Bilaspur. बिलासपुर। जिले के आदिवासी बहुल कोटा क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाल स्थिति एक बार फिर सामने आई है। खोंगसरा गांव में उल्टी-दस्त (डायरिया) से पीड़ित एक बैगा महिला की समय पर इलाज न मिलने के कारण मौत हो गई। इस घटना के बाद पूरे क्षेत्र में स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर नाराजगी और चिंता बढ़ गई है। जानकारी के अनुसार, खोंगसरा के तुमा डबरा वार्ड-10 निवासी धनमती बैगा (35), पत्नी सुखसिंह बैगा, पिछले करीब एक सप्ताह से पेट दर्द, उल्टी और दस्त से पीड़ित थीं। उनका घर सरगोड़ नदी के दूसरे छोर पर स्थित होने के कारण स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचना पहले से ही कठिन था। परिजनों के अनुसार, सोमवार रात उनकी तबीयत अचानक ज्यादा बिगड़ गई, लेकिन परिवार उन्हें अस्पताल ले जाने के बजाय झाड़फूंक में लगा रहा। मंगलवार सुबह करीब 5 बजे उनकी मौत हो गई।
घटना के बाद ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि समय पर सूचना देने के बावजूद स्वास्थ्य विभाग की टीम गांव नहीं पहुंची। बताया गया कि आमागोहन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और कोटा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र दोनों को सूचना दी गई थी, लेकिन कहीं से भी कोई चिकित्सा टीम मौके पर नहीं पहुंची। स्थानीय लोगों का कहना है कि क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी है। जनपद सदस्य कांति बलराम सिंह मरावी ने बताया कि इलाके में डॉक्टरों की कमी के कारण ग्रामीण अब भी झाड़फूंक पर निर्भर हैं, जिससे ऐसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि गर्मी के मौसम में साफ पानी की कमी और नदी व झिरिया के पानी के उपयोग के कारण डायरिया जैसी बीमारियां तेजी से फैल रही हैं। स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने स्वास्थ्य विभाग पर गंभीर लापरवाही का आरोप लगाया है। भाजपा मंडल अध्यक्ष राजू सिंह राजपूत ने कहा कि डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मचारी नियमित रूप से फील्ड में नहीं जाते, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति लगातार बिगड़ रही है।
इस मामले में ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर (BMO) डॉ. निखिलेश गुप्ता से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। इससे विभाग की जवाबदेही पर और सवाल खड़े हो गए हैं। स्थानीय ग्रामीण प्रदीप शर्मा ने बताया कि आमागोहन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में एक भी एमबीबीएस डॉक्टर पदस्थ नहीं है। अस्पताल में केवल नर्स और कंपाउंडर के भरोसे ही इलाज चल रहा है, जिससे गंभीर मरीजों को उचित उपचार नहीं मिल पा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के कारण छोटे-छोटे इलाज योग्य रोग भी जानलेवा बनते जा रहे हैं। विशेषकर आदिवासी इलाकों में जागरूकता की कमी और दूरस्थ भौगोलिक स्थिति स्थिति को और गंभीर बना रही है। यह घटना न केवल स्वास्थ्य व्यवस्था की खामियों को उजागर करती है, बल्कि आदिवासी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं और आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं की कमी पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। ग्रामीणों ने मांग की है कि क्षेत्र में स्थायी डॉक्टरों की नियुक्ति और मोबाइल स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत किया जाए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।