हरियाणा: 1962 के भारत-चीन युद्ध में रेजांगला की लड़ाई भारतीय सेना के अदम्य साहस और बलिदान की ऐसी कहानी है, जिसे आज भी देश गर्व के साथ याद करता है। बेहद कठिन परिस्थितियों, सीमित संसाधनों और दुश्मन की भारी संख्या के बावजूद भारतीय जवानों ने जिस बहादुरी से चीनी सेना का सामना किया, वह सैन्य इतिहास में एक मिसाल बन गई। रेजांगला युद्ध के जीवित बचे वीर जवान हवलदार निहाल सिंह ने इस जंग की भयावह कहानी सुनाई थी, जिसे सुनकर हर भारतीय का सीना गर्व से भर जाता है।

रेजांगला की लड़ाई में 13 कुमाऊं रेजीमेंट की चार्ली कंपनी ने अद्भुत साहस का प्रदर्शन किया था। इस कंपनी की कमान मेजर शैतान सिंह के हाथों में थी। हवलदार निहाल सिंह भी इसी कंपनी का हिस्सा थे और उनके पास लाइट मशीन गन की जिम्मेदारी थी। उन्होंने बताया था कि अक्टूबर 1962 में उनकी बटालियन को लेह भेजा गया था और नवंबर में उन्हें रेजांगला पोस्ट पर तैनात किया गया।

18 नवंबर 1962 को चीन की सेना ने अचानक रेजांगला पोस्ट पर हमला कर दिया। चीनी सेना की संख्या करीब तीन हजार बताई जाती है, जबकि भारतीय जवानों के पास सीमित हथियार और संसाधन थे। इसके बावजूद मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में भारतीय सैनिकों ने दुश्मन का डटकर मुकाबला किया और चीनी सेना के पहले हमले को नाकाम कर दिया।

इसके बाद चीनी सेना ने भारी बमबारी शुरू कर दी। दुश्मन लगातार हमले कर रहा था, लेकिन भारतीय जवानों ने पीछे हटने से इनकार कर दिया। हवलदार निहाल सिंह के अनुसार, जवानों के सामने अपनी जान बचाने के लिए पीछे हटने का विकल्प था, लेकिन सभी सैनिकों ने फैसला किया कि वे आखिरी सांस तक लड़ेंगे और अपनी पोस्ट नहीं छोड़ेंगे।

युद्ध के दौरान दोनों तरफ से लगातार गोलीबारी होती रही। भारतीय जवानों ने अपने सीमित हथियारों से चीनी सैनिकों को भारी नुकसान पहुंचाया। जब भारतीय सैनिकों का गोला-बारूद खत्म होने लगा, तब भी उनका हौसला कम नहीं हुआ। उन्होंने लाठी, पत्थर और जूतों तक को हथियार बना लिया और दुश्मन का सामना करते रहे।

हवलदार निहाल सिंह ने बताया था कि इस भीषण लड़ाई के दौरान उनके दोनों हाथों में गोलियां लगी थीं। वह गंभीर रूप से घायल होकर जमीन पर गिर गए थे। इसके बाद चीनी सैनिकों ने उन्हें अपने कब्जे में ले लिया और पहाड़ से नीचे ले गए। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और रात के समय मौका पाकर चीनी सैनिकों को चकमा देकर वहां से निकलने में सफल रहे।

पूरी रात दुश्मन से बचते हुए पहाड़ों पर चलते रहने के बाद 19 नवंबर को वह अपने बेस कैंप पहुंचे। वहां पहुंचने के बाद उन्हें पता चला कि रेजांगला की लड़ाई में उनकी कंपनी के 114 जवान बलिदान हो चुके थे। हालांकि, भारतीय सैनिकों ने दुश्मन को भी भारी नुकसान पहुंचाया और बड़ी संख्या में चीनी सैनिकों को मार गिराया।

रेजांगला युद्ध में मेजर शैतान सिंह ने भी अद्भुत वीरता दिखाई थी। उनके नेतृत्व में जवानों ने आखिरी समय तक मोर्चा संभाले रखा। उनकी वीरता के लिए उन्हें देश का सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र प्रदान किया गया। वहीं हवलदार निहाल सिंह को उनकी बहादुरी के लिए सेना मेडल से सम्मानित किया गया।

रेजांगला युद्ध केवल एक सैन्य संघर्ष नहीं था, बल्कि यह भारतीय सैनिकों के साहस, देशभक्ति और बलिदान की अमर कहानी है। इस युद्ध ने दुनिया को दिखाया कि सीमित हथियारों के बावजूद भारतीय जवानों का मनोबल कितना मजबूत है। आज भी रेजांगला के वीरों की गाथा देशवासियों को प्रेरणा देती है और उनके बलिदान को हमेशा याद किया जाता रहेगा।

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