Raipur. रायपुर। साइबर और डिजिटल माध्यम से बढ़ते वित्तीय अपराधों की प्रभावी रोकथाम और विवेचना के लिए छत्तीसगढ़ पुलिस ने विशेष प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया। “New Age Financial Crimes & Response Readiness” विषय पर आयोजित इस कार्यशाला में प्रदेश के सभी जिलों से करीब 300 पुलिस अधिकारी और विवेचक शामिल हुए। विमतारा सभागार, रायपुर में आयोजित कार्यक्रम में अधिकारियों को तेजी से बदल रहे साइबर वित्तीय अपराधों और उनकी जांच की आधुनिक तकनीकों की जानकारी दी गई।
कार्यशाला में पुलिस महानिदेशक अरुण देव गौतम, महानिदेशक प्रशिक्षण जी.पी. सिंह, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक दीपांशु काबरा, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक अमित कुमार, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक डॉ. आनंद छाबड़ा, पुलिस महानिरीक्षक प्रशांत अग्रवाल, पुलिस उप महानिरीक्षक सुजीत कुमार और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक डॉ. अभिषेक पल्लव मौजूद रहे। कार्यशाला के विषय विशेषज्ञ डॉ. रक्षित टंडन ने पुलिस अधिकारियों को साइबर वित्तीय अपराधों के बदलते स्वरूप और आधुनिक विवेचना तकनीकों के बारे में विस्तार से प्रशिक्षण दिया। प्रशिक्षण के दौरान अधिकारियों को विभिन्न प्रकार की ऑनलाइन धोखाधड़ी और डिजिटल अपराधों की पहचान, जांच और अपराधियों तक पहुंचने की प्रक्रिया समझाई गई।
ऑनलाइन निवेश से यूपीआई फ्रॉड तक प्रशिक्षण
कार्यशाला में ऑनलाइन निवेश धोखाधड़ी, क्रिप्टोकरेंसी से जुड़े अपराध, म्यूल खाते, फर्जी पहचान और सत्यापन, यूपीआई एवं इंटरनेट बैंकिंग धोखाधड़ी, क्यूआर कोड फ्रॉड और रिमोट डिवाइस कंट्रोल आधारित धोखाधड़ी जैसे साइबर अपराधों पर विस्तार से चर्चा की गई। अधिकारियों को बताया गया कि डिजिटल माध्यमों के बढ़ते इस्तेमाल के साथ वित्तीय अपराधों के तरीके भी लगातार बदल रहे हैं। ऐसे मामलों में अपराधी अलग-अलग तकनीकों और डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर पीड़ितों के खातों से रकम निकालते हैं। इसलिए साइबर अपराध की शिकायत मिलने के बाद पुलिस की त्वरित प्रतिक्रिया बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
‘स्वर्णिम समय’ में कार्रवाई पर जोर
कार्यशाला में साइबर धोखाधड़ी की सूचना मिलने के बाद शुरुआती समय को बेहद महत्वपूर्ण बताया गया। अधिकारियों को ‘स्वर्णिम समय’ में कार्रवाई की प्रक्रिया समझाई गई। इसमें संदिग्ध वित्तीय लेन-देन की तत्काल पहचान, धोखाधड़ी की रकम को रोकने के प्रयास और संबंधित बैंक एवं वित्तीय संस्थानों के साथ तत्काल समन्वय पर विशेष जोर दिया गया। प्रशिक्षण के दौरान अधिकारियों को बताया गया कि समय पर कार्रवाई होने से ठगी की रकम को आगे ट्रांसफर होने से रोकने और पीड़ित को राहत दिलाने की संभावना बढ़ जाती है। इसके लिए पुलिस, बैंकिंग संस्थानों और संबंधित वित्तीय एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है।
डिजिटल साक्ष्यों की जांच का व्यावहारिक प्रशिक्षण
कार्यशाला की प्रमुख विशेषता व्यावहारिक विवेचना और वास्तविक प्रकरणों पर आधारित प्रशिक्षण रही। अधिकारियों को डिजिटल साक्ष्यों के संरक्षण और विश्लेषण की प्रक्रिया से अवगत कराया गया। इसके अलावा डिजिटल पदचिह्नों की पहचान कर अपराध की कड़ियों को जोड़ने की आधुनिक तकनीकों की जानकारी दी गई। प्रशिक्षण में पीड़ित से शुरू होकर वित्तीय लेन-देन, म्यूल खातों और लाभार्थी तक पहुंचने तथा इन कड़ियों को जोड़कर अपराधियों के नेटवर्क की पहचान करने के तरीकों पर भी चर्चा की गई। इससे विवेचकों को साइबर अपराध के मामलों में तकनीकी साक्ष्यों के प्रभावी इस्तेमाल का व्यावहारिक ज्ञान मिला।
कार्यशाला के अंत में प्रश्नोत्तर और प्रकरण चर्चा का आयोजन किया गया। इस दौरान विभिन्न जिलों से आए पुलिस अधिकारियों और विवेचकों ने साइबर अपराध की जांच के दौरान सामने आने वाली चुनौतियों और अपने अनुभव साझा किए। विशेषज्ञ ने अधिकारियों के सवालों का जवाब देते हुए विवेचना से संबंधित आवश्यक मार्गदर्शन दिया। छत्तीसगढ़ पुलिस के अनुसार इस कार्यशाला का उद्देश्य साइबर वित्तीय अपराधों से निपटने के लिए पुलिस की त्वरित प्रतिक्रिया, आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल और प्रभावी विवेचना क्षमता को मजबूत करना है। बदलते डिजिटल अपराधों के बीच यह प्रशिक्षण पुलिस अधिकारियों को नई चुनौतियों से निपटने में मददगार साबित होगा।
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