108 दिन की देरी पर हाईकोर्ट सख्त: राज्य सरकार की आपराधिक अपील खारिज

छग

Update: 2026-04-14 14:37 GMT
Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में राज्य सरकार द्वारा दायर आपराधिक अपील को केवल देरी के आधार पर खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि विभागीय प्रक्रिया और प्रशासनिक औपचारिकताओं का हवाला देकर लंबी देरी को उचित नहीं ठहराया जा सकता। यह मामला कोरबा जिले से जुड़ा है, जहां विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) की अदालत ने 15 अप्रैल को आरोपी संजय कुमार यादव (34 वर्ष) को साक्ष्यों के अभाव में आरोपों से मुक्त कर दिया था। इसके खिलाफ राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दायर की थी, लेकिन यह अपील निर्धारित समय सीमा से 108 दिन की देरी से दाखिल की गई।
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संजय कुमार जायसवाल ने देरी को लेकर सख्त रुख अपनाया। राज्य की ओर से पेश अधिवक्ता ने दलील दी कि फाइल प्रक्रिया, विधि एवं विधायी कार्य विभाग से अनुमोदन और महाधिवक्ता से राय लेने में समय लगने के कारण अपील दाखिल करने में देरी हुई। उन्होंने यह भी कहा कि यह देरी जानबूझकर नहीं की गई थी। हालांकि अदालत ने इन तर्कों को पर्याप्त नहीं माना। न्यायालय ने कहा कि केवल विभागीय प्रक्रिया का हवाला देकर देरी को माफ नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार को भी अन्य पक्षों की तरह ही लिमिटेशन कानून का पालन करना होगा और उसे किसी प्रकार की विशेष छूट नहीं दी जा सकती।
न्यायमूर्ति जायसवाल ने अपने आदेश में कहा कि सरकारी अधिकारियों की लापरवाही या ढिलाई को उचित कारण नहीं माना जा सकता। अदालत ने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि उच्चतम न्यायालय ने भी देरी के मामलों में सख्ती बरतने की बात कही है। विशेष रूप से कोर्ट ने ‘स्टेट ऑफ मध्यप्रदेश बनाम रामकुमार चौधरी (2024)’ मामले का हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 1788 दिनों की देरी वाली अपील को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने इस फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में समय सीमा का पालन अत्यंत आवश्यक है और इसमें लापरवाही स्वीकार्य नहीं है।
मामले में आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 296 तथा एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(1)(आर) और 3(1)(एस) के तहत अपराध दर्ज था। यह मामला कोरबा जिले के अजाक थाना से संबंधित था। विशेष न्यायालय ने साक्ष्यों के अभाव में आरोपी को आरोपों से मुक्त कर दिया था। हाईकोर्ट ने देरी माफी के आवेदन को खारिज करते हुए कहा कि जब देरी के लिए कोई ठोस और संतोषजनक कारण प्रस्तुत नहीं किया गया है, तो उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही मुख्य आपराधिक अपील भी स्वतः निरस्त हो गई। इस फैसले को न्यायिक प्रक्रिया में समयसीमा के पालन को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि चाहे पक्षकार राज्य ही क्यों न हो, कानून के दायरे में सभी को समान रूप से नियमों का पालन करना होगा।
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