40 साल बाद मिला न्याय: 100 रुपये रिश्वत मामले में बरी हुए जागेश्वर प्रसाद अवस्थी

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटा

Update: 2025-09-19 15:46 GMT
Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने शुक्रवार को 1986 के एक पुराने भ्रष्टाचार मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए एमपीएसआरटीसी (MPSRTC) के बिल असिस्टेंट जागेश्वर प्रसाद अवस्थी को बरी कर दिया। इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2004 में उन्हें एक साल कैद और जुर्माना की सजा सुनाई थी। लेकिन हाईकोर्ट ने सबूतों की कमी और गवाहों के विरोधाभास के चलते यह आदेश निरस्त कर दिया।

1986 का मामला: रिश्वत की मांग का आरोप
यह मामला मध्यप्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (MPSRTC) का है। आरोप था कि बिल असिस्टेंट रहे जागेश्वर प्रसाद अवस्थी ने अपने ही निगम के कर्मचारी अशोक कुमार वर्मा से बकाया वेतन का बिल पास करने के बदले 100 रुपये रिश्वत मांगी थी। शिकायत पर लोकायुक्त पुलिस ने जाल बिछाया और अवस्थी को कथित रूप से रंगे हाथ पकड़ने का दावा किया था।

ट्रायल कोर्ट का फैसला (2004)
लगभग 18 साल तक चली सुनवाई के बाद 2004 में ट्रायल कोर्ट ने अवस्थी को दोषी करार दिया। कोर्ट ने उन्हें एक वर्ष कैद और आर्थिक दंड की सजा सुनाई। इसी फैसले के खिलाफ अवस्थी ने हाईकोर्ट में अपील की थी।

हाईकोर्ट में सुनवाई और विरोधाभास उजागर
हाईकोर्ट ने इस मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद पाया कि,
रिश्वत की मांग और स्वीकारोक्ति को लेकर पुख्ता सबूत नहीं मिले।
गवाहों के बयान में स्पष्ट विरोधाभास था। कहीं 100 रुपये के एक नोट का जिक्र था तो कहीं दो 50-50 रुपये के नोट का।
ट्रैप टीम दूरी पर खड़ी थी और उन्होंने न तो पूरी बातचीत सुनी और न ही पैसे देने-लेने की प्रक्रिया को प्रत्यक्ष देखा।
हाईकोर्ट का तर्क: केवल नोट बरामद होने से अपराध साबित नहीं

न्यायालय ने कहा कि केवल नोट बरामद होने से ही रिश्वत का अपराध सिद्ध नहीं होता। जब तक रिश्वत की मांग और उसे स्वीकार करने के सबूत मौजूद न हों, तब तक आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में कानून बहुत स्पष्ट है—मांग और स्वीकारोक्ति दोनों का साबित होना अनिवार्य है। इस मामले में चूंकि प्राथमिक साक्ष्य अधूरे और विरोधाभासी थे, इसलिए ट्रायल कोर्ट का फैसला न्यायसंगत नहीं था।

संदेह का लाभ और बरी
हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि अवस्थी को संदेह का लाभ मिलना चाहिए। सबूतों की कमी और गवाहों के विरोधाभास को देखते हुए न्यायालय ने उन्हें बरी कर दिया।

40 साल बाद मिला न्याय
यह मामला लगभग चार दशकों से अदालतों में लंबित था। पहले ट्रायल कोर्ट का फैसला और फिर हाईकोर्ट में अपील के चलते अवस्थी को 40 साल बाद राहत मिली। इस फैसले ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि भ्रष्टाचार के मामलों में केवल नोटों की बरामदगी पर्याप्त नहीं है। जब तक आरोपी द्वारा रिश्वत की मांग और स्वीकृति का पुख्ता सबूत न हो, तब तक दोष सिद्ध नहीं माना जाएगा।
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