Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट बिलासपुर ने नाबालिग छात्रा से दुष्कर्म के मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि पीड़िता की उम्र कानूनन नाबालिग है, तो उसके साथ बनाए गए शारीरिक संबंधों में कथित सहमति का कोई कानूनी महत्व नहीं होता। हाईकोर्ट ने कहा कि नाबालिग की सहमति को कानून मान्यता नहीं देता और ऐसे मामलों में आरोपी को दुष्कर्म के अपराध से मुक्त नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट के जस्टिस संजय एस अग्रवाल की सिंगल बेंच ने बस्तर जिले के जगदलपुर सत्र न्यायालय द्वारा आरोपी अर्जुन मेहरा (19 वर्ष) को सुनाई गई 7 वर्ष के सश्रम कारावास और 500 रुपये जुर्माने की सजा को बरकरार रखा है। कोर्ट ने आरोपी की ओर से दायर दोनों अपीलों को खारिज कर दिया है।
मामले में हाईकोर्ट ने जमानत पर बाहर चल रहे आरोपी का बेल बॉन्ड रद्द करते हुए उसे हिरासत में लेकर जेल भेजने का आदेश दिया है। कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि मामले में उपलब्ध साक्ष्य आरोपी के अपराध को साबित करते हैं। यह मामला बस्तर जिले के थाना फ्रेजरपुर अंतर्गत ग्राम कोयनार का है। अभियोजन के अनुसार, घटना के समय पीड़िता छठवीं कक्षा में पढ़ने वाली 13 वर्षीय छात्रा थी। उसके माता-पिता रोजगार की तलाश में पड़ोसी गांव सेमरा गए हुए थे। इसी दौरान आरोपी अर्जुन मेहरा टीवी देखने के बहाने उनके घर आता था और किशोरी का शारीरिक शोषण करता था।
होली के त्योहार के दौरान जब पीड़िता के माता-पिता वापस घर लौटे तो उन्होंने बेटी की तबीयत खराब देखी। उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकीय जांच में उसके 5 माह की गर्भवती होने की पुष्टि हुई। इसके बाद किशोरी ने अपने परिजनों को पूरी घटना की जानकारी दी। घटना के बाद 12 मार्च 2009 को गांव में पंचायत बुलाई गई थी। पंचायत में आरोपी और उसके परिवार वालों ने कथित रूप से अपना अपराध स्वीकार किया था। उन्होंने पीड़िता को अपने घर में रखने और पुलिस में शिकायत नहीं करने का आश्वासन दिया था। हालांकि कुछ दिनों बाद आरोपी के परिवार ने पीड़िता को घर से बाहर निकाल दिया। इसके बाद पीड़िता के पिता ने 28 मार्च 2009 को फ्रेजरपुर थाने में आरोपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई।
मामले की सुनवाई के दौरान आरोपी पक्ष ने हाईकोर्ट में तर्क दिया था कि एफआईआर दर्ज कराने में काफी देरी हुई है। बचाव पक्ष ने कहा कि घटना के करीब सात महीने बाद रिपोर्ट दर्ज कराई गई और देरी का स्पष्ट कारण नहीं बताया गया। आरोपी के अधिवक्ता ने यह भी दलील दी कि दोनों के बीच संबंध कथित रूप से आपसी सहमति से बने थे, इसलिए इसे दुष्कर्म का अपराध नहीं माना जाना चाहिए। बचाव पक्ष ने पीड़िता की उम्र को लेकर भी सवाल उठाए थे। अधिवक्ता ने कहा कि अस्थि परीक्षण रिपोर्ट के अलावा ऐसा कोई मजबूत प्रमाण नहीं है जिससे यह साबित हो कि घटना के समय पीड़िता 16 वर्ष से कम उम्र की थी। मेडिकल रिपोर्ट में उम्र में कुछ अंतर होने की संभावना के आधार पर पीड़िता को बालिग बताने का प्रयास किया गया। हाईकोर्ट ने सभी दलीलों और दस्तावेजों का परीक्षण करने के बाद आरोपी पक्ष की बातों को खारिज कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि स्कूल दाखिला पंजी और प्रमाण पत्र में पीड़िता की जन्म तिथि दर्ज थी। इसके अलावा रेडियोलॉजिस्ट डॉ. गोविंद सिंह की अस्थिकरण जांच रिपोर्ट में भी पीड़िता की उम्र 15 वर्ष से कम पाई गई थी। वहीं चिकित्सकीय जांच में डॉक्टर अंजना भास्कर ने पीड़िता की उम्र लगभग 13 वर्ष बताई थी। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि भले ही कुछ परिस्थितियों में यह प्रतीत हो कि संबंध आपसी सहमति से बने थे, लेकिन जब पीड़िता कानून की नजर में नाबालिग है, तो उसकी सहमति का कोई कानूनी आधार नहीं होता। नाबालिग की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों के तहत आरोपी को जिम्मेदार ठहराया जाएगा। हाईकोर्ट ने जगदलपुर सत्र न्यायालय के 15 अक्टूबर 2009 के फैसले को बरकरार रखते हुए आरोपी की अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को आवश्यक कानूनी कार्रवाई पूरी करने के निर्देश भी दिए हैं। इस फैसले को नाबालिगों की सुरक्षा और यौन अपराधों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि नाबालिग पीड़ितों के मामलों में सहमति का दावा कानून के सामने स्वीकार्य नहीं होगा।