पुष्पा सिंडिकेट मामले में सरगना मनीष अग्रवाल की अग्रिम जमानत याचिका खारिज
छग
Raipur. रायपुर। छत्तीसगढ़ की बेशकीमती वन संपदा को नुकसान पहुंचाने वाले कथित लकड़ी तस्करी नेटवर्क यानी ‘पुष्पा सिंडिकेट’ मामले में आरोपी सरगना मनीष अग्रवाल को बड़ा झटका लगा है। न्यायालय ने मनीष अग्रवाल की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। अब पुलिस और वन विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती फरार चल रहे मुख्य आरोपी और उसके साथियों की गिरफ्तारी है। मामला महासमुंद जिले के पिथौरा थाना क्षेत्र से जुड़ा हुआ है, जहां वन विभाग ने खैर लकड़ी की बड़ी खेप पकड़ी थी। जानकारी के अनुसार एक ट्रक में करीब 32 हजार किलोग्राम खैर लकड़ी भरकर हिमाचल प्रदेश ले जाई जा रही थी। इस लकड़ी के परिवहन के लिए कर्नाटक वन विभाग की एनओसी (अनापत्ति प्रमाण पत्र) प्रस्तुत की गई थी। जांच के दौरान महासमुंद वन विभाग ने इस एनओसी को फर्जी पाया, जिसके बाद पूरे मामले का खुलासा हुआ।
वन विभाग की जांच में सामने आया कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर बेशकीमती खैर लकड़ी की तस्करी की जा रही थी। इसके बाद महासमुंद वन विभाग की ओर से पिथौरा थाना में धोखाधड़ी सहित वन अधिनियम और अन्य गंभीर धाराओं के तहत अपराध दर्ज कराया गया। इस मामले में लकड़ी तस्करी नेटवर्क के सरगना मनीष अग्रवाल के अलावा हिमांशु राठी, सलाहउद्दीन, विजय सिसोदिया और मनजत सिंह रंधावा को आरोपी बनाया गया है। हालांकि, एफआईआर दर्ज होने के बाद भी लंबे समय से आरोपी पुलिस की पकड़ से बाहर हैं। मनीष अग्रवाल ने गिरफ्तारी से बचने के लिए न्यायालय में अग्रिम जमानत याचिका लगाई थी, लेकिन कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी। न्यायालय के इस फैसले के बाद अब आरोपी की गिरफ्तारी की संभावना बढ़ गई है।
इस पूरे मामले के सामने आने के बाद प्रदेश में वन संपदा की सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि लकड़ी तस्करी का यह नेटवर्क लंबे समय से सक्रिय था और प्रदेश की बेशकीमती खैर, चंदन सहित अन्य वन संपदा को नुकसान पहुंचाया जा रहा था। मामले का खुलासा होने के बाद पूरे सिंडिकेट को उजागर किए जाने के बाद वन विभाग हरकत में आया था। इसके बाद रायपुर के गुमा स्थित एक यार्ड से करोड़ों रुपये कीमत की खैर लकड़ी का बड़ा जखीरा बरामद किया गया था। इस मामले की जांच रायपुर वन विभाग के अधिकारी कर रहे हैं। हालांकि जांच की धीमी रफ्तार को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि महासमुंद पुलिस और वन विभाग की कार्रवाई बेहद धीमी गति से आगे बढ़ रही है, जिसके कारण इतने बड़े नेटवर्क से जुड़े आरोपी अब तक गिरफ्त से बाहर हैं।
जानकारों का कहना है कि वन विभाग के पास सीमित कानूनी अधिकार होने के कारण कई मामलों में कार्रवाई की गति प्रभावित होती है। वहीं वन क्षेत्रों में तैनात कुछ कर्मचारियों की संदिग्ध भूमिका और विभागों के बीच बेहतर समन्वय की कमी भी तस्करी करने वाले गिरोहों को फायदा पहुंचा सकती है। बताया जाता है कि आरोपी मनीष अग्रवाल के खिलाफ पहले भी कई जिलों में वन्यजीव अवशेषों और चंदन, खैर जैसी बेशकीमती लकड़ियों की तस्करी से जुड़े मामले दर्ज हो चुके हैं। रायपुर सहित प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में उसके खिलाफ कार्रवाई हो चुकी है और वह कई बार जेल भी जा चुका है। महासमुंद के पिथौरा थाने में दर्ज एफआईआर को एक माह से ज्यादा समय बीत चुका है, लेकिन अब तक मुख्य आरोपी मनीष अग्रवाल की गिरफ्तारी नहीं हो सकी है। पुलिस और वन विभाग की जांच पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। अब देखने वाली बात होगी कि अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद महासमुंद पुलिस फरार सरगना मनीष अग्रवाल और उसके साथियों तक कब पहुंच पाती है। प्रदेश की वन संपदा को नुकसान पहुंचाने वाले इस कथित सिंडिकेट के खिलाफ आगे की कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।