमी से जुड़े मानक निर्धारित नियमों के अनुसार लागू होते हैं। इनमें किसी तरह की छूट या बदलाव के संबंध में सरकार या संबंधित एजेंसी की आधिकारिक घोषणा को ही अंतिम माना जाना चाहिए।
मुख्य सचिव अमनीत कुमार से हुई मुलाकात को किसान संगठन और सरकार के बीच संवाद की महत्वपूर्ण कड़ी माना जा सकता है। धान खरीद जैसे बड़े अभियान में खाद्य एवं आपूर्ति विभाग, कृषि विभाग, मार्केटिंग बोर्ड और खरीद एजेंसियों समेत कई स्तरों पर समन्वय की जरूरत होती है।
मंडियों में बारदाने की पर्याप्त उपलब्धता भी खरीद व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। धान खरीदने के बाद उसे सुरक्षित तरीके से भरने और उठान के लिए पर्याप्त बोरियों की जरूरत होती है। अगर बारदाने की कमी होती है तो खरीद प्रक्रिया धीमी पड़ सकती है।
इसके साथ ही मंडियों से खरीदे गए धान का समय पर उठान होना भी जरूरी है। मंडी में पहले से खरीदा गया अनाज पड़ा रहने पर नई फसल रखने की जगह कम हो जाती है। इससे किसानों की ट्रॉलियों की लंबी कतारें लग सकती हैं और खरीद व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
मंडियों में किसानों के लिए पीने के पानी, रोशनी, सफाई और बैठने जैसी बुनियादी सुविधाएं भी महत्वपूर्ण हैं। खरीद के व्यस्त दिनों में बड़ी संख्या में किसान और मजदूर मंडियों में मौजूद रहते हैं। ऐसे में स्थानीय प्रशासन और मंडी प्रबंधन को पहले से तैयारियां पूरी करनी होती हैं।
धान खरीद के दौरान भुगतान का मुद्दा भी किसानों की प्राथमिकताओं में शामिल रहता है। फसल बेचने के बाद किसान चाहते हैं कि निर्धारित प्रक्रिया के तहत उनका भुगतान जल्द से जल्द खाते में पहुंचे। भुगतान में देरी से अगली फसल की तैयारी और घरेलू खर्च प्रभावित हो सकते हैं।
हरियाणा में धान खरीद का मामला पराली प्रबंधन से भी जुड़ जाता है। फसल कटाई के बाद किसान अगली रबी फसल की तैयारी करते हैं। धान की कटाई और गेहूं की बुआई के बीच सीमित समय होने के कारण किसानों पर खेत जल्दी खाली करने का दबाव रहता है।
ऐसे में धान की खरीद और उठान समय पर होने से पूरी कृषि प्रक्रिया को व्यवस्थित रखने में मदद मिलती है। किसान मंडी में लंबे समय तक फसल लेकर फंसा रहे तो उसके अगले कृषि कार्य भी प्रभावित हो सकते हैं।
गुरनाम सिंह चढ़ूनी लंबे समय से किसानों से जुड़े मुद्दों को उठाते रहे हैं। धान खरीद को लेकर मुख्य सचिव से उनकी मुलाकात को इसी क्रम में देखा जा रहा है। अब किसान संगठनों की नजर सरकार की प्रतिक्रिया और खरीद की वास्तविक व्यवस्था पर होगी।
आगामी रणनीति तय करने के लिए 16 सितंबर को बैठक बुलाए जाने की जानकारी है। इस बैठक में धान खरीद के मुद्दे पर आगे क्या रुख अपनाया जाए, इसे लेकर चर्चा हो सकती है। हालांकि बैठक में लिए जाने वाले निर्णय उसके संपन्न होने के बाद ही स्पष्ट होंगे।
अगर किसानों की मांगों पर सरकार की ओर से संतोषजनक जवाब मिलता है तो आंदोलन या दूसरी रणनीति की जरूरत कम हो सकती है। वहीं अगर खरीद की तारीख या दूसरी व्यवस्थाओं को लेकर असहमति बनी रहती है तो किसान संगठन बैठक में आगे की रणनीति तय कर सकते हैं।
इसलिए 16 सितंबर की बैठक महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इसमें विभिन्न क्षेत्रों से मिलने वाली मंडियों की स्थिति की जानकारी भी सामने आ सकती है। किसानों के प्रतिनिधि अपने-अपने क्षेत्रों की समस्याएं संगठन के सामने रख सकते हैं।
धान खरीद शुरू होने के बाद शुरुआती कुछ दिन व्यवस्था की वास्तविक परीक्षा होते हैं। कागजों पर तैयारियां पूरी होने के बावजूद मंडियों में किसानों की आवक बढ़ने पर बारदाना, उठान और खरीद एजेंसियों से जुड़ी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
सरकार के लिए चुनौती यह सुनिश्चित करना होगी कि किसानों को मंडियों में अनावश्यक इंतजार न करना पड़े। इसके लिए खरीद केंद्रों पर कर्मचारियों की पर्याप्त तैनाती और खरीद एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी होगा।
किसानों को भी मंडी में फसल लाने से पहले संबंधित खरीद नियमों और शेड्यूल की जानकारी रखना जरूरी है। अगर किसी क्षेत्र में टोकन या निर्धारित दिन के अनुसार फसल बुलाने की व्यवस्था लागू होती है तो उसका पालन करने से मंडियों में भीड़ कम करने में मदद मिल सकती है।
फसल की सफाई और नमी का ध्यान रखना भी किसानों के लिए उपयोगी होगा। निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप फसल होने से खरीद प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान हो सकती है।
धान की सरकारी खरीद केवल किसान और सरकार के बीच का मामला नहीं है। इसके साथ आढ़ती, मंडी मजदूर, परिवहन व्यवस्था, राइस मिल और सरकारी खरीद एजेंसियों की बड़ी श्रृंखला जुड़ी होती है। इनमें से किसी एक स्तर पर समस्या आने से पूरी व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
इसी कारण खरीद शुरू होने से पहले सभी संबंधित पक्षों के बीच समन्वय महत्वपूर्ण माना जाता है। किसानों की मांगों और प्रशासनिक तैयारियों के बीच संतुलन बनाकर ही खरीद प्रक्रिया सुचारू रूप से चलाई जा सकती है।
फिलहाल हरियाणा में धान खरीद को लेकर किसान संगठनों की गतिविधियां तेज हो गई हैं। गुरनाम सिंह चढ़ूनी की मुख्य सचिव अमनीत कुमार से मुलाकात के बाद अब सबकी नजर सरकार के रुख पर है।
वहीं 16 सितंबर को प्रस्तावित बैठक से किसान संगठनों की आगामी रणनीति साफ होने की उम्मीद है। बैठक में धान खरीद की स्थिति और सरकार की प्रतिक्रिया का आकलन करने के बाद आगे के कदम पर निर्णय लिया जा सकता है।
धान की फसल तैयार होने के साथ किसानों के लिए अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि खरीद कब और किस व्यवस्था के तहत सुचारू रूप से शुरू होती है। 15 सितंबर से खरीद की मांग को लेकर हुई इस मुलाकात और इसके ठीक अगले दिन बुलाई गई रणनीतिक बैठक ने इस मुद्दे को हरियाणा की कृषि राजनीति के केंद्र में ला दिया है।