Hisar: मूंग-उड़द व अरहर की फसल बचाने को विशेषज्ञों ने जारी की एडवाइजरी
दलहनी फसलों को बचाने के लिए किसानों को किया गया जागरूक
हिसार: वर्तमान में चल रहे बरसात और नमी वाले मौसम में मूंग, उड़द और अरहर की फसल पर रोग व कीटों का खतरा बढ़ गया है। किसानों को चेताया गया है कि यदि उन्होंने समय रहते ध्यान नहीं दिया तो फसलों को बीमारियों से नुकसान पहुंच सकता है।
मौसम को देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने सचेत किया है कि मूंग की फसल में सफेद मक्खी, हरा तेला, चूरड़ा और अन्य रस चूसने वाले कीट सक्रिय हो सकते हैं। इसके अलावा सफेद मक्खी के कारण पीला मोजेक रोग फैलने की आशंका भी अधिक रहती है। ऐसे में किसानों को सलाह दी गई है कि रोगग्रस्त पौधों को तुरंत उखाड़कर नष्ट करें तथा सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए अनुशंसित दवा का समय पर छिड़काव करें। जरूरत पड़ने पर 12 से 15 दिन बाद दोबारा छिड़काव किया जा सकता है।
विभिन्न क्षेत्रों से मिल रही सूचनाओं के आधार पर कृषि विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि लगातार बारिश और खेत में पानी भरने से अरहर की फसल में फाइटोफ्थोरा रॉट रोग तेजी से फैल सकता है। इस रोग से पौधों की जड़ें गल जाती हैं और पूरी फसल कुछ ही दिनों में सूख सकती है। ऐसे में किसानों को खेत में जल निकासी की समुचित व्यवस्था करने की सलाह दी गई है ताकि पानी जमा न हो सके।
हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के दलहन अनुभाग के वैज्ञानिकों ने किसानों को खरीफ दलहनी फसलों के प्रति विशेष सतर्कता बरतने की सलाह दी है। विशेषज्ञों के अनुसार वर्तमान मौसम में मूंग, उड़द और अरहर की फसलों पर विभिन्न कीटों और रोगों का प्रकोप बढ़ने की संभावना है। इसलिए समय रहते उचित प्रबंधन बेहद जरूरी है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार दलहनी फसलों में पहली निराई-गुड़ाई बुवाई के 20 से 25 दिन बाद तथा दूसरी 40 से 45 दिन बाद करनी चाहिए। इन फसलों को अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए खेत में पर्याप्त नमी होने पर सिंचाई न करें और वर्षा का पानी खेत में जमा न होने दें।
सही पहचान और समय पर उपचार से होगा नुकसान कम : कुलपति
हिसार स्थित हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बीआर कम्बोज ने किसानों को सलाह दी है कि वे फसल में कीट एवं रोगों की नियमित निगरानी करें। किसी भी समस्या की सही पहचान कर केवल अनुशंसित कीटनाशकों का निर्धारित मात्रा में ही उपयोग करें।
उन्होंने कहा कि समय पर खरपतवार नियंत्रण, जल निकासी और वैज्ञानिक सलाह का पालन करने से दलहनी फसलों की बेहतर पैदावार सुनिश्चित की जा सकती है। विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक लगातार निगरानी कर फसलों को बीमारियों से बचाने के प्रयास कर रहे हैं।