होटल कारोबारी की अवैध गिरफ्तारी पर हाईकोर्ट सख्त, सुनाया ये फरमान

छग

Update: 2026-01-23 13:44 GMT
Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दुर्ग जिले के भिलाई में एक होटल कारोबारी की अवैध गिरफ्तारी और पुलिस की कथित बर्बरता के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वह पीड़ित को एक लाख रुपये का मुआवजा चार सप्ताह के भीतर अदा करे। साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि जांच के बाद दोषी पुलिस अधिकारियों से यह राशि वसूली जा सकती है। हाईकोर्ट ने इस मामले को मानवाधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा गंभीर उल्लंघन मानते हुए पुलिस और प्रशासनिक लापरवाही पर कड़ी टिप्पणी की है।
मामला भिलाई के अवंतीबाई चौक निवासी आकाश कुमार साहू से जुड़ा है, जो लॉ स्टूडेंट होने के साथ-साथ परिवार के भरण-पोषण के लिए कोहका क्षेत्र में होटल का संचालन करते हैं। आकाश साहू ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर पुलिस की कार्रवाई को अवैध और असंवैधानिक बताया था। याचिका में कहा गया कि होटल पूरी तरह से पंजीकृत है और वैध लाइसेंस के साथ संचालित किया जा रहा है।
याचिकाकर्ता के अनुसार 8 सितंबर 2025 को पुलिस अधिकारी और जवान होटल पहुंचे और होटल में ठहरे लोगों से पूछताछ के बहाने रजिस्टर व पहचान दस्तावेजों की जांच करने लगे। आरोप है कि बिना महिला पुलिसकर्मी के एक कमरे में जबरन प्रवेश किया गया, जहां पुरुष और महिला ठहरे थे। उन्हें बाहर निकालकर होटल स्टाफ के साथ दुर्व्यवहार किया गया। कुछ समय बाद पुलिस फिर होटल पहुंची और कर्मचारियों पर सोने के आभूषण चोरी करने का झूठा आरोप लगाया। होटल में लगे सीसीटीवी कैमरों की जांच करने के बजाय पुलिस ने कथित तौर पर होटल मैनेजर की बेरहमी से पिटाई की।
जब होटल मालिक आकाश साहू मौके पर पहुंचे और खुद को संस्थान का मालिक बताया, तो पुलिस अधिकारियों ने उनके साथ गाली-गलौज और अभद्रता की। विरोध करने पर उन्हें जबरन हिरासत में लेकर थाने ले जाया गया, जहां मारपीट और मानसिक प्रताड़ना के बाद बिना किसी ठोस आधार के गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
पुलिस की ओर से दावा किया गया कि वे एक गुमशुदा लड़की की तलाश में होटल पहुंचे थे और आकाश साहू ने सरकारी कार्य में बाधा डाली थी। इसी आधार पर बीएनएस की धारा 170 के तहत कार्रवाई की गई। हालांकि हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी भी संज्ञेय अपराध में एफआईआर दर्ज नहीं थी। महज संदेह और कहासुनी के आधार पर गिरफ्तारी और जेल भेजना संविधान के अनुच्छेद 21 का स्पष्ट उल्लंघन है।
कोर्ट ने एसडीएम की भूमिका पर भी नाराजगी जताई और कहा कि मजिस्ट्रेट को न्यायिक प्रहरी की भूमिका निभानी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने बिना स्वतंत्र विवेक का प्रयोग किए पुलिस रिपोर्ट पर मुहर लगा दी। डिवीजन बेंच, जिसमें चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल शामिल थे, ने याचिकाकर्ता के खिलाफ सभी आपराधिक कार्यवाहियों को निरस्त कर दिया। हाईकोर्ट ने गृह विभाग के सचिव को निर्देश दिए हैं कि पुलिस बल को मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाया जाए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। कोर्ट ने कहा कि पुलिस अत्याचार और अवैध रिमांड से आपराधिक न्याय प्रणाली में जनता का भरोसा कमजोर होता है, जो लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है।
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