Narayanpur. नारायणपुर। जिले में इस वर्ष मानसून की शुरुआत के साथ ही पशुओं में संक्रामक बीमारियों के फैलने की आशंका बढ़ गई थी। बारिश के मौसम में घड़सरा, एकटंगिया, लंपी स्किन डिजीज और एंटेरोटॉक्सिमिया जैसी बीमारियां पशुधन के लिए गंभीर खतरा बन जाती हैं। इन बीमारियों के कारण पशुओं की उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है, उपचार पर अतिरिक्त खर्च बढ़ता है और कई बार पशुपालकों को आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है। इस चुनौती को देखते हुए पशुधन विकास विभाग ने राज्य शासन के निर्देश तथा कलेक्टर नम्रता जैन के मार्गदर्शन में 1 जुलाई 2026 से जिलेभर में सघन टीकाकरण अभियान प्रारंभ किया।
उपसंचालक डॉ. आर.के. पडोटी के नेतृत्व में जिले के 10 पशु चिकित्सालय एवं औषधालयों की टीमें लगातार गांव-गांव पहुंचकर पशुपालकों के बीच जागरूकता फैलाने के साथ-साथ उनके पशुओं का निःशुल्क टीकाकरण कर रही हैं। विभाग की इस सक्रिय पहल से दूरस्थ क्षेत्रों के पशुपालकों को भी समय पर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हो रही हैं। अभियान के सकारात्मक परिणाम अब स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं। अब तक जिले में कुल 92 हजार से अधिक टीके लगाए जा चुके हैं। इनमें 51,893 घड़सरा, 4,650 एकटंगिया, 27,679 लंपी स्किन डिजीज तथा 8,655 एंटेरोटॉक्सिमिया के टीके शामिल हैं। इसके साथ ही 11,013 पशुओं को कृमिनाशक दवा और 10,938 पशुओं का किलनीनाशक उपचार भी किया गया है, जिससे वर्षा ऋतु में होने वाले संक्रमण के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सका है।
इस अभियान का लाभ उठाने वाले पशुपालकों का कहना है कि समय पर टीकाकरण होने से उन्हें अपने पशुओं के स्वास्थ्य को लेकर पहले की तुलना में अधिक भरोसा मिला है। पहले जहां मानसून के दौरान बीमारी फैलने की चिंता बनी रहती थी, वहीं अब विभाग की नियमित निगरानी और घर-घर पहुंच रही सेवाओं से पशुधन अधिक सुरक्षित महसूस हो रहा है। इससे पशुओं की दुग्ध उत्पादन क्षमता बनाए रखने, कृषि कार्यों के लिए स्वस्थ बैलों की उपलब्धता सुनिश्चित करने तथा पशुपालकों की आय को सुरक्षित रखने में भी मदद मिल रही है। नारायणपुर जिले का यह सघन टीकाकरण अभियान केवल एक स्वास्थ्य कार्यक्रम नहीं, बल्कि पशुपालकों के जीवन और आजीविका की सुरक्षा का प्रभावी प्रयास बनकर सामने आया है। विभाग की सतत निगरानी, मैदानी अमले की सक्रियता और पशुपालकों के सहयोग से जिले में पशुधन को मानसूनी बीमारियों से बचाने की दिशा में उल्लेखनीय सफलता मिली है। यह अभियान इस बात का उदाहरण है कि समय पर की गई रोकथाम, जनजागरूकता और प्रशासनिक समन्वय से पशुधन की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत बनाया जा सकता है।